हरित क्रांति क्या है, अर्थ‌ एवं इसके प्रभाव, उद्देश्य व समस्याएं बताएं

भारत में पहली हरित क्रांति (green revolution in hindi) 1960 के दशक में प्रारंभ हुई जिसका उद्देश्य भारत के कृषि उत्पादन में वृद्धि करके भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना था ।

1968 ई० में अमेरिका के 'विलियम गाउड' ने सर्वप्रथम हरित क्रांति (Green revolution in hindi) का नाम दिया ।


हरित क्रांति का क्या अर्थ है? | harit kranti ka arth bataiye


हरित क्रांति (harit kranti) दो शब्दों के योग से बना एक योगिक शब्द है जिसका पहला शब्द है 'हरित' दूसरा शब्द है 'क्रांति' ।

इसमें हरित का अर्थ हरे रंग से है जो कि किसी को इंगित करता है, जबकि क्रांति शब्द से दो बातें स्पष्ट होती है -
किन्हीं तथ्यों में इतना तीव्र परिवर्तन जिसे‌ चिन्हित किया जा सके ।
इस परिवर्तन का प्रभाव पर्याप्त लंबे समय तक महसूस किया जा सके क्योंकि इससे कुछ मूलभूत परिवर्तन होते हैं ‌।

इस प्रकार, हरित क्रांति का शाब्दिक अर्थ है - कृषि क्षेत्र में होने वाला तीव्र परिवर्तन, ए कैसा परिवर्तन जिससे मैं केवल उत्पादन में वृद्धि हुई वरन् फसलों की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ हो ।

व्यापारिक रूप से हरित क्रांति (Green revolution in hindi) देश के संचित एवं असंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाले संकर तथा बौने पौधों के बीजों के उपयोग से फसल उत्पादन में वृद्धि करना है ।


हरित क्रांति के जनक कौन है? | harit kranti ke janak kaun hai?


दुनिया में हरित क्रान्ति के जनक थे प्रो० नॉरमन बोरलॉग, जिन्हें इसके लिए नोबल पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था ।

भारत में हरित क्रान्ति का आरम्भ 1960 के दशक में हुआ । भारत में डा० स्वामीनाथन को इसका जनक माना जाता है ।


भारत में हरित क्रांति कब चलाई गई?


देश में हरित क्रांति दो चरणों में आयी - पहला चरण 1966-67 ई० से 1980-81 ई० तक चला तथा दूसरा चरण 1980-81 ई० से 1996-97 ई० तक चला ।

हरित क्रांति (green revolution in hindi) के पहले चरण के अंतर्गत संकर जाति के बीजों के उपयोग एवं रासायनिक खाद आदि पर जोर रहा‌ जबकि दूसरे चरण में नवीन तकनीकों एवं भारी मशीनों के उपयोग पर बल दिया गया ।

पहले प्रगतिशील किसानों ने हरित क्रांति (green revolution in hindi) अपनाया लेकिन बाद में लगभग सम्पूर्ण भारतवर्ष में इसका बोलबाला हो गया ।

दूसरे शब्दों में, हरित क्रांति (harit kranti) का भारत के सभी क्षेत्रों के सभी किसानों पर प्रभाव पड़ा ।


हरित क्रांति क्या है? | harit kranti kya hai? | green revolution in hindi


मानव की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं प्राथमिक आवश्यकता भोजन है ।

सम्पूर्ण विश्व में कृषि मानव की खाद्य आवश्यकता का सर्वाधिक विकसित एवं बड़ा उपाय है । शाकाहार प्रिय देश होने के नाते भारत तो भोजन के लिए लगभग पूरी तरह से कृषि पर निर्भर है ।

भारत की कुल 3280 लाख हेक्टेयर भूमि में से लगभग आधी भूमि कृषि के लिए प्रयोग की जाती है । इसके बावजूद स्वतंत्रता के उपरांत भारत की सबसे बड़ी समस्या खाद्यान्न की अपर्याप्तता थी ।

हरित क्रांति किसे कहते है - "परम्परागत कृषि से कम उत्पादन एवं दूसरी ओर तेजी से बढ़ती जनसंख्या ने भारत के सामने गंभीर संकट की स्थिति उत्पन्न कर दी थी । इस चुनौति का सामना भारत ने कृषि ढाँचे में आमूल - चूल परिवर्तन करते हुए एक नये प्रकार की कृषि पद्धति को अपना कर खाद्यान्न क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त की इस नवीन कृषि पद्धति को ही हरित क्रांति (green revolution in hindi) कहा गया ।"

वर्तमान भारतीय कृषि का ढाँचा भारत में हुई हरित क्रान्ति से ही प्रभावित है ।


ये भी पढ़ें :-


हरित क्रांति क्या है अर्थ एवं परिभाषा, green revolution in hindi, harit kranti ka arth bataiye, हरित क्रांति के प्रभाव, उद्देश्य व समस्याएं बताएं,
हरित क्रांति क्या है अर्थ‌ एवं इसके प्रभाव, उद्देश्य व समस्याएं बताएं


यद्यपि यह सत्य है कि हरित क्रांति (green revolution in hindi) से सभी किसान पूरा लाभ नहीं ले पाए किंतु कमोबेश इससे सभी किसानों को परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से लाभ हुआ  है ।

इस अर्थ में यह एक बड़ा बदलाव रहा जिसने किसानों की आर्थिक हालात में सुधार किया एवं ग्रामीण विकास के लिए वृहद पैमाने पर कार्य किया ।


हरित क्रांति के प्रभाव | effects of green revolution in hindi


हरित क्रांति के प्रभावों को दो भागों में बांट कर देखा जा सकता है -

  • हरित क्रांति के आर्थिक प्रभाव
  • हरित क्रांति के सामाजिक प्रभाव


हरित क्रांति के आर्थिक प्रभाव | ecinomical effects of green revolution in hindi


हरित क्रांति के आर्थिक प्रभावों को आगे दो श्रेणियों में बांट कर देखा जा सकता है -

( अ ) हरित क्रांति के परोक्ष आर्थिक प्रभाव
( ब ) हरित क्रांति के अपरोक्ष आर्थिक प्रभाव


( अ ) हरित क्रांति के परोक्ष आर्थिक प्रभाव


हरित क्रांति के परोक्ष आर्थिक प्रभाव प्रमुख निम्नलिखित है -

1. कृषि उपज में वृद्धि -

हरित क्रान्ति का सर्वप्रथम सीधा एवं परोक्ष प्रभाव यह पड़ा कि कृषि उपज में तीव्रता से वृद्धि हो गई । हरित क्रान्ति के उपायों को क्रियान्वित करने के चार वर्ष के भीतर ही कृषि उपज में 36 प्रतिशत की रिकार्ड तोड़ वृद्धि दर्ज की गई ।


2. उत्पादकता में वृद्धि -

कृषि फसलों के उत्पादन में दर्ज की गई वृद्धि सघन कृषि की पद्धति को अपनाकर प्राप्त हुई थी । इसके अन्तर्गत सबसे अच्छी बात यह थी कि भूमि के बिना किसी अतिरिक्त प्रयोग के ही उत्पादन में वृद्धि हुई थी, अर्थात् प्रति हैक्टेयर अधिक से अधिक उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त किया गया ।


( ब ) हरित क्रांति के अपरोक्ष आर्थिक प्रभाव


हरित क्रांति के अपरोक्ष आर्थिक प्रभाव प्रमुख निम्नलिखित है -

1. गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले ग्रामीणों पर प्रभाव -

इस संदर्भ में होने वाले अनेक अध्ययनों से पता चलता है कि ज्यों - ज्यों हरित क्रान्ति के दम से उपज में वृद्धि दर्ज की गई त्यों - त्यों ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों की हालत में सुधार हुआ । वी० एम० राव एवं आर० एस० देशपांडे के कथनानुसार, “कृषि में बढोतरी से न केवल किसानों को ही लाभ हुआ वरन् यह लाभ ग्रामीण क्षेत्र के सभी वर्गों को खुशहाल बनाने की एक प्रक्रिया के रूप में सामने आया है ।"


2. ग्रामीण रोजगार पर प्रभाव -

हरित क्रान्ति से होने वाले परिवर्तन में एक अन्य सकारात्मक परिवर्तन यह हुआ कि इससे ग्रामीण रोजगार में वृद्धि हो गई । अशोक रुद्र के अनुसार, “हरित क्रान्ति आरम्भ होने के बाद खेती एवं खेती के तरीकों में अमूल - चूल परिवर्तन हुआ है जिससे खेत और खेत से बाहर अधिकाधिक व्यक्तियों का सहयोग नितांत आवश्यक हो गया है ।"


