पौधों में जल के अवशोषण की क्रियाविधि एवं इसे प्रभावित करने वाले कारक लिखिए

पौधों में जल का अवशोषण (water absorption in plants in hindi) मुख्यत: उनकी जड़ों (मूल रोम) के द्वारा ही होता है ।

एक मूल रोम, एक कोशिकीय नालिकावत संरचनायें होती है जो कि उत्पन्न होने वाली कोशिका के पार्श्व विस्तार से बनती हैं । ये अत्यधिक रिक्तिकीय एवं पतली भित्ती वाली होती हैं ।


पौधों में जल के अवशोषण कैसे होता है? water absorption in plants in hindi

प्राकृतिक परिस्थितियों में मूलीय पौधों द्वारा जल का अवशोषण (water absorption in hindi) मूल तन्त्र द्वारा ही होता है ।

जड़ों का वह भाग जिसके द्वारा जल का अवशोषण होता है, मूल रोम क्षेत्र (root hair zone) है ।


पौधों की जड़ों द्वारा जल के अवशोषण की क्रिया विधि का वर्णन कीजिए? | mechanism of water absorption in plants in hindi

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पौधों में जल के अवशोषण की क्रियाविधि एवं इसे प्रभावित करने वाले कारक लिखिए


पौधों में जल के अवशोषण की क्रिया विधि कितने प्रकार की होती है? | types of mechanism of water absorption in plants in hindi


पौधों में जल के अवशोषण की क्रिया विधि दो प्रकार की होती है -

  • निष्क्रिय अवशोषण ( Passive Absorption ) 
  • सक्रिय अवशोषण ( Active Absorption )


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निष्क्रिय अवशोषण ( Passive Absorption )

मृदा से जल का अवशोषण (water absorption in hindi) मूल रोमों तथा कुछ मात्रा में बाह्यत्वची कोशिकाओं द्वारा होता है फिर यह वल्कुट ऊतकों अन्तस्त्वचा तथा परिरम्भ से होकर अन्ततः जाइलम नलिकाओं में पहुँच जाता है । जड़ों की जाइलम नलिकायें, प्रत्यक्ष रूप से स्तम्भ की जाइलम नलिकाओं से जुड़ी रहती हैं जिससे जल जड़ों से स्तम्भ में चला जाता है । स्तम्भ में जल - संवाहक ऊतक एक जटिल जाल रूप में होता है जो कि अन्ततः पत्तियों की बारीक शिराओं में समाप्त होती है । पत्तियों की शिराओं से जल पर्णमध्योतक कोशिकाओं में जाता है तथा इनकी सतह से जल वाष्पित होकर जलीय वाष्प के रूप में, रन्ध्रों द्वारा बाहरी वातावरण में चला जाता है ।

इस प्रकार मूल रोमों से लेकर पत्तियों के रन्थ्रों तक जल की निरन्तर धारा रहती है । इस विधि में जल का अवशोषण स्तम्भ की क्रिया वाष्पोत्सर्जन के द्वारा उष्मा गतिक बल (thermodynamic force) परिणामस्वरूप होता है । जड़ केवल अवशोषण सतह का काम करती है अतः जल के अवशेषण की यह विधि निष्क्रिय है ।

यह इस तथ्य से भी स्पष्ट प्रमाणित होता है कि जल का अवशोषण मृत जड़ों द्वारा, बल्कि करैमर (1959) के अनुसार मृत जड़ों से अधिक तेजी से जल अवशोषित होता है तथा यहाँ तक कि जल लेने में अवरोध जीवित कोशिकाओं द्वारा हो सकता है ।

निष्क्रिय अवशोषण में जल - गति पूर्णतः रासायनिक विभव - प्रवणता की ऊष्मा गतिक शक्ति पर निर्भर करती है ।


सक्रिय अवशोषण (Active Absorption)

सक्रिय अवशोषण के द्वारा बहुत कम जल का अवशोषण होता है । जल के सक्रिय अवशोषण का अर्थ रासायनिक विभव प्रणवता के विपरीत जल अवशोषण से है, अर्थात् इस क्रिया विधि में उपापचयी ऊर्जा का उपयोग होता है । सक्रिय अवशोषण जड़ में हुई क्रियाओं द्वारा होता है इसका सम्बन्ध स्तम्भ से नहीं होता है ।


