परागण क्या है इसके प्रमुख प्रकार एवं फसलों में परागण प्रजनन विधियां लिखिए

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जब किसी पुष्प के परागकण परागकोश से निकलकर उसी पुष्प या दूसरे पुष्पों की वर्तिकाग्र पर पहुंचते है, तो यह क्रिया परागण (pollination in hindi) कहलाती है ।

परागण का अर्थ? pollination meaning in hindi

परागण का अर्थ (meaning of pollination in hindi) - परागकणों (pollen grains) का विकास परागकोश (anther) में होता है तथा मादा युग्मक का विकास बीजाण्ड (ovule) में होता है ।

अर्थात् लैंगिक जनन के लिए परागकणों का वर्तिकाग्र (stigma) पर स्थानान्तरण होना आवश्यक होता है इस क्रिया को ही परागण (pollination in hindi) कहा जाता है ।

परागण की परिभाषा | definition of pollination in hindi

परागण की परिभाषा - "परागकणों का परागकोश से वृतिकाग्र पर स्थानान्तरण होना परागण कहलाता है ।"

"The transference of pollen grains from the anther to the stigma is known as pollination."


परागण क्या है? what is pollination in hindi

एक पुष्प के परागकणों को उसी पुष्प या उसी पौधें के दूसरे पुष्पों अथवा उसी जाति के अन्य पुष्पों के वर्तिकाग्रों पर पहुँचने को परागण (pollination in hindi) कहते हैं ।

पौधों में जनन की विधियों का ज्ञान पादप प्रजनन (plant breeding in hindi) के लिये प्राथमिक महत्व का है । विशेषतः नये पौधों में, उनकी जनन प्रकृति का ज्ञान प्रजनन कार्यक्रम के लिय अति आवश्यक है ।

फसलों वाले पौधों में जनन विधियों का विस्तार से अध्ययन किया गया है तथा अधिकतर महत्वपूर्ण फसलों में जनन की विधियों को अच्छे ढंग से स्थापित किया जा चुका है ।


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परागण कितने प्रकार का होता है? | types of pollination in hindi


परागण के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित है -

  • स्वपरागण ( Self pollination or Autogamy )
  • परपरागण ( Cross pollination or Altogamy )


परागण दो प्रकार का होता है -


1. स्वपरागण क्या है? | self pollination in hindi

परिभाषा - "जब एक पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरित होते हैं तो इसे स्वपरागण (self pollination in hindi) कहते है ।"

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स्वपरागण क्या है (self pollination in hindi)

जब एक पुष्प के परागकण उस पौधों के दूसरे पुष्पों के वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरित होते हैं तो इसे गिटनोगेंमी (geitnogamy) कहते हैं । यह स्वपरागण के अन्तर्गत आता है । पौधों की बहुत-सी जातियों में प्राकृतिक रूप से स्वपरागण होता है । उनमें स्वपरागण के अनुकूल के लिये विशेष प्रयुक्तियाँ विकसित हुई हैं।

स्वपरागित फसलों के उदाहरण -

  • गेहूं ( Wheat )
  • जई ( Oat )
  • जौ ( Barley )
  • चावल ( Rice )
  • जुट ( Jute )
  • आलू ( Potato ) इत्यादि ।


पौधों में स्वपरागण को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित प्रयुक्तियाँ विकसित हुई हैं -

  • द्विलिंगता ( Bisexuality or Hermaphroditism )
  • अनुन्मीलय परागण या क्लाइस्टोगेपी ( Cleistogamy )
  • समकालपक्वता ( Homogamy )


द्विलिंगता ( Bisexuality or Hermaphroditism ) -

नर व मादा दोनों जननांगों की एक पुष्प में उपस्थित स्वपरागण की प्राथमिक आवश्यकता हैं । सामान्यतः स्वपरागण (self pollination in hindi) द्विलिंगी पुष्पों में होता है । हालांकि उभयलिंगाश्रयी (monoecious) पौधों में भी इसकी सम्भावना हो सकती है ।


