बसन्तीकरण (vernalization in hindi) विधि के विषय में सबसे पहले अनुप्रयोग क्लीपार्ट (1857) ने किये ।

बसन्तीकरण (vernalization in hindi) का आधुनिक ज्ञान लाइसेन्को, गैसनर आदि आरम्भिक अन्वेषकों के कार्य पर आधारित हैं ।

बसन्तीकरण किसे कहते है? | vernalization in hindi

बहुत से पौधे में पुष्पन के प्रारम्भन एवं विकास पर तापक्रम का प्रभाव पाया गया है । धान्यों में दो प्रकार की जातियाँ पायी जाती हैं । एक वार्षिक (annual) पौधों या बसन्त (spring) प्रारूप में फल एक ही वृद्धि काल (growing season) में आते हैं ।

द्विवर्षी (biennial or "winter" types) में सामान्यतः तब तक फूल नहीं आते हैं जब तक कि खेत में उन पर शीत ऋतु (winters) नहीं गुजर लेती हैं । इन धान्यों (cereals) में प्रयोगों से यह प्रमाणित हुआ है कि इन पौधों में पुष्पन के लिये निम्न ताप (low temperature) आवश्यक होता है । इन पौधों में निम्नताप न देने पर, केवल वनस्पति वृद्धि ही होती है । इनमें उचित ताप प्रचरण देने तथा ठीक प्रदीप्ति काल देने से पुष्पन हो जाता है ।

प्रयोगों से यह भी प्रमाणित हुआ है कि इन (अधिकतर द्विवर्षी) को “कृत्रिम" शीत अभिक्रिया (cold treatment) देने पर तथा उपयुक्त प्रदीप्ति काल एवं तापक्रम देने पर प्रथम वृद्धि काल में ही पुष्पन हो जाता है ।

इस प्रकार से, द्विवर्षी में एक वार्षिक के समान समय में ही पुष्पन किया जा सकता है ।

बसन्तीकरण की परिभाषा (definition of vernalization in hindi) -

"इस प्रकार शीत अभिक्रिया द्वारा पुष्पन प्रारम्भन में विशेषित वर्धन को बसन्तीकरण (vernalization in hindi) कहते हैं ।"

The specific promotion of flower initiation by a previous cold treatment is termed vernalization. - Hillman

Acquisition of acceleration of the ability to flower by a chilling treatment is termed vernalization. - Chouard (1960)


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बसन्तीकरण की प्रक्रिया लिखिए? | the process of vernalization in hindi

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बसन्तीकरण की प्रक्रिया -


बसन्तीकरण पर मुख्य कार्य हाइओसायमस नाइजर (hyoscyamus niger) तथा पेटक्स राई (secale cereale var. petkus) पर किया गया है ।

हाइओसायमस नाइजर - की एक वार्षिक तथा द्विवर्षी प्ररूप होती है । एक वार्षिक जाति एक वृद्धि काल में पुष्पन करती है जबकि द्विवर्षी प्ररूप में दूसरे वृद्धि काल में पुष्पन से पहले शीत ऋतु की आवश्यकता होती है । हालांकि यह गुण आनुवांशिक नियंत्रण (genetic control) में होता है ।

तथापित इसका प्रतिस्थापन वातावरणीय कारक, शीत अभिक्रिया (cold treatment) द्वारा होता है ।

एक वार्षिक के समान द्विवर्षी भी दीर्घ प्रदीप्ति काल पौधा होता है अल्प प्रदीप्ति काल में तापक्रम अभिक्रिया के बाद भी, यह वनस्पतिक अवस्था में ही रहता है ।

द्विवर्षी पर शीत तापक्रम अभिक्रिया से गुणात्मक अनुक्रिया (response) होती है । अर्थात् जब तक इसे निश्चित काल तक निम्न तापक्रम 1°C पर नहीं रखते हैं तो यह पूर्ण रुपेण वनस्पतिक ही बना रहता है ।