सामान्यतः सक्रिय अवशोषण की दो क्रिया विधि मानी जाती है -

  1. परासरणी क्रिया - विधि द्वारा ( Through Osmotic Mechanism )
  2. अ-परासरणी क्रिया - विधि ( Non - Osmotic Mechanism )


1. परासरणी क्रिया - विधि द्वारा सक्रिय अवशोषण -

इस विधि में मृदा से जड़ों में जल का अवशोषण बढ़ती हुई ऋणात्मक परासरणी विभव प्रवणता के फलस्वरूप होता है । अर्थात् कोशिका - रस का परासरणी दाब, मृदा घोल से अधिक होता है अतः विसरणी दाब न्यूनता शक्ति के परिणामस्वरूप अर्ध पारग्मय प्लाज्मा झिल्ली में से परासरणी विसरण द्वारा कोशिका में जल प्रवेश करता है तथा मूलीय बाह्यत्वची कोशिका से वल्कुट अन्तस्त्वचा परिरम्भ अन्ततः जाइलम नालिकाओं में विलेय की सान्द्रता निरन्तर बढ़ने से गति करता है ।

जल अवशोषण की क्रिया में परासरणी विभव ही वाहक बल होता है । इसमें प्रत्यक्ष रूप से ऊर्जा की आवश्यकता नहीं पड़ती है । ऊर्जा का उपयोग लवणों के अवशोषण तथा एकत्रीकरण में होता है । अतः इस विधि को भी आधुनिक वैज्ञानिक निष्क्रिय प्रक्रम मानते हैं ।

2. जल का अ-परासरणीय अवशोषण ( Non - osmotic absorption of water ) -

जल के अ-परासरणी अवशोषण का अर्थ रासायनिक प्रवणता के विपरीत जल अवशोषण से है जिस क्रिया - विधि में उपापचयी ऊर्जा का उपयोग होता है । यदि विलेयों का सक्रिय संवहन हो सकता है तो जल का सक्रिय संवहन क्यों नहीं हो सकता है?

सामान्यतः जल के सक्रिय संवहन के विपरीत दो बातें हैं । प्रथम, जल का अवशोषण बहुत अधिक मात्रा में होता है । द्वितीय कोशिका झिल्ली की पारगम्यता दूसरे अवयवों की अपेक्षा जल के लिये अधिक होती है ।

अतः अब जल के सक्रिय संवहन के लिये अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ेगी जो कि सामान्यतः पौधे की क्षमता से अधिक होंगी । जल का सक्रिय अवशोषण जल की अत्यधिक न्यूनता में सम्भव हो सकता है जैसे कि मरुद्भिद जातियों में पाया जा सकता है ।


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जल के अवशोषण की प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिये? | factors affecting the absorption of water in hindi

जड़ों द्वारा जल का अवशोषण (water absorption in hindi) को बहुत से कारक प्रभावित करते हैं । इनमें मृदा कारक (soil factors) अधिक महत्वपूर्ण होते हैं हालाँकि वातावरणीय कारक भी जल के अवशोषण को प्रभावित करते हैं ।


पौधों में जल के अवशोषण की प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित है -

  • मृदा का तापक्रम ( Temperature of the Scil )
  • मृदा घोल की सान्द्रता ( Concentration of the soil solution )
  • मृदा का वातन ( Aeration of Soil )
  • मृदा जल की उपलब्धता ( Availability of Soil water )
  • मूलतन्त्र के गुणों का जल अवशोषण पर प्रभाव ( Characteristics of root system affecting water absorption )


जल के अवशोषण को प्रभावित करने वाले कारक (factors affecting the absorption of water) -


मृदा का तापक्रम ( Temperature of the Soil )

भूमि का तापक्रम जल अवशोषण की दर को प्रभावित करता है । मृदा का कम तापक्रम होने से जल का गाढ़त्व (viscosity of water) बढ़ जाता है, जिससे जल की गतिशीलता कम हो जाती है । कम तापक्रम पर प्रोटोप्लाज्म की पारग्मयता कम होती है तथा जड़ों की वृद्धि रुक जाती है । इन सब कारकों के संयुक्त प्रभाव से जल अवशोषण कम हो जाता है ।


मृदा घोल की सान्द्रता ( Concentration of the soil solution )