अनुन्मीलय परागण या क्लाइस्टोगेपी ( Cleistogamy ) –

ऐसे पुष्प जो कभी नहीं खिलते हैं उन्हें अनुन्मील्य परागणी (cleistogamous) पुष्प कहते हैं । इस प्रकार के द्विलिंगी पुष्पों में सदैव आवश्यक रूप से स्व परागण होता है ।

वास्तविक क्लाइस्टोगेमी (true cleistogamy) का उदाहरण डैन्थोनिया कैलिफार्निका (danthonia califormica) है । ये पुष्प - विन्यास कल्म (culm) तथा आच्छद (sheath) के बीच में उत्पन्न होती हैं तथा ये आच्छद से कभी भी बाहर नहीं आती है ।

इससे उत्पन्न वीज स्पष्टतया स्वपरगित होते हैं कुछ एक वर्षी फैसक्यु में, उदाहरणत: फेस्टूका मेगल्यूरा में , पुष्पक्रम बूट (boot) से उत्पन्न होती हैं परन्तु पुष्पिका (floretes) नहीं खुलती जिससे निश्चित रूप से स्वपरागण (self pollination in hindi) होता है । सलाद (lettuce) भी अनुन्मील्य है । इसमें वृतिकाय फूल खुलने से पहले परागित हो जाता है ।

कोमिलीना बैनगालैन्सिस (commelina bengalensis) में रंगहीन छोटे - छोटे फूल भूमि के अन्दर शाखाओं पर लगते हैं जो क्लाइस्टोगेम्स होते हैं । यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि अन्तः प्रजनन की परिशुद्धता आनुवंशिक तथा वातावरण के कारणों से रुपान्तरित हो सकती है ।


समकालपक्वता ( Homogamy ) -

द्विलिंगी पुष्पों में जब परागकोश तथा वर्तिकाय (अण्डप) एक साथ परिपक्व होते हैं तो इसे समकालपक्वता (homogamy in hindi) कहते हैं । ऐसे पौधों में स्वपरागण के अवसर अधिक होते हैं ।


इनमें स्वपरागण की विशेष प्रयुक्तियाँ भी पायी जाती हैं । उदाहरणतः -

  • कुछ पौधों में पुष्प परागण होने के पश्चात् खिलते हैं जिससे कि उनमें सामान्यतः स्वपरागण होता है । जैसे - गेहूँ, जौ, जई, मटर इत्यादि । परन्तु इनमें चैजमोगैमस (पुष्प जो खिलते हैं) व्यवहार के कारण कुछ मात्रा में (लगभग 46 प्रतिशत) पर - परागण भी हो जाता है ।
  • टमाटर में परागण हालांकि पुष्प खिलने के बाद होता है । परन्तु पूँकेसर वर्तिकाय के चारों ओर इस कदर घेरा बना लेते हैं कि स्वपरागण (self pollination in hindi) आवश्यक रूप से होता है । हालांकि कृषिगत टमाटर की किस्मों में वर्तिकाग्र की लम्बाई में कुछ भिन्नता भी पायी जाती है जिससे वर्तिकाग्र की स्थिति प्रभावित होती है जिससे कुछ परपरागण भी हो जाता है ।
  • कुछ पौधों में पुंकेसर पकने पर कुन्डलित हो जाते हैं जिससे परागकोश वर्तिकाम को छू लेते हैं जिसके फलस्परुप स्वपरागण होता है । जैसे — गुलाबांस (mirabilis jalapa) ।
  • कुछ पौधों में पुष्पों की संरचना ऐसी होती है कि परागकोश संकरी दलपुंज नलिका के मुख पर व्यवस्थित रहते हैं । अतः जब वर्तिकाय इसे धकेलकर बाहर निकलता है तो परागकोश फट जाते हैं । तथा परागकण वर्तिकाय पर पड़ जाते हैं । जैसे - रुक्मणी (Ixora), सदाबहार (vinca), गन्धराज (gardenia) ।

कुछ लटकाने वाले पुष्पों (drooping flowers) में वर्तिका पुँतन्तु से लम्बी होती है जिससे परागकण उस पर गिरते हैं या उर्ध्व (erect) पुष्पों में वर्तिका पुतन्तु से छोटी होती है जिससे सरलता से स्वपरागण हो जाता है ।


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2. परपरागण क्या है? | cross pollination in hindi

परिभाषा - "जब किसी पुष्प के परागकण दूसरे पोधों के वर्तिकाग्र पर स्थानान्तरित होते अर्थात् परागण दूसरे पौधे के परगकणों से होता है तो इसे परपरागण (cross pollination in hindi) कहते हैं ।"

परपरागण में पराग कणों को एक दूसरे पुष्प के ऊपर कीट, वायु, जल आदि के द्वारा पहुंचते है ।

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परपरागण क्या है (cross pollination in hindi)

प्राकृतिक रुप से अधिकांश पौधों में परपरागण होता है । इनमें परपरागण के अनुकूलन के लिये विशेष प्रयुक्तियाँ (contravencies) विकसित हुई हैं ।


परपरागित फसलों के उदाहरण -

  • मक्का ( Maize )
  • बाजरा ( Millet )
  • गन्ना ( Sugarcane )
  • सरसों ( Mustard )
  • सूरजमुखी ( Sunflower )
  • फूलगोभी ( Cauliflower ) इत्यादि ।


पौधों में परपरागण को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित प्रयुक्तियाँ विकसित हुई हैं -

  • भिन्नकालपक्वता ( Dichogamy )
  • एकलिंगता ( Unisexuality or Dicliny )
  • निःसृत वृतिका ( Excerted style )
  • कुक्षि की सतह की झिल्ली के द्वारा रक्षा
  • दलपुंज ( Corolla )
  • विषमरूपता ( Heteromorphy )
  • स्व अनिषेच्यता ( Self Incompatibility )


भिन्नकालपक्वता ( Dichogamy ) -

नर तथा मादा युग्मकों के परिपक्व होने के समय में अन्तर -


( i ) स्त्रीपूर्वता ( protogyny ) - 

जायांग पुंकेसर से पहले परिपक्व हो जाता है ।
जैसे - ऐवकेड़ो (advocados), अखरोट (walnuts) ।


( ii ) पूँपूर्वता ( Protoandary ) - 

पुंकेसर जायांग से पहले परिपक्व हो जाता है ।
जैसे - मक्का, गाजर (daucus carota), रास्पबेरी ।


एकलिंगता ( Unisexuality or Dicliny ) -

लिंग का अलग होना -


( a ) उभय लिंगाश्रयी ( Monoecious ) -

एक ही पौधे पर नर या मादा अंगों का अलग - अलग फूलों में होना ।
जैसे - मक्का, कुकुरबिटा, कुकुम्बर, अखरोट, स्ट्राबेरी ।


( b ) एकलिंगाश्रयी ( Dioecious ) -

नर तथा मादा फूलों का अलग - अलग पौधों पर होना जैसे - ह्यमुलस (humulus), शतावरी (asparagus), खजूर, भाँग (hemp), हाप (hops), पालक (spinach) । एकलिंगाश्रयी पौधे बिल्कुल परपरागित होते हैं परन्तु इनमें भाई - बहन संकरण (brother - sister mating) ।
जैसे - अन्तः प्रजनन रुप को नहीं हटाया जा सकता है ।


निःसृत वृतिका ( Excerted style ) का विकास -

जिससे स्वयं के पराग का वृतिकाग्र (stigma) पर जमा होना रुक जाता है । लाइकोपर्सिकम पिरुवियानम (lycopersicum perivianum) तथा एल० हिरसुटम (L, hirsutum) ।


कुक्षि की सतह की झिल्ली के द्वारा रक्षा —

जिससे पराग का अंकुरण रुक जाता है जब तक कि रक्षक स्तर कीटों के द्वारा तोड़ दी जाती है ।
जैसे - मेडिकागो सैटाइवा (medicago sativa) ।


दलपुंज ( Corolla ) की कील में लिंग अंगों का बन्द होना -

जिससे परागकण का वर्तिकाग्र पर निकलना रुक जाता है जब तक कि किन्हीं कीटों से कील दब नहीं जाती है । यह विधि लेग्युमिनोसी कुल में आम पायी जाती है, मुख्यतः मेडिकागो तथा ट्रायफोलियस जातियों में कुल स्पीशीज में पराग कीटों (visiting insects) के ऊपर वर्तिका (style) के कुछ उपभागों में जैसे - लैथिरस जातियाँ (lathyrus species) या तन्तु (filament) के बड़े भाग से जैसे कमल में छिड़क दिये जाते हैं ।


विषमरूपता ( Heteromorphy ) -

जहाँ पर परागाशय तथा वर्तिका अग्र अलग - अलग स्तरों पर विकसित होते हैं । वर्तिका (style) तथा परागाशय में दो अलग - अलग स्थिति पर विकसित होते हैं ।
जैसे - द्विवर्तिकी (distylic) प्रिम्यूला (primuula) जातियों में या एक से तीन अलग - अलग स्थितियों में विकसित होते हैं । त्रिवर्तिकी (tristylic), लाइथ्रम सैलिकेरिया (lythnum salicaria) पौधों में परागाशय का स्तर वर्तिका के स्तर का पूरक होता है या इसका उल्टा होता है । विषम वर्तिकी (hetero stylic) आनुवंशिकी रुप से नियन्त्रित अनिषेच्यता तन्त्र के साथ भी सम्बन्धित होती है ।


स्व अनिषेच्यता ( Self Incompatibility ) –

जब परागकण उसी पौधे के वर्तिकाम पर अंकुरित नहीं होते या वर्तिका की पूरी लम्बाई में नहीं घुस पाते जिससे निषेचन नहीं होता है । इस रीति में स्वनिषेचन रुक जाता है तथा असम्बन्धित व्यक्तियों में परनिषेचन बढ़ता है । यह विधि बहिः संकरण बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है । एकलिंगाश्रयी (dioccy) में बीज उत्पन्न करने की कुछ क्षमता कम हो जाती है । इससे द्विलिंगी पौधों में अन्तः जनन के कारण ओज घटने तथा अनुकूलन में कमी होना रुक जाता है ।


उच्च वर्गीय पौधों में स्व अनिषेच्यता प्रणाली दो प्रकार की पायी जाती है -

  • युग्मकोद्भिदी ( Gametophytic )
  • बीजाणु - उद्भिदी ( Sporophytic )


( a ) युग्मकोद्भिदी ( Gametophytic ) -

जिसमें स्वअनिषेच्यता युग्मकों की जीनोटाइप पर निर्भर करती है ।
जैसे - तम्बाकू ।


( b ) बीजाणु - उद्भिदी ( Sporophytic ) -

जहाँ पर स्वअनिषेच्यता युग्मकोद्भिद् पर इसके बीजाणु - उद्भिदी जनक से अंकित की जाती है ।
जैसे - क्रेपिस, फोटिड़ा, पार्थेनियम, अर्जेंटेटम ।


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जनन की विधि का निर्धारण एवं प्राकृतिक परागण की मात्रा स्थापित करना


अधिकतर महत्तवपूर्ण कृषिगत जातियों की जनन विधि तथा परपरागण (cross pollination in hindi) की मात्रा सुज्ञात है । हालांकि भिन्न - भिन्न वातावरणीय अवस्थाओं के लिये भिन्नता पाई जा सकती है ।

अतः सफल प्रजनन कार्यक्रम चलाने के लिए उस निश्चित क्षेत्र में संकरण की ठीक दर का निर्धारण आवश्यक होता है । कोई पौधा स्वपरागित है या परागित है, के निर्धारण का कार्य सरल व सीधा होता है ।

पौधा की पुष्प संरचना का अध्ययन प्रथम पग होता है । यदि पुष्प एकलिंगश्रयी (dioecious) या उभयलिंगी (monoecious) या भिन्नकालपाकी (dichogamous) या स्वअनिषेच्य (self incompatible) इत्यादि है तो यह जाति के परपरागित होने का प्रमाण है तथा यदि क्लाइस्टोगेमी (cleistogamous) है तो स्पष्टतः स्वपरागित है ।


सामान्यत: दूसरा पग एकल पौधे को विलगित (isolate) करके, बीज उत्पन्न होने या न होने का निरीक्षण करना है यदि बीज नहीं बनता है ता जाति परपरागित तथा यदि बीज पूरी मात्रा में बनता है जाति स्वपरागित होती है । पौधों का विलगन या पार्थक्य थैलों (bags) या पिंजरों (cages) के द्वारा भी किया जा सकता है परन्तु इनसे बीज बनने की प्रक्रिया का वातावरण प्रभावित हो सकता है ।

अतः दूरी के द्वारा विलगन की प्रविधि उपयुक्त समझी जाती है । इस विधि से परपरागित जातियों की पहचान काफी सरल होती है, परन्तु स्व - परागण स्थापित करना आपेक्षित कठिन होता है क्योंकि कुछ परम्परागत जातियों जैसे - मक्का में स्वपरागित बीज काफी मात्रा में बनता है ।

स्वपरागण (self pollination in hindi) का एक अच्छा सूचक (indicator), अन्तः प्रजनन का प्रभाव होता है । यदि अतन्तः प्रजनन बिना प्रतिकूल प्रभाव के होता है तो सम्भवतः जाति स्वपरागित होती है । एक बार यह स्थापित कर लेने के उपरान्त कि जाति स्वपरागित या परपरागित है, यह प्रश्न पैदा होता है कि भिन्न - भिन्न जातियों के पास - पास उगने पर प्राकृतिक संकरण की मात्रा कितनी होती है ।

इसका निर्धारण सामान्यतः अप्रभावी अंकन जीन (recessive marker gene) के परस्पर एकांतरण में प्रभावी जीन वाली किस्मों को उगाकर किया जा सकता है । अप्रभावी किस्म से बीजों का सलवन कर लिया जाता है तथा प्राकृतिक संकरण का आकलन प्रभावी एवं अप्रभावी संततियों के अनुपात से किया जाता है ।

इस प्रकार के अध्ययन के लिए बीज या बीजांकुर के गुण लेना अच्छा व सरल रहता है जैसे कि भ्रूणपोष या बीजपत्रों से सम्बन्धित गुण इन प्रयोगों में कई सावधानियाँ रखना चाहिएँ । पुष्पन काल, परागकणों, कीट वेक्टर (insect verctor), वायु की दिशा, तापक्रम इत्यादि कारक प्राकृतिक संकरण को प्रभावित करते हैं । भिन्न - भिन्न मौसमों तथा स्थानों में प्रयोग करना अच्छा होता है क्योंकि वातावरणीय कारकों में प्राकृतिक संकरण काफी प्रभावित हो सकता है ।


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जनन प्रणालियाँ एवं प्रजनन विधियाँ लिखिए? | reproduction systems and breeding method in hindi


जनन की प्रणालियाँ फसलों में प्रजनन की विधियाँ लागू करने में प्राथमिक महत्व रखती हैं । स्वपरागित समूह की प्रजनन विधियाँ परपरागित समूह की प्रजनन विधियों से अधिकतर भिन्न होती हैं । क्योंकि इन दोनों समूह की आनुवंशिक संरचना पर अन्तः प्रजनन अथवा बहिः प्रजनन से विशेष प्रभाव पड़ता है ।

बहिः प्रजनन जातियों की समष्टि (population in hindi) में सब पौधे अत्थिक विषमयुग्मज होते हैं तथा सभी में अन्तः प्रजनन करने से सामान्य ओज (general vigour) घटती है तथा दूसरे हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं ।

इन जातियों की व्यावसायिक किस्मों के लिए विषमयुग्मजता (heterozygosity) एक आवश्यक अंगस्वरुप है ।

यह या तो प्रजनन कार्यक्रम में बनाये रखनी चाहिये या कार्यक्रम के अन्तिम स्तर में पुनः एकत्र कर लेनी चाहिये । दूसरी ओर स्व - परागित पौधों की समष्टि में सामान्यतः बहुत - सी सह - सम्बन्धित समयुग्मजी लाइन्स का मिश्रण होता है जो कि, हालांकि, एक - दूसरे के साथ - साथ रहती हैं, परन्तु उनमें जनन लगभग स्वतन्त्रतापूर्वक होता है ।

इस प्रकार की समष्टि में प्रत्येक पौधा अपने आप में पूर्णतया, एक ओजपूर्ण समयुग्मज होता है । इन जातियों में प्रजनन का ध्येय शुद्ध वंशक्रम (pure line in hindi) प्राप्त करना होता है । प्रजनन कार्यक्रम का सामान्य ढंग किसी भी जाति के लिए जनन की विधियों से उतना ही प्रभावित होता है जितना कि किसी दूसरे एक कारण से उस जाति में हो सकता है । जिन पौधों में अलैंगिक जनन हो सकता है उसके पादप प्रजनन (plant breeding in hindi) कार्यक्रम में दूसरी विधि भी सम्भव हो जाती है ।

सामान्य प्रजनन कार्यक्रम के निर्धारण को प्रभावित करने के अलावा स्पीशीज की जनन विज्ञान का दूसरी विशेष प्रक्रियाओं को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण कार्य है जो कि सफलता के लिये आवश्यक ।

आधुनिक पादप प्रजनन में उपयुक्त जनकों में संकरण बहुत महत्वपूर्ण है । नियन्त्रित संकर सरलता से प्राप्त करने के लिये या स्वपरागण (self pollination in hindi) करने के लिये तथा प्रजनन की विधियों को कार्यन्वित करने में प्रजनन विज्ञान का जानना अत्यन्त आवश्यक है ।

जैसे - मक्का में प्रजनन का जो कार्यक्रम स्वपरागण तथा प्रसंकरण करने में अति सफलतापूर्वक किया जाता है वह दूसरी पर - परागित फसल बरसीम में ध्येय तथा कार्यान्वित करने के लिये अति कठिन है, जिसमें स्वपरागण तथा नियन्त्रित परागण कठिन है ।

इसी प्रकार से, जिस आसानी से स्वपरागण तथा नियन्त्रित परागण कठिन है । इसी प्रकार से, जिस आसानी से स्वपरागित स्पीशीज जैसे तम्बाकू में स्वपरागण से बीज (selled seeds) या अधिक संख्या में संकर बीज प्राप्त किया जा सकता है, जईं जो कि स्वपरागित जाति है, में लागू किये गये प्रजनन कार्यक्रम से काफी अन्तर होता है । इसमें कृत्रिम संकर बहुत श्रम तथा अधिक खर्चे से प्राप्त की जा सकती है ।

बहुत - सी जातियाँ इतनी अधिक स्वनिषेचित होती हैं कि उनमें प्रजनन नर्सरियों तक में बहिः प्रजनन से बचाव करना अनावश्यक होता है चाहे उसकी विभिन्न प्रकार कितनी ही पास - पास उगी हों जबकि दूसरी जातियों में बहिः प्रजनन इतना अधिक होता है कि परागण (pollination in hindi) पर नियन्त्रण करना आवश्यक होता है ।

