सिंचाई (irrigation in hindi) किसे कहते है इसकी परिभाषा, लाभ एवं विधियां लिखिए

कृषि में सिंचाई (irrigation in hindi) का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है ।

सिंचाई (sichai) करने से फसलों की वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है तथा कृषि उत्पादन बढ़ जाता है जो किसी भी क्षेत्र की सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता है ।

पौधों को वृद्धि एवं विकास के लिए वर्षा जल के अतिरिक्त भी जल की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति के लिए कृत्रिम रूप से सिंचाई (Irrigation in hindi) की जाती है ।

फसलों में सिंचाई करने के ढंग या तरीकों को सिंचाई की विधियां (methods of Irrigation in hindi) कहा जाता है ।

अतः फसलों से अधिकतम उत्पादन के लिए कृत्रिम रूप से जल की आपूर्ति अवश्य होती है ।


सिंचाई किसे कहते है? | what is irrigation in hindi


फसलोत्पादन में जल के अभाव में पौधे का जीवन असम्भव होता है । पौधों को जीवनकाल में अधिक मात्रा में जल की आवश्यकता होती है । प्राकृतिक रुप से जल की आवश्यकता पूर्ति नहीं हो पाती है ।

अतः पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए कृत्रिम रुप से पानी की व्यवस्था करनी पड़ती है जिसे सिंचाई (irrigation in hindi) कहते हैं ।


सिंचाई की परिभाषा लिखिए? | defination of irrigation in hindi


पेड़-पौधों एवं फसलों को अपना जीवनकाल पूरा करने के लिए प्राकृतिक जल के अतिरिक्त कृत्रिम जल की आवश्यकता होती है ।

कृत्रिम रूप से पेड़-पौधों एवं फसलों को पानी देने को ही सिंचाई (irrigation in hindi) कहा जाता है ।


इस प्रकार सिंचाई को निम्न प्रकार परिभाषित कर सकते हैं -

"फसलों को उगाने के लिए वर्षा जल के अतिरिक्त कृत्रिम उपायों द्वारा मृदा में जल देने की क्रिया को सिंचाई (irrigation in hindi) कहते हैं ।"

"Irrigation is a process of application of water (apart from rainfall) by artificial methods, to the soil for cultivation and growing of crops."


फसल सिंचाई की कौन-कौन सी प्रमुख विधियां हैं वर्णन कीजिए?


सामान्यतः किसी खेत अथवा फसल को किस प्रकार से पानी दिया जाता है?

पानी देने के इस ढंग को सिंचाई की विधि (method of irrigation in hindi) कहते है । यह एक व्यवस्था होती है जिसके द्वारा फसलोत्पादन में वृद्धि एवं विकास को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है ।

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सिंचाई की तीन प्रमुख विधियां होती है सतह सिंचाई, बौछारी सिंचाई एवं‌ अव भूमि सिंचाई के माध्यम से फसलों की सिंचाई का प्रयास किया जाता है ।


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सिंचाई की प्रमुख विधियां एवं उनके प्रकार -

1. सतही सिंचाई ( Surface Irrigation )
( i ) अनियंत्रित जलभराव
( ii ) नियंत्रित जलभराव

  • कटवां अथवा तोड़ सिंचाई विधि
  • क्यारी सिंचाई विधि
  • थाला विधि
  • अंगूठी विधि
  • समोच्च कूंड सिंचाई विधि
  • मेंड एवं कूंड विधि
  • पट्टीदार सिंचाई विधि
2. अवभूमि या अधोसतह सिंचाई विधि ( Subsurface Irrigation )
3. बौछारी सिंचाई विधि ( Sprinkler Irrigation )
4. टपकदार या ड्रिप सिंचाई विधि ( Drip, Trikle Irrigation )


फसल सिंचाई की प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए? | method of irrigation in hindi


1. सतही सिंचाई ( Surface Irrigation )

सिंचाई की यह विधि अत्यन्त प्राचीन है । कुल सिंचित क्षेत्र का 95 प्रतिशत भाग आज भी सतही सिंचाई विधि द्वारा सिंचित किया जाता है ।

इस विधि को धरातलीय अथवा गुरुत्वीय सिंचाई (gravity irrigation) के नाम से भी पुकारते हैं ।

सतही सिंचाई (surface irrigation in hindi) में जल प्रवाह को खेत के ऊपरी भाग पर फैलने के लिए खोल दिया जाता है ।

यह प्रक्रिया समतल भूमियों के लिए उपयुक्त होती है । ढालू भूमियों में जल वितरण में असमानता हो जाने के कारण असुविधा होती है ।


सतही सिंचाई विधि के प्रकार -


( i ) अनियन्त्रित जल भराव ( Wild Flooding ) -

यह सिंचाई की प्राचीन पद्धति है, इसमें पानी को कम नियन्त्रित करने की आवश्यकता पड़ती है । इस विधि में पानी को प्राकृतिक ढाल के अनुरुप खेत में खोल दिया जाता है । जिसमें जल का वितरण असमान होता है । खेत का कोई भाग तो जलमग्न हो जाता है, कोई भाग सूखा रह जाता है, जिससे फसल वृद्धि भी एक समान नहीं हो पाती ।


( i ) नियन्त्रित जल भराव ( Controlled Flooding ) -

इस विधि में सर्वप्रथम खेत को समतल बनाया जाता है । खेत की आकृति के अनुरुप आवश्यक क्यारियों के विभाजन क्यारियों तथा मेड़ों के आकार एवं व्यवस्था के अनुसार इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है -

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सतही सिंचाई विधि के प्रमुख प्रकार -

  • कटवां अथवा तोड़ सिंचाई विधि ( Flood Irrigation )
  • क्यारी सिंचाई विधि ( Bed or Bordar Irrigation )
  • थाला विधि ( Basin Method )
  • अंगूठी विधि ( Ring Method )
  • समोच्च कूंड सिंचाई विधि ( Contour Furrow Method )
  • मेंड एवं कूंड विधि ( Ridge and Furrow Method )
  • पट्टीदार सिंचाई विधि ( Strip Method )


सतही सिंचाई विधि के प्रमुख प्रकारों का वर्णन -


( अ ) कटवां अथवा तोड़ विधि ( Flood Irrigation ) -

इस विधि को अपनाने के लिए अधिक मात्रा में जल की उपलब्धता आवश्यक है, नहरों से सिंचाई की जाने वाली भूमियों में यह विधि अपनाई जाती है । इस विधि में पानी अधिक व्यय होता है, भूमि दलदली हो जाती है । फसल क्षतिग्रस्त हो जाती है । खरपतवारों का प्रकोप होता है । जल स्तर ऊँचा उठता है एवं विभिन्न प्रकार के रासायनिक परिवर्तन होने की सम्भावना होती है ।


( ब ) क्यारी विधि ( Bed or Bordar Irrigation ) -

इस विधि के अन्तर्गत पूरे खेत को छोटी - छोटी क्यारियों में बदल दिया जाता है । जो मेड़ों के द्वारा एक दूसरे से पृथक होती है । इस प्रकार की व्यवस्था में खेत में मामूली ढाल होना आवश्यक है । जिससे ऊँचे स्थान पर बनी क्यारियों में पानी समान रुप से परत के रुप में लगाया जाता है । सामान्यतः फसलों की सिंचाई के लिए यह विधि अच्छी है ।


( स ) थाला विधि ( Basin Method ) -

इस विधि में पौधों के तने के चारों तरफ थाले बनाये जाते हैं । जिसमें 5 से 15 सेमी. तक पानी भरा जाता है । भारी गठन वाली भूमि के लिये यह विधि उपयुक्त है । यह विधि समतल भूमियों, सीधी बढ़ने वाली फसलों एवं अधिक पानी उपलब्ध होने वाले स्थानों पर अपनाई जाती है ।


( द ) अँगूठी विधि ( Ring Method ) -

यह थाला विधि का ही सुधारा गया रुप बागों की सिंचाई के लिए यह विधि उपयुक्त है । इस विधि में पानी एक थाले से दूसरे थाले में जाने की सम्भावना नहीं रहती । थाला विधि में एक थाले से दूसरे थाले में पानी जाने की सम्भावना रहती है ।


( य ) समोच्च कूँड विधि ( Contour Furrow Method ) -

ऊँची - नीची भूमि में सिंचाई के लिए यह विधि अपनाई जाती है । यह पर्वतीय क्षेत्रों की सिंचाई के लिए उपयुक्त है, लेकिन अधