खेती के प्रकार एवं उसकी प्रणाली

खेती के प्रकार एवं उसकी प्रणाली ( Types of farming and its system )


खेती क्या है ( What is Farming )


प्रक्षेत्र ( Farm ) का आकार , संगठन , प्रबन्ध एवं संचालन स्थान - स्थान पर प्रत्येक कृषक का अलग - अलग पाया जाता है ।

अतः साधन एवं व्यवस्था आदि की दृष्टि से भी कोई दो प्रक्षेत्र समान नहीं होते जिससे खेती के प्रकार ( Types of Farming ) तथा खेती की प्रणालियाँ भी भिन्न - भिन्न पाई जाती हैं । 

अत : खेती के विभिन्न प्रकार एवं प्रणालियों का अध्ययन आवश्यक है ।

खेती को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया गया है -



( 1 ) खेती के प्रकार ( Types of Farming ) 

( 2 ) खेती की प्रणालियाँ ( Systems of Farming )


अत : खेती के प्रकार एवं प्रणालियों में क्या अन्तर है पहले यह जान लेना आवश्यक है।

खेती के प्रकार का अर्थ ( Meaning of Types of Farming )


जब खेती का वर्गीकरण भूमि के उपयोग , फार्म के आकार , मशीनों एवं यन्त्रों के प्रयोग , पशु - पालन एवं फसलों के उत्पादन आदि के आधार पर किया जाता है , तब उसे खेती के प्रकार कहते हैं जैसे विशिष्ट खेती , मिश्रित खेती , यांत्रिक खेती , शुष्क खेती आदि ।

खेती के प्रकार का अर्थ स्पष्ट करते हुए रॉस आर० ने लिखा है कि " किसी एक क्षेत्र में जब कई प्रक्षेत्र ( Farm ) प्रायः आकार , वस्तु उत्पादन और अपनाई जाने वाली विधियों की दृष्टि से समान होते हैं तो उन्हें खेती के प्रकार कहते हैं । "

खेती की प्रणाली का अर्थ ( Meaning of Systems of Farming )


जब सामाजिक एवं आर्थिक प्रबन्ध की विधि के आधार पर खेती का वर्गीकरण करते हैं तब उसे खेती की प्रणाली कहते हैं ।

जैसे - व्यक्तिगत खेती . सामहिक खेती , पूँजीवादी खेती , सहकारी खेती , राजकीय खेती आदि ।

खेती की प्रणाली का अर्थ निम्न प्रकार स्पष्ट किया गया है-


" वेती की प्रणाली से अभिप्राय कृषि में आर्थिक और सामाजिक क्रियाओं की है जिनके अन्तर्गत कृषि का कार्य सम्पन्न होता है । "

अत : उपरोक्त विवरण से यह पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि जब एक ही क्षेत्र में अनेक पोली Ram के स्वभाव आपस में मिलते - जुलते हो तो उनसे खेती के प्रकार ( Types of Farming ) का बोध होता है ।

यदि किसी प्रक्षेत्र का नामकरण आर्थिक प्रबन्ध विधि या सामाजिक व्यवस्था के आधार पर किया जाता है तो ऐसे समस्त प्रक्षेत्रों ( Farms ) का बोध खेती की प्रणाली ( Systems . of Farming ) से होता है ।

खेती के प्रकार को निर्धारित करने वाले कारक


खेती के प्रकार, खेती कितनी प्रकार की होती है।
खेती के प्रकार (types of farming in hindi)


खेती के प्रकार की परिभाषाएँ ( Definitions of Types of Farming )


विभिन्न प्रक्षेत्र विशेषज्ञों ने खेती के प्रकार की निम्न परिभाषायें दी है -

जॉन्सन के अनुसार -

“ जब किसी वर्ग  के अन्दर कई प्रक्षेत्र एक किस्म के हों तथा उन पर उत्पन्न होने वाली फसलें एवं पशुओं की मात्रा और उत्पादन विधि तथा क्रियाओं में समानता हो उसे ' खेती के प्रकार ' कहते हैं । "

रोस के अनसार -

" किसी एक क्षेत्र में जब कई प्रक्षेत्र सामान्यतया आकार वस्त - उत्पादन और अपनाई जाने वाली विधियों की दृष्टि से समान होते हैं तो उन्हें खेती के प्रकार ' कहते हैं । "

भारतीय कृषि की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर खेती के प्रकार की एक उपयुक्त परिभाषा नीचे दी गई है -

खेती के प्रकार से क्या अभिप्राय है


"भूमि के उपयोग , फसलों एवं पशुधन के उत्पादन का आकार और कृषि क्रियाओं के अपनाने के आधार पर लिया जाता है । "

खेती के प्रकार को निर्धारित करने वाले कारक ( Factors Determing the Types of Farming )