यदि इसकी कम से कम 10 दिन तक की अवस्था में रोजेट बनने पर, बसन्तीकरण (vernalization in hindi) कर दिया जाता है तथा उचित प्रदीप्ति काल प्रदान किया जाता है तो उसी वृद्धि काल में पुष्पन हो जाता है । इसमें 10 दिन की अवस्था तथा रोजेट (rosette) अवस्था शीत - अभिक्रिया की प्राथमिक आवश्यकतायें हैं ।


पेटक्स शीतराई (secale cereale) -

इसकी एक वार्षिक प्ररूप में भी एक वृद्धि काल में पुष्पन तथा फलन होता है । शीतकालीन प्रभेद द्विवर्षी होती है इनमें प्रथम वृद्धि काल में वनस्पतिक वृद्धि होती है, तथा द्वितीय काल में लम्बे शीत काल के बाद पुष्पन तथा फलन होता है ।

शीतकाल प्रभेदों के नम बीजों का कुछ समय के लिये 1°C पर बोने से पहले बसन्तीकरण (vernalization in hindi) करने के बाद ये बसन्त प्रभेदों के समान व्यवहार करती हैं ।

पेटक्स राई की शीत अभिक्रिया बीज अवस्था में की जा सकती है तथा इसकी कोई परम आवश्यकता भी नहीं होती है । इसमें पुष्पन काल लगभग आधा घट जाता है तथा इसमें एक बार प्राप्त की गई उत्तेजना रोपण में से विसरित नहीं होती है ।


बसन्तीकरण का स्थान (the site of vernalization in hindi) -

प्रयोगों से यह प्रमाणित हुआ है कि बसन्तीकरण के स्थान पौधे के वृद्धि बिन्दु होते हैं । मैलचर (1948) के अनुसार तनों के सिरे (tips) बसन्तीकरण (vernalization in hindi) अवगम (perception) के भाग होते हैं तथा यहाँ से बसन्तीकरण पदार्थ का अभिगमन दूसरे भागों की ओर होता है ।

वैलेन्सीक (1948) के अनुसार क्रियाशील कोशिका विभाजन के सभी भाग बसन्तीकरण (vernalization in hindi) अवगम के स्थान होते हैं ।


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बसन्तीकरण पर तापक्रम तथा इसकी अवधि का प्रभाव | the effect of temperature and its duration on vernalization in hindi

बसन्तीकरण में शीत अभिक्रिया का प्रभाव इसकी अवधि तथा तापक्रम पर निर्भर करता है । लैंग (1951) के हाइओसाइसम नाइजर के प्रयोगों के अनुसार 3 से 17°C तापक्रम काफी होता है ।

यदि बसन्तीकरण (vernalization in hindi) 105 दिन तक किया जाता है । पुष्पन 8 दिन में ही प्रेक्षित किया जा सकता है । 10°C तापक्रम पर 15 दिन तक बसन्तीकरण पुष्पन के लिये बहुत प्रभावशाली पाया गया है । 3 से 6°C तापक्रम पर 10 दिन तक बसन्तीकरण (vernalization in hindi) पुष्पन आरम्भन के लिये सबसे प्रभावकारी होता है ।

हैन्सल (1953) ने पेटक्स राई में तापक्रम का बसन्तीकरण पर प्रभाव का अध्ययन किया । -4 ° C से निम्न तापक्रम पर बसन्तीकरण समाप्त हो जाता है परन्तु इससे ऊपर 14°C तक का तापक्रम बसन्तीकरण के लिये प्रभावी होता है । 1 से 7 ° C तापक्रम पुष्पन के लिये, दिनों की संख्या कम करने के लिये अधिक प्रभावकारी होता है ।

सारांशतः बसन्तीकरण (vernalization in hindi), तापक्रम तथा बसन्तीकरण की अवधि पर निर्भर करता है इन दोनों के इष्टतम संयोग का प्रत्येक जाति के लिये निर्धारण कर लेना चाहिये ।