ये भी पढ़ें :-


हरित क्रांति के सामाजिक प्रभाव | social impact of green revolution in hindi


हरित क्रांति के सामाजिक प्रभावों को भी दो भागों में बांट कर देखा जा सकता है -

( अ ) हरित क्रांति के धनात्मक सामाजिक प्रभाव
( ब ) हरित क्रांति के ऋणात्मक सामाजिक प्रभाव


( अ ) हरित क्रांति के धनात्मक सामाजिक प्रभाव


हरित क्रांति के धनात्मक सामाजिक प्रभावों को निम्नानुसार देखा जा सकता है -

1. अस्पृश्यता निवारण में योगदान -

हरित क्रान्ति के कारण खेती में मशीनों का योगदान बढा है जिससे शारीरिक श्रम का स्थान मानसिक श्रम ने लेना आरम्भ कर दिया है ।


2. ग्रामीण महिला की स्थिति में सुधार -

हरित क्रान्ति के प्रभाव से शारीरिक श्रम कम होने से ग्रामीण महिलाओं को अधिक राहत मिली है और उनके पास अधिक से अधिक समय बचने लगा है । जिसे उन्होंने शिक्षा आदि में लगाया है ।


3. पारिवारिक सदस्यों की भूमिका में वृद्धि -

हरित क्रान्ति का एक अन्य प्रभाव यह हुआ कि परिवार के सभी सदस्यों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई ।


4. समय का सदुपयोग -

हरित क्रान्ति से पूर्व ग्रामीणों के पास बहुत सा समय खाली रहा करता था जिसे वे चौपाल पर हुक्के की बैठकों में व्यर्थ गंवा देते थे ।


( ब ) हरित क्रांति के ऋणात्मक सामाजिक प्रभाव 


हरित क्रांति के ऋणात्मक सामाजिक प्रभावों को निम्न अनुसार देखा जा सकता है -

1. सामाजिक असमानता का बढ़ना -

हरित क्रान्ति ने अमीर गरीब के मध्य खींची खाई को और अधिक गहरा कर दिया है । वास्तव में, हरित क्रान्ति के प्रभाव से भूमिधर कृषकों की आमदनी में दुगने और कहीं - कहीं चार गुने तक की बढोतरी हुई है किन्तु भूमिहीन कृषि मजदूरों की स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं आया है उनकी आमदनी यद्यपि पहले से बढ़ी तो है किन्तु अधिक नहीं बढ़ पाई है ।


2. क्षेत्रीय असमानता का बढ़ना -

हरित क्रान्ति का एक अन्य ऋणात्मक प्रभाव भारतीय समाज पर यह देखा गया है कि इससे क्षेत्रीय असमानता को बढावा मिला है । इसका कारण यह है कि भारत में कृषि की दशाओं में पर्याप्त अन्तर है ।


3. पर्यावरण को हानि -

हरित क्रान्ति का एक काला पहलू यह भी है कि इससे पर्यावरण को अत्यधिक हानि पहुँची है । फसलों पर अत्याधिक दवाई के छिड़काव एवं रासायनिक खाद के प्रयोग से जहाँ भूमि का क्षरण हुआ है वहीं साथ ही ऐसे मित्र कीटों, पशु - पक्षियों, जानवरों को हानि पहुँची है जिनके होने से न केवल प्राकृतिक संतुलन बना हुआ था वरन् जो परोक्ष - अपरोक्ष रूप से लम्बे समय से हमारे मित्र रहे हैं ।


हरित क्रांति के उद्देश्य एवं प्रारूप | objectives and proto-types of green revolution in hindi


दूसरी हरित क्रांति (green revolution in hindi) अभी अपने शैशवकाल में है । इसके कोई भी परिणाम अथवा कैसा भी वास्तविक स्वरूप उपलब्ध नहीं हैं ।

कृषि एवं कृषि से सम्बन्धित संस्थाओं, नीति - निर्धारकों, अनुसंधान केन्द्रों एवं सामान्य किसानों में इसके उद्देश्यों एवं प्रारूप को लेकर अनेक चर्चायें चल रही हैं ।

इन्हीं के आधार पर हम हरित क्रांति के उद्देश्यों एवं प्रारूप का निर्धारण कर सकते हैं ।