खेती के प्रकार को निर्धारित करने वाले निम्नांकित कारक मुख्य हैं -

1 . प्राकृतिक कारक ( Natural Factors )

2 . सामाजिक कारक ( Social Factors )

3 . आर्थिक कारक ( Economic Factors )

उपरोक्त मुख्य कारकों का विस्तृत विवरण निम्नांकित है 

1 . प्राकृतिक कारक -


प्राकृतिक कारक उद्यमों के उत्पादन की सम्भावना को व्यक्त करते हैं और इन्हीं कारकों के कारण ही कोई फसल - विशेष किसी एक क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र की अपेक्षा अधिक उत्पादन एवं लाभ देती है ।

फलस्वरूप दो विभिन्न क्षेत्रों में खेती के प्रकार में भिन्नता पाई जाती है । 
प्राकृतिक कारकों के अन्तर्गत निम्नांकित कारक महत्वपूर्ण हैं -

( i ) भूमि ( Land ) -


विभिन्न फसलों के उत्पादन के लिए अलग - अलग प्रकार की मृदायें उपयुक्त होती हैं जैसे आलू तथा मूंगफली के लिए बलुई या बलुई दोमट ( Sandy - Loam ) , गेहूँ के लिए दोमट , कपास के लिए काली मृदा उपयुक्त मानी जाती है ।

मृदा के प्रकार के आधार पर ही उनमें अलग - अलग गुण जैसे मृदा की बनावट , पानी सोखने की शक्ति , जीवांश की मात्रा , अम्लीयता , क्षारीयता आदि पाये जाते हैं ।

अत : विभिन्न क्षेत्रों में मृदा के प्रकार की भिन्नता के आधार पर खेती के प्रकार भी अलग - अलग पाये जाते हैं ।

( ii ) भूमि का धरातल ( Surface of Land ) -


भूमि का धरातल अर्थात् समतल या ढालदार , भूमि की ऊचाई जैसे ऊँची भूमि ( uplands ) , नीची भूमि ( Lowlands ) आदि विभिन्न प्रकार की फसलें उगाने को काफी प्रभावित करती है ।

( iii ) जलवायु ( Climate ) 


जलवायु में वर्षा , तापमान , आर्द्रता , सूखा , पाला , आँधी , ओले आदि सम्मिलित होते हैं जो खेती के प्रकार को काफी प्रभावित करते हैं ।

विभिन्न क्षेत्रों में जलवायु का भिन्नता के कारण अलग - अलग फसलें उगाई जाती हैं जैसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान , गन्ना , जूट आदि तथा सूखे क्षेत्रों में ज्वार , बाजरा , मक्का आदि फसलें अधिक पैदावार देती है ।

2. सामाजिक कारक -


सामाजिक कारक कषक की मानसिक स्थिति को प्रभावित करते हैं ।

समाज में व्याप्त रीति -

रिवाज , परम्परायें , रूढ़िवादिता आदि कषकों पर सामाजिक प्रतिबन्धों के द्वारा नये - नये उद्यमों के चयन में बाधा डालते हैं।

जैसे मुसलमान सूकर पालन नहीं करते और उच्च हिन्दू जातियों के परिवार मुर्गी पालन नहीं करते । कुछ मुख्य सामाजिक कारक निम्नांकित हैं-

( i ) सामाजिक रीति - रिवाज एवं मान्यतायें -

सामाजिक रीति - रिवाज एवं मान्यतायें विभिन्न लाभदायक खेती के उद्यमों को अपनाने में बाधक होते हैं ।

जैसे कुलीन हिन्दू मुर्गीपालन , सिख तम्बाकू की खेती तथा मुसलमान सूकर पालन नहीं करते ।

( ii ) कृषक की व्यक्तिगत रूचि -

अधिकांश कृषक अपनी रूचि के अनुसार खेती के प्रकार पसन्द करते हैं तथा बहुत सी खेती के उन्नत तथा नई प्रकारों को भी नहीं अपनाते जैसे सब्जियों की खेती , फलों की खेती , फूलों की खेती आदि ।

3 . आर्थिक कारक -


खेती के प्रकार को निर्धारित करने में आर्थिक कारक काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं । कुछ मुख्य आर्थिक कारक निम्नांकित हैं-

( i ) कृषक की आर्थिक स्थिति -

आर्थिक रूप से सुदृढ़ किसान ट्रैक्टर , ट्यूबवैल आदि पर व्यय करके यान्त्रिक कृषि अपना सकता है ।

( ii ) भूमि की स्थिति -

नगरों के समीप की भूमि में फल , सब्जी , चारे की फसलें , शहरों से दूर की भूमि पर खाद्यान्न फसलें , चीनी मिलों के समीप गन्ने की खेती की जाती है ।