बसन्तीकरण का क्या महत्त्व है? importance of vernalization in hindi


बसन्तीकरण का महत्व (importance of vernalization in hindi) -

  • बसन्तीकरण के द्वारा पौधे के वनस्पतिक काल को कम किया जा सकता है जिससे पुष्पन जल्दी करके कम समय में फसल प्राप्त की जा सकती है ।
  • इससे द्वि - वर्षी पौधों को एक - वार्षिक पौधों में बदला जा सकता है ।
  • शीत धान्यो (winter cereals) की फसलों को बसन्त ऋतु में उगाया जा सकता है ।
  • इससे शीत अवरोधकता (cold resistance) को बढ़ाया जा सकता है ।
  • इसके द्वारा पौधों को जलाभाव (drought) से बचाया जा सकता है ।
  • ठण्डे देशों में जहाँ अति शीत होता है; जैसे- रूस, स्वीडन इत्यादि में बसन्तीकरण (vernalization in hindi) कृषि के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण होता है वहाँ पर पौधों को अति शीत से बचाया जा सकता है तथा धान्यो की एक वर्ष में दो फसलें ली जा सकती हैं ।


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बसन्तीकरण की क्रियाविधि लिखिए? | mechanism of vernalization in hindi


बसन्तीकरण की क्रियाविधि के लिये कई परिकल्पनायें की गई हैं -

लाइसेन्को ने 'phasic development theory' प्रस्तुत की थी इस परिकल्पना के अनुसार पौधे के जीवन में वृद्धि एवं विकास दो भिन्न - भिन्न अवस्थायें हैं । प्रत्येक अवस्था के लिये भिन्न - भिन्न आवश्यकतायें होती हैं । वृद्धि अवस्था से विकास अवस्था अन्तरण के लिये निम्न ताप अभिक्रिया आवश्यक होती है । यह वाद अमान्य है ।

ग्रेगरी तथा प्रविश (1952) एवं मैलचर तथा लैंग (1948) ने हॉर्मोन्स के आधार पर लगभग समान परिकल्पना प्रस्तुत की ।

एक पदार्थ A निम्न ताप के प्रभाव से B पदार्थ में परिवर्तित हो जाता है । B अस्थायी होता है उच्च ताप पर यह वापिस A में भी बदल सकता है या यह C उत्पाद में बदल सकता है । यह व्याख्या "devernalization" को प्रमाणित करती है ।

यदि निम्न ताप बना रहता है B एक पदार्थ C में बदल सकता है । जोकि बसन्तीकरण के लिये अन्तिम स्थायी उत्पाद होता है । मैलचर ने इस अन्तिम स्थायी पदार्थ को वरनेलिन (vernalin) कहा ।

पुष्पन के लिये वरनेलिन (vernalin) ही काफी नहीं होता है, जैसा कि हाइओसाइमस तथा पेक्टस शीत राई में प्रेक्षित किया है इसके बाद उचित प्रदीप्ति काल की पुष्पन के आरम्भन के लिये आवश्यकता होती है । चैलेखयान ने एन्थेसीन परिकल्पना के आधार पर दीर्घ प्रदीप्ति काल पौधों में बसन्तीकरण (vernalization in hindi) की व्याख्या दी है ।

उनका सुझाव है कि निम्न तापक्रम में वरनेलीन उत्पन्न होता है जोकि दीर्घ दिवसो (long days) में जिब्रेलीन में परिवर्तित हो जाता हैं । यह पहले से उपस्थित एन्थेसीन से पुष्पन उत्पन्न करता है । अल्प प्रदीप्ति काल में वरनेलीन जिब्रेलीन में परिवर्तित नहीं होता है और पुष्पन नहीं होता है ।

हालांकि दीर्घ दीप्ति काल पौधों को जिब्रेलीन देकर, दीर्घ दीप्ति काल में पुष्पन उत्पन्न किया जा सकता है । क्योंकि उनमें एन्थेसीन नहीं होता है । यह परिकल्पना पूर्णरूपेण प्रमाणित नहीं हुई हैं ।


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