ये भी पढ़ें :-


दूसरी हरित क्रान्ति के उद्देश्य | objectives of second green revolution 


दूसरी हरित क्रान्ति भारत में पहली हरित क्रान्ति के बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों एवं वातावरण में आकार ले रही है । इसके कुछ उद्देश्य पहली हरित क्रान्ति के समान हैं जबकि कतिपय दूसरे इससे पूरी तरह भिन्न हैं ।


इसलिए इन्हें दो अलग - अलग श्रेणियों में रखकर अधिक भली - भाँति देखा जा सकता है -


( अ ) पहली हरित क्रान्ति के सदृश्य उद्देश्य -

दूसरी हरित क्रान्ति के जिन उद्देश्यों में पहली हरित क्रान्ति के उद्देश्यों से समानता है ।


1. कृषि उत्पादन में वृद्धि -

दूसरी हरित क्रान्ति का सर्वप्रथम उद्देश्य निरन्तर बढ़ती भारतीय जनसंख्या की दिन - प्रतिदिन बढ़ती खाद्यान्न की मांग पूर्ति करना है । वर्तमान में भारत चीन के बाद विश्व में जनसंख्या के दूसरे पायदान पर है, किन्तु विशेषज्ञों का मत है कि 2030 तक भारत इस सम्बन्ध में प्रथम होगा । ऐसे में खाद्यान्न की पूर्ति बढ़ानी होगी ।


2. कृषि क्षेत्र का विकास -

कृषि क्षेत्र का विकास किसी भी कृषि योजना, कृषि पद्धति अथवा कृषि क्रान्ति का प्राथमिक लक्ष्य होता है । दूसरी हरित क्रान्ति भी इसमें अपवाद नहीं है, इसका लक्ष्य भी कृषि क्षेत्र एवं किसानों का यथेष्ट विकास करना है ।


( ब ) पहली हरित क्रान्ति से भिन्न उद्देश्य -

दूसरी हरित क्रान्ति के जिन उद्देश्यों में पहली हरित क्रान्ति के उद्देश्यों से भिन्नता है ।


1. पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय अनुकूलन -

प्रथम हरित क्रान्ति के अंतर्गत किसानों ने कृषि रसायनों का इतना अंधाधुंध प्रयोग किया कि इससे पर्यावरण प्रदूषण एवं पारिस्थितिकीय असन्तुलन की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई । दूसरी हरित क्रान्ति का उद्देश्य कृषि की ऐसी विधियों का विकास, संवर्द्धन एवं उपयोग है जो पर्यावरण अनुकूल हों और जैव विविधता की निरन्तरता को बनाये रखने में सहयोगी हों ।


2. भोजन की प्राकृतिक गुणवत्ता को बनाये रखना -

दूसरी हरित क्रान्ति का एक अन्य उद्देश्य खाद्य पदार्थो/भोजन की प्राकृतिक व सहज गुणवत्ता को बनाये रखना है । दूसरे शब्दों में इसका उद्देश्य स्वास्थवर्धक एवं विकार रहित खाद्य पदार्थों का उत्पादन करना है ।


दूसरी हरित क्रान्ति का प्रारूप | proto - type of second green revolution


प्रथम हरित क्रान्ति का प्रारुप जहाँ भरपूर सिंचाई, संकर प्रजाति के बीज, कृत्रिम/रासायनिक उर्वरक एवं रासायनिक कीटनाशियों का प्रयोग करना था वहीं दूसरी हरित क्रान्ति इस सम्बन्ध में भिन्न है ।

इसके अंतर्गत सिंचित एवं असिंचित दोनों ही क्षेत्रों में कृषि का विकास करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का विकास एवं उपयोग करना है ।


प्रथम एवं दूसरी हरित क्रान्ति के प्रारुपीय अन्तर को निम्न तालिका के द्वारा देखा जा सकता है -


प्रथम हरित क्रांति प्रारूप -

सिंचाई - नलकूप नहरों के द्वारा जलप्लावित विधि ।
खनिज - रासायनिक रूप से साधित व निर्यातित 
अपतॄण एवं नाश कीट नियंत्रण - रासायनिक कीटनाशी एवं शाकनाशी
ऊर्जा - जीवाश्म ईंधन एवं विद्युत पर निर्भरता
बीज - बाहर से खरीदे गये
प्रबंध, सूचना निर्णय तंत्र - निवेश सम्भारकों , शोधकर्ताओं प्रसारकों आदि द्वारा प्रदत्त
शस्य तंत्र - एकलशस्यन व विशेषीकृत
श्रम - मुख्यत: यांत्रिक एवं मशीनी
पूँजी - निरन्तर अधिक आवश्यकता बाह्य स्रोतों व ऋण पर निर्भरता
पशुपालन आदि कृषि सहायक क्रियायें - एक दूसरे से भिन्न स्थितियों में उत्पादन एवं विकास
कृषि व ग्रामीण तंत्र - पृथक - पृथक विकास