( iii ) भूमि का मूल्य -

अधिक कीमती भूमि पर सघन खेती तथा कम मूल्य वाली भूमियों में विस्तृत खेती की जाती है ।

( IV ) पूँजी की उपलब्धता -

कुछ फसलों को उगाने में या उद्यमों को शुरू करने में अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है और यदि कृषक के पास अपनी पूँजी नहीं है तो बाहर से उपलब्ध पूँजी से कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है ।

( v ) श्रम की उपलब्धता -

कुछ फसलों के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता होती है जैसे आलू , गन्ना , कपास आदि तथा कुछ फसलें कम श्रम से पैदा की जा सकती है । जहाँ सस्ता श्रम आसानी से उपलब्ध होगा वहाँ आलू , गन्ने आदि की खेती की जा सकती है ।

( vi ) विपणन सुविधायें -

विपणन सुविधाओं का प्रभाव सीधे रूप से विपणन लागत , परिवहन लागत , उपज का उचित मूल्य मिलना , ग्राहकों व उपभोक्ताओं की अधिक संख्या आदि से खेती के प्रकार प्रभावित होते हैं जैसे मण्डी तथा नगरों के समीप फल , सब्जी , दूध आदि का उत्पादन उपयुक्त रहता है ।

खेती की प्रणालियाँ - परिभाषाएँ ( Systems of Farming - Definitions )


जॉन्सन ने खेती की प्रणालियों को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है-

" एक दिये हुए प्रक्षेत्र पर वस्तुओं का संयोजन एवं उनके उत्पादन में जो विधियाँ एवं क्रियायें अपनाई जाती हैं उसे खेती की प्रणाली कहते हैं । "

रोस के अनसार -

" किसी व्यक्तिगत प्रक्षेत्र का कृषि प्रणाली के अन्तर्गत वर्गीकरण करने का एकमात्र व्यवहारिक आधार उस पर उत्पन्न होने वाली मुख्य वस्तु ही मानी जाती है ।

खेती की प्रणाली को निर्धारित करने वाले कारक ( Factors Determining the system of Farming )


खेती की प्रणाली, खेती की कितनी प्रणाली है।
खेती की प्रणाली


खेती की प्रणालियों को निर्धारित करने वाले महत्वपूर्ण कारक निम्नांकित हैं -

1 . जोत का आकार ( Size of Holding ) -


यदि जोत का आकार बड़ा है तो व्यक्तिगत खेती या काश्तकारी खेती की प्रणाली अपनाई जाती है , परन्तु यदि जोत का आकार छोटा है तो सहकारी खेती की प्रणाली उपयुक्त मानी जाती है ।

2 . भूमि का स्वामित्व ( Ownership of Land ) -


यदि भूमि पर कृषक का निजी स्वामित्व है तो व्यक्तिगत अथवा काश्तकारी खेती की प्रणाली प्रयोग की जायेगी , परन्तु यदि भूमि पर सरकार का स्वामित्व है तो राजकीय खेती की प्रणाली अपनाई जायेगी ।

3 . खेती का उद्देश्य ( Objective of Farming ) -


अलग - अलग उद्देश्यों के अनुसार खेती की प्रणाली में अन्तर आ जाता है जैसे व्यापारिक खेती ( Commercialize Farming ) केवल बड़े - बड़े प्रक्षेत्रों ( Farms ) पर अधिक लाभ कमाने के लिए की जाती है ।

इसी प्रकार अनुसंधान या प्रदर्शन हेतु खेती राजकीय खेती प्रणाली के अन्तर्गत की जाती है ।

4 . साधनों की उपलब्धता ( Availability of Resources ) -


भूमि , श्रम , पूँजी आदि साधनों की उपलब्धता पर खेती की प्रणाली निर्भर करती है । जैसे अधिक भूमि पर अधिक पूंजी उपलब्ध होने पर श्रम के स्थान पर आधुनिक मशीनों , उपकरणों आदि का प्रयोग करके पूँजीवादी खेती की जाती है ।

5 . शासन तन्त्र का प्रभाव ( Effect of Administrative System ) -


राज्य शासन अर्थात् सरकारी तन्त्र का प्रभाव भी खेती की प्रणाली को प्रभावित करता है जैसे साम्यवादी सरकार अवस्था में सामूहिक खेती तथा प्रजातन्त्रीय सरकार व्यवस्था में व्यक्तिगत खेती की प्रणाली अपनाई जाती है ।

6 . सुविधाओं के उपयोग के लिए ( To Avail Facilities ) -


छोटी - छोटी जोतों पर भी , ऋण सुविधा , विपणन सुविधा , यातायात सुविधा आदि का लाभ उठाने के लिए सहकारी खेती की । प्रणाली अपनाकर अधिक लाभ कमाया जा सकता है ।

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