सामान्यतः वनस्पति प्रवर्धन वाली कृषि किस्में बहुत अधिक विषमयुग्मजी होती हैं तथा लैंगिक जनन करने पर बहुत पृथक्करण करती हैं क्योंकि छाँटी गई व्यवसायिक किस्में अधिकतर ओजपूर्ण होती हैं तथा अधिकतर जातियों में ओज तथा विषमयुग्मजा में एक सम्बन्ध होता है ।

यह ध्यान रखने योग्य है कि जिन जातियों को सामान्यतः वनस्पतिक प्रवर्धन द्वारा नहीं उगाया जाता है उनमें किसी विशेष जीनोटाइप वाले बीज अधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिये वनस्पतिक साधनों के द्वारा उगाया जा सकता है । अलैंगिक जनन में लगातार एक ही जीनोटाइप वाली सन्तति मिलती रहती हैं ।

यह पादप प्रजनन (plant breeding in hindi) के लिये बहुत ही लाभदायक सिद्ध होती है क्योंकि जीनोटाइप में काफी मात्रा में विषमयुग्मजता होने पर अन्ततः बड़ी संख्या में समान जीनोटाइप वाले व्यक्ति प्राप्त किये जा सकते हैं ।

प्रजनन प्रोग्राम में बहुत अच्छे पौधे मिलने पर प्रजनक, लाभ उठा सकता है । इस वजह से इन फसलों मैं दूसरी फसलों की अपेक्षा प्रजनन आसान रहता है । लैंगिक जनन के द्वारा इच्छित पुनः संयोजन प्राप्त करने के अलावा, अलैंगिक पौधों में प्रजनन से प्राकृतिक तथा कृत्रिम रुप से उत्पन्न इच्छित उत्परिवर्तन स्पोटर्स की खोज करने में उपयोग किया जा सकता है ।

स्पष्टतया जनन विधियों का ज्ञान पादप प्रजनन के लिये मौलिक महत्व रखता है । किसी भी प्रजनन कार्यक्रम में जनन विधियें के ज्ञान का तर्कपूर्ण निश्चय आवश्यक है ।


जनन प्रणालियों के आधार पर प्रजनन की विधियाँ निम्न प्रकार की होती हैं -


1. स्व - परागित फसलों में प्रजनन की विधियाँ ( Methods of Breeding for Self - pollinated Crops )

( i ) प्रवेशन ( Introduction )
( ii ) वरण ( Selection )
( a ) पुंज चयन ( Mass Selection )
( b ) विशुद्ध वंशाक्रम वरण ( Pure Line Selection )

( iii ) प्रसंकरण ( Hybridization )
( a ) वंशावली विधि ( Pedigree Method )
( b ) प्रपुंज विधि ( Bulk Method )
( c ) पुंज वंशावली विधि ( Mass Pedigree Method )
( d ) संकर पूर्वज संकरण ( Back cross Method )
( c ) बहुसंकरण ( Multiple Crosses )


2. पर - परागित फसलों में प्रजनन की विधियाँ ( Method of Plant Bredding for Cross Pollinated Crops )

( i ) प्रवेशन ( Introduction )
( ii ) वरण ( Selection )
( a ) पुंज चयन ( Mass Selection )
( b ) संतति वरण एवं वंशक्रम प्रजनन ( Progeny Selection and Line Breeding )
( c ) प्रत्यावर्ती वरण ( Recurrent Selection )

( iii ) प्रसंकरण ( Hybridization )
( a ) संकर किस्में ( Hybrid varities )
( b ) संश्लिष्ट किस्में ( Synthetic varicties )


3. वनस्पति प्रवर्धित फसलों में प्रजनन की विधियाँ ( Method of Plant Breeding for Vagetatively Propogated Crops )

( i ) प्रवेशन ( Introduction )
( ii ) वरण ( Selection )
( a ) कृतन वरण ( Clonal selection )

( iii ) प्रसंकरण ( Hybridization )

प्रजनन की नयी तकनीक ( New Breeding Techniques )
( i ) उत्परिवर्तन ( Mutation )
( ii ) बहुगुणिता ( Polyploidy )

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