पौधों में जल का अवशोषण (water absorption in plants in hindi) जड़ों की आन्तरिक कोशिकाओं के कोशिक - रस मृदा घोल की जल - विभव प्रवणता (water potential gradient) पर निर्भर करता है । वास्तव में, यदि मृदा घोल का परासरणी विभव (osmotic potential) जड़ों की कोशिकाओं के कोशिका - रस से अधिक ऋणात्मक हो जाये तो पौधे में जल अवशोषित होने के बजाय बाहर निकलने लगेगा । अतः पौधे द्वारा जल अवशोषण के लिये मृदा घोल का परासरणी विभव जड़ों की कोशिका - रस से अधिक धनात्मक होना चाहिये । कुछ लवण मृदोभिद् (halophyte) पौधों की मृदा घोल की अधिक लवण सान्द्रता के प्रति सहुष्णता अन्य पौधों की अपेक्षा अधिक होती है । इन पौधों का परासरणी विभव अन्य पौधों की अपेक्षा अधिक ऋणात्मक होता है ।


मृदा का वातन ( Aeration of Soil )

मृदा का वातन कम होने से जल अवशोषण घटता है । जल अवशोषण पर कम वातन के प्रभाव के कई कारण हैं । ऑक्सीजन कम मिलने से जड़ो की वृद्धि तथा उपचयन (metabolism) घट जाता है । उपाचयन के कम होने से लवणों का अवशोषण व एकत्रीकरण कम हो जाता है जिससे जड़ों की जल अवशोषण की शक्ति कम हो जाती है । जड़ों में कार्बन डाई ऑक्साइड के एकत्र होने से जल - अवशोषण ऑक्सीजन की मात्रा कम होने की अपेक्षा, अधिक मंदक प्रभाव पड़ता है । CO2 की मात्रा बढ़ने से प्रोटोप्लाज्म की विसकासिता (viscosity) बढ़ जाती है तथा उसकी पराग्मयता कम हो जाती है इन दोनों से जल अवशोषण मंद हो जाता है । जलमक्रान्ति (water logging) परिस्थितियों में तेज सूर्य के प्रकाश में कम वातन के परिणाम स्वरूप पौधे मुरझा जाते हैं । यह मृदा की शरीर - क्रियात्मक शुष्कता (Physiological dryness) का एक उदाहरण हैं । ।


मृदा जल की उपलब्धता ( Availability of Soil water )

मृदा के अन्दर का सारा जल पौधे को उपलब्ध नहीं होता है । मूलतन्त्र के समीपस्थ क्षेत्र का जल समाप्त होने के बाद, पौधे द्वारा जल का अवशोषण (water absorption in plants in hindi) कठिन से कठिनतम होता चला जाता है क्योंकि जल को मृदा में रोकने वाले भौतिक कारक, पौधे द्वारा जल लेने वाले भौतिक कारकों की अपेक्षाकृत शक्तिशाली होते रहते हैं ।

खेत क्षमता ( Field Capacity ) -

मृदा में जल की वह मात्रा होती है जो कि यदि मृदा को जल से पूर्णतः तर करके जल तब तक निकलने दिया जाय जब तक कि जल की कोशिका गति (capillary movement) आवश्यक रूप से रुक जाये ।

PWP ( Permanent Wilting Percentage ) -

मृदा में जल की वह शेष मात्रा होती है जब उस भूमि में उगे हुये पौधे की पत्तियाँ प्रथम बार स्थायी म्लानता (permanent wilting) के लक्षण प्रदर्शित करे अर्थात् मुरझाई हुई पत्तियों को संतृत्प (saturated) वायुमण्डल में रखने पर वे फिर से स्फीत (turgor) न हों ।

TSMS ( Total Soil Moisture Stress ) –

मृदा घोल के परासरणी विभव (osmotic potential) तथा मृदा - आद्रर्ता - तनाव (soil moisture tension) के योग को TSMS कहते हैं ।


मृदा आद्रर्ता तनाव का अर्थ उन सभी गुरुत्वीय (gravitational), अधिशोषणीय (adsorptive ) एवं द्रवस्थैतिक बलों से है जो कि जल को मृदा में रोके रखते हैं । चिकनी मिट्टी (clay soil) की बालू (sand) से खेत - क्षमता (field capacity) एवं PWP अधिक होती है ।

हालांकि यह खेत तथ्य, खेत - क्षमता के लिये सत्य है परन्तु किसी मृदा का PWP भिन्न - भिन्न पौधों के लिये विभिन्न हो सकता है ।

उदाहरणतः समोद्भिद पौधों का परासरणी विभव लगभग-20 bars होता है जबकि कुछ लवणोद्भिदों (halophytes) का - 200 bars तक होता है । परासरणी विभव में यह अत्यधिक अन्तर पौधों की मृदा से जल अवशोषण करने की भिन्न - भिन्न क्षमता का द्योतक है ।