दूसरी हरित क्रांति के प्रारूप -

सिंचाई - वर्षा के संचित जल का छिडकाव/टपकन विधि द्वारा
खनिज - ‌प्राकृतिक संसाधनों से पुनर्चक्रित व जैविक
अपतॄण एवं नाश कीट नियंत्रण - जैविक, सांस्कृतिक, यांत्रिक एवं स्थानीय तौर पर सुलभ
ऊर्जा -‌ कृषि एवं कृषि क्रियाओं द्वारा उत्पादित व एकत्रित
बीज -‌‌ खेत में उत्पन्न
प्रबंध, सूचना निर्णय तंत्र - कृषक, स्थानीय समुदाय व कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सतत विकास
शस्य तंत्र - मिश्रित एवं विविधतापूर्ण
श्रम - मिश्रित - मानवीय, जैविक व मशीनी
पूँजी - अधिकांशत: कम आवश्यकता, प्रारंभिक स्रोतों द्वारा पूर्ति
पशुपालन आदि कृषि सहायक क्रियायें - पारस्परिक एक दूसरे से सहायक स्थितियों में उत्पादन व विकास
कृषि व ग्रामीण तंत्र - समन्वित विकास


ये भी पढ़ें :-


हरित क्रान्ति की कमियाँ/समस्यायें | limitation of green revolution in hindi


हरित क्रान्ति की प्रमुख समस्यायें -

  • हरित क्रान्ति का प्रभाव कुछ विशेष फसलों तक ही सीमित रहा
  • पूँजीवादी कृषि को बढ़ावा
  • संस्थागत सुधारों की आवश्यकता पर बल नहीं
  • श्रम - विभाजन की समस्या
  • आय की बढ़ती असमानता
  • आवश्यक सुविधाओं का अभाव
  • क्षेत्रीय असन्तुलन


हरित क्रान्ति की प्रमुख कमियों एवं समस्याओं निम्न प्रकार से हैं -


1. हरित क्रान्ति का प्रभाव कुछ विशेष फसलों तक ही सीमित रहा -

हरित क्रान्ति कुछ फसलों जैसे, गेहूँ, ज्वार, बाजरा तक ही सीमित है अन्य फसलों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है । यहाँ तक कि चावल भी इससे बहुत ही कम प्रभावित हुआ है । व्यापारिक फसलें भी इससे अप्रभावित ही हैं ।


2. पूँजीवादी कृषि को बढ़ावा -

अधिक उपजाऊ किस्म के बीज एक पूँजी - गहन कार्यक्रम है जिसमें उर्वरकों, सिंचाई, कृषि यन्त्रों आदि आगतों पर भारी मात्रा में निवेश करना पड़ता है । भारी निवेश करना छोटे तथा मध्यम श्रेणी के किसानों की क्षमता से बाहर है । इस तरह, हरित क्रान्ति से लाभ उन्हीं किसानों को हो रहा है जिनके पास निजी पम्पिंग सेट, ट्रैक्टर नलकूप तथा अन्य महंगे कृषि यन्त्र व सुविधाएँ हैं । यह सुविधा देश के बड़े किसानों को ही उपलब्ध है । सामान्य किसान इन सुविधाओं से वंचित है । अन्य शब्दों में, हरित क्रान्ति का लाभ बड़े किसान ही उठा रहे हैं । इस प्रकार इससे पूँजीवादी खेती को प्रोत्साहन मिल रहा है ।


3. संस्थागत सुधारों की आवश्यकता पर बल नहीं -

नई विकास विधि में संस्थागत सुधारों की आवश्यकता की सर्वथा अवहेलना की गयी है । संस्थागत परिवर्तनों के अन्तर्गत सबसे महत्त्वपूर्ण घटक भू - धारण की व्यवस्था है । इसकी सहायता से ही तकनीकी परिवर्तन द्वारा अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है । देश में भूमि सुधार कार्यक्रम सफल नहीं रहे हैं तथा लाखों कृषकों को आज भी भू - धारण की निश्चितता नहीं प्रदान की जा सकी है । इसी तरह उर्वरक के प्रयोग के विस्तार में काश्तकारी खेती ही एक प्रमुख बाधा है क्योंकि काश्तकारी की अपेक्षा भू - स्वामी ही उर्वरकों का अधिक मात्रा में उपयोग कर सकते हैं ।


4. श्रम - विभाजन की समस्या -

हरित क्रान्ति के अन्तर्गत प्रयुक्त कृषि यन्त्रीकरण के फलस्वरूप श्रम - विभाजन को बढ़ावा मिला है । कृषि में प्रयुक्त यन्त्रीकरण से श्रमिकों की माँग पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । अत: भारत जैसी श्रम - अतिरेक वाली अर्थव्यवस्थाओं में यन्त्रीकरण बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न कर सकता है । ग्रामीण जनसंख्या का रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने का यह भी एक कारण है ।


5. आय की बढ़ती असमानता -

कृषि में तकनीकी परिवर्तनों का ग्रामीण क्षेत्रों में आय - वितरण पर विपरीत प्रभाव पड़ा है । डॉ० वी० के० आर० वी० राव के कथनानुसार, “यह बात अब सर्वविदित है कि तथाकथित हरित क्रान्ति जिसने देश में खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ाने में सहायता दी है, के साथ ग्रामीण आय में असमानता बढ़ी, बहुत से छोटे किसानों को अपने काश्तकारी अधिकार छोड़ने पड़े हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक व आर्थिक तनाव बढ़े हैं ।"


6. आवश्यक सुविधाओं का अभाव -

हरित क्रान्ति की सफलता के लिए आवश्यक सुविधाओं यथा - सिंचाई व्यवस्था, कृषि साख, आर्थिक जोत तथा सस्ते आगतों आदि के अभाव में कृषि विकास के क्षेत्र में वांछित सफलता नहीं प्राप्त हो रही है ।


7. क्षेत्रीय असन्तुलन -

हरित क्रान्ति का प्रभाव पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र तथा तमिलनाडु आदि राज्यों तक ही सीमित है । इसका प्रभाव सम्पूर्ण देश पर न फैल पाने के कारण देश का सन्तुलित रूप से विकास नहीं हो पाया । उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि भारत में हरित क्रान्ति सीमित रूप से ही सफल रही है । जबकि इसके अनेक दुष्प्रभाव भी देखे गये हैं ।


भारत में दूसरी हरित क्रान्ति से आप क्या समझते है?


भोजन के रूप में खाद्यान्न हमारी प्राथमिक आवश्यकता है । एक विकासशील एवं जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में दूसरे पायदान पर खड़े देश भारत में सभी के लिए खाद्यान्न की पूर्ति सुनिश्चित करना एक बड़ी जंग जीतने के समान है ।

इस दिशा में 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम - 2013' एक गंभीर कानूनी प्रयास रहा है, किन्तु इस कानून के आलोक में सभी भारत वासियों के लिए खाद्यान्न की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भारत को एक दूसरी कृषि हरित क्रान्ति की आवश्यकता है ।

प्रारम्भिक कृषि रुझानों से यह स्पष्ट हुआ है कि दूसरी हरित क्रान्ति पहली हरित क्रान्ति का अगला पड़ाव मात्र नहीं है वरन् अपने उद्देश्यों एवं प्रयोग की जाने वाली कृषि पद्धतियों, प्रणालियों के रूप में यह नितांत भिन्न है ।

यद्यपि इसका एक उद्देश्य भारत की बढ़ती हुई खाद्यान्न की मांग को पूरा करना है किन्तु साथ ही यह खाद्यान्न की गुणवत्ता को लेकर भी सजग है । खाद्यान्न की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के साथ - साथ दूसरी हरित क्रान्ति पर्यावरण अनुकूलता एवं पारिस्थितिकीय सबलता का झण्डा उठा कर चलने का रोड़ मैप तैयार कर रही है ।

दूसरे शब्दों में, यह पहली हरित क्रान्ति की कमियों एवं बुराइयों को ढोने के स्थान पर उनके समाधान के उपाय स्वरूप विकसित की जा रही है । इसी कड़ी में 'दूसरी हरित क्रान्ति' अपनी अनुकूल कृषि पद्धतियों, प्रणालियों का चयन कर रही है और विशेषरूप से इसके इस चयन का आधार टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि है ।


ये भी पढ़ें :-


दूसरी हरित क्रान्ति का अवधारणात्मक विकास | conceptual development of second green revolution in hindi


अपने उद्देश्य के अनुकूल इस क्रांन्ति ने उन्नत बीजों, भरपूर सिंचाई, रासायनिक खाद व कीटनाशियों के बलबूते भारत के सिंचित एवं उपजाऊ क्षेत्र में तीव्र कृषि उत्पादन का एक बड़ा मोर्चा खोल दिया और आगामी दशक में ही भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन गया ।

यह एक बड़ी सफलता थी जिसके बाद देश कृषि एवं कृषकों की दशा एवं दिशा के प्रति इतना निश्चित हो गया कि किसी ने बाद में इसकी खोज - खबर नहीं ली । आगामी कुछ दशकों तक स्थिति ऐसी ही बनी रही सिंचित क्षेत्रों के किसान रिकॉर्ड तोड़ फसले उगाते रहे जबकि असिंचित क्षेत्रों के किसान अपनी किस्मत पर रोते रहे ।

परम्परागत खेती का ढाँचा इस हद तक नेस्तनाबूद हो गया कि परम्परागत फसलें एवं बीज लुप्तप्राय होने लगे । 1990 के दशक में जब अचानक वैश्विकरण की आँधी चलने लगी और विदेशी व्यापार के द्वार अबाध रूप से खुलने लगे तो देश के हुक्मरानों को यह सुध आयी कि भारत एक कृषि एवं ग्राम प्रधान देश है जिसे वैश्विक बाजार में कृषि उपज के सहारे ही स्थापित किया जा सकता है ।

जब कृषि उत्पाद को विदेशों में निर्यात करने के प्रयास किये जाने लगे तो इसे विकसित देशों ने अस्वीकार कर दिया और मालूम पड़ा कि इसमें जहरीले एवं रसायनिक तत्त्व खतरनाक स्तर पर बहुत अधिक बढ़े हुए थे ।

ऐसे में भारतीय कृषि (Indian agriculture in hindi) और कृषकों की छानबीन की जाने लगी और प्याज की परतों के समान अनेक छिपे हुए राज खुलने लगे । सबसे पहले तो यह जान कर भारतवासियों को धक्का लगा कि जिस कृषि को अभी तक पर्यावरण का एक अभिन्न अंग और मानवीय गतिविधियों की ओर से पारिस्थितिकी का सबसे बड़ा मित्र समझा जा रहा था वही पर्यावरण को सबसे अधिक हानि पहुँचा रही थी और पारिस्थितिकी का लगभग गला ही घोंट रही थी ।

हरित क्रान्ति (green revolution in hindi) से प्रभावित समूचे कृषि क्षेत्र की पिट्टा, पानी और बयार सभी कुछ प्रदूषित हो चुका था और यहाँ तक कि इसके प्रभाव से उत्पादन पुनः तेजी से गिरने लगा था । खेत बंजर हो रहे थे और मरुस्थलीकरण जैसी भयानक आपदायें जीवन को नष्ट करने के लिए अट्टाहास करने लगी थीं ।

भोजन श्रृंखला एवं वातावरण के बढ़ गये जहरीले रसायनों ने जैव विविधता को छिन्न - भिन्न कर दिया था और भू - जल स्तर निरन्तर तेजी से गिरता जा रहा था । दूसरी ओर जनसंख्या का सुरसा के मुख समान बढ़ते जाना विनाश का एक और अलार्म भी बजा रहा था ।

इक्कीसवीं सदी अर्थात् 2000 के बाद से इन कृषि भयानकताओं पर चिंतन मनन प्रारम्भ हुआ और सभी समस्याओं के लिए किसी एक रामबाण की तलाश की जाने लगी, इस उधेड़ - बुन में जो हाथ लगा उसे ही आज दूसरी हरित क्रान्ति के रूप में महिमा मंडित किया जा रहा है ।


दूसरी हरित क्रान्ति का टिकाऊ खेती / संपोषित कृषि से सम्बन्ध | relation of second G R to sustainable agriculture in hindi


दूसरी हरित क्रान्ति के उद्देश्यों एवं प्रारुप से स्पष्ट है कि इसके लिए प्रथम हरित क्रान्ति के दौरान अपनायी गई कृषि प्रणालियों को अथवा उनमें किंचित परिवर्तन करके नहीं अपनाया जा सकता वरन् इसके लिए सर्वथा भिन्न कृषि प्रणलियों का विकास व व्यावहारिक उपयोग आवश्यक है और ऐसी जिन किन्हीं प्रणालियों का इससे सरोकार हो सकता है, उन्हें उत्पादता में उच्च श्रेणी का होने के साथ - साथ पर्यावरण अनुकूल एवं खाद्य गुणवत्ता संवर्द्धन में भी अग्रणीय होना चाहिए ।

यदि हम वर्तमान काल की प्रचलित कृषि विधियों पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि केवल टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि ही दूसरी हरित क्रान्ति की इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति का उचित एवं श्रेष्ठ साधन बन सकती है ।


दूसरी हरित क्रान्ति एवं टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि के सम्बन्धों को निम्न विन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है -


1. प्राकृतिक कृषि निविष्टियों का उपयोग -

टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि खेती के अंतर्गत प्राकृतिक कृषि निविष्टियों का उपयोग किया जाता है । सिंचाई के लिए एकत्रित, संचित एवं संरक्षित जल का आवश्यकतानुसार उपयोग; बीजाई के लिए चयनित एवं संवर्द्धित प्राकृतिक बीजों का उपयोग; कृषि सहायक क्रियाओं जैसे - वानिकी एवं पशुपालन के अपशिष्ट को केंचुओं आदि कीटो के द्वारा खाद में रूपान्तरित करके उपयोग; मित्र कीटों/मित्र पक्षियों एवं वानस्पतिक अवयवों/सार आदि का कीटनाशियों के रूप में प्रयोग आदि इस प्रणाली की वे विशेषताएँ हैं जो इसे दूसरी हरित क्रान्ति के लिए उपयुक्त बनाती हैं ।


( 2 ) स्वाथ्यवर्धक एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्यान्न की पूर्ति -

टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि के माध्यम से उत्पादित खाद्यान्न स्वाथ्यवर्धक एवं गुणवत्तापूर्ण होते हैं । उनमें ऐसे किसी भी प्रकार के अकार्बनिक तत्त्व नहीं होते जो उन्हें प्रदूषित व विकारपूर्ण बनाते हों । इस प्रकार, इस खेती से प्राप्त खाद्यान्न न केवल हमारी प्रस्तुत भूख को वरन् प्रच्छन्न/छिपी हुई भूख को भी कम करते हैं । इससे खाद्यान्न की कम मात्र में अधिक पोोणता की प्राप्ति होती है और इस प्रकार यह प्रणाली दूसरी हरित क्रान्ति के लिए अपनी उपयुक्तता का प्रबल दावा प्रस्तुत करती है ।


( 3 ) कृषि एवं कृषि आधारित उत्पादन क्रियाओं से समुचित उत्पादन -

टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि उत्पादन के लिए केवल कृषि पर ही निर्भर नहीं रहती वरन् यह कृषि आधारित अन्य क्रियाओं जैसे - पशुपालन, वागवानी, कृषि वानिकी, मौन - पालन, कुक्कुट पालन, शूकर पालन आदि को भी इसका आधार बनाती है । इस प्रकार इस प्रणाली से प्राप्त कुल उत्पादन प्रथम हरित क्रान्ति में प्रचलित प्रणालियों से अधिक होता है ।


( 4 ) उत्पादन लागत में कमी -

टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि के अंतर्गत स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों को ही कृषि निविष्टियों के लिए प्रयोग किया जाता है । इसलिए इसके अंतर्गत कृषि की लागत कम आती है । ऐसे में किसानों को ऋण आदि की परेशानी एवं बोझ से छुटकारा मिल जाता और लघु व सीमान्त किसानों को भी प्रणालीगत लाभ होने लगता है ।


( 5 ) व्यापकता -

प्रथम हरित क्रान्ति का लाभ केवल वे क्षेत्र/किसान ही ले पाये जिनके पास सिंचाई के भरपूर साधन थे इसके विपरीत टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि सिंचित एवं असिंचित दोनों प्रकार के क्षेत्रों के लिए एक वरदान है । ऐसे में इसका क्षेत्र/प्रसार व्यापक है । इस विवरण से स्पष्ट है कि दूसरी हरित क्रान्ति टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि प्रणाली के प्रयोग से प्रथम हरित क्रान्ति से कहीं अधिक समग्र, श्रेष्ठ एवं व्यापक सिद्ध होगी ।


Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.