अर्थात् किसी मृदा का PWP पौधे की मृदा जल लेने की क्षमता पर निर्भर करता है यह मृदा की आर्द्रता स्थिरांक (soil moisture constant) पर नहीं निर्भर करता है ।

अतः मृदा का PWP पौधे के परासरणी विभव द्वारा निर्धारित होता है । दिन के समय, जब जड़ों की सतह के आसपास की मृदा का जल घट जाता है तो इसका TSMS बढ़ जाता है और यह रात के समय घट जाता है क्योंकि शेष मृदा से जल जड़ों की तरफ गति करता है । इस क्रिया को रात की पुनः प्राप्ति (night recovery) कहते हैं । पौधे का जल विभव (water potential) भी इस प्रतिमान (pattern) के अनुसार के होता है ।


मूल तन्त्र के गुणों का जल अवशोषण पर प्रभाव ( Characteristics of root system affecting water absorption )

विभिन्न पौधों का मूल तन्त्र, बनावट तथा भूमि में प्रवेश के विस्तार में काफी भिन्नता पायी जाती है ।

अतः उनकी जल अवशोषण की क्षमता भी भिन्न - भिन्न होती है कुछ पौधों के मूल तन्त्र भूमि में गहराई तक प्रवेश करते हैं परन्तु कुछ मूल तन्त्र सघन जालिकावत शाखाओं के बने होते हैं तथा ये ऊपरी सतह में फैली रहती हैं ये भूमि में गहराई तक प्रवेश नहीं करती हैं हैं । मूल तन्त्र के मूल रोम क्षेत्र से ही क्षेत्र की पारगम्यता सर्वाधिक होती है । मूलरोम अधिकतर जल अवशोषण होता है । इस अति कोमल संरचनायें होती हैं तथा ये अल्पकाल तक ही रहती हैं ।

इसके उपरान्त मूल के क्षेत्र में द्वितीय वृद्धि हो जाती है, जिसके परिणामस्वरूप परित्वक (periderm) बन जाती है तथा कोशिकाओं पर सुबेरिन लिग्निन या क्यूटिन का जमाव हो जाता है जिससे कि वह भाग जल के लिये अपारगम्य हो जाता है ।

हालांकि कुछ पौधे के मूल तन्त्रों में इस भाग से भी जल का अवशोषण (water absorption in hindi) होता है जो कि मुख्यतः वातरन्ध्रों (lenticels), घावों तथा जड़ों के टूटने के स्थानों द्वारा होता है ।


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मूल रोमों का जल अवशोषण से क्या सम्बन्ध होता है? relation of root hairs with water absorption in hindi


मूल रोमों का जल अवशोषण से सम्बन्ध ( Relation of Root Hairs with Water Absorption ) -

प्राकृतिक परिस्थितियों में मूलीय पौधों द्वारा जल का अवशोषण मूल तन्त्र द्वारा ही होता है । जड़ों का वह भाग जिसके द्वारा जल का अवशोषण होता है, मूल रोम क्षेत्र (root hair zone) है ।

मूल रोम नालिकावत (tubular) संरचनायें होती हैं जो उत्पन्न होने वाले बाह्यत्वचीय (epidermal) कोशिका के पार्श्व विस्तार से बनती हैं । मूल रोम अत्यधिक रिक्तिकीय (highly vacuolated) एवं पतली भित्ति वाले होते हैं । ये मृदा के विस्तृत क्षेत्र के सम्पर्क में रहते हैं ।

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मूल रोमों और बहुत कम मात्रा में दूसरी बाह्यत्वची कोशिकाओं में जल विभव प्रवणता (water potential gradient) के परिणामस्वरूप जल - विसरित होता है जब तक जड़ की कोशिकाओं के रस (cell sap) का जल - विभव (water potential) मृदा विलयन (soil solution) से अधिक ऋणात्मक रहता है तो जड़ों में प्रवेश करने वाले जल की मात्रा बाहर निकलने वाले जल से अधिक होती है । कोशिका - रस में विलेय की सान्द्रता बढ़ने से अथवा इसका स्फीति दाब (turgor pressure) कम होने से इनके कोशिका - रस में और भी अधिक ऋणात्मक जल - विभव विकसित होगा ।

परिणामतः पौधों में जल का अवशोषण (water absorption in plants in hindi) होता है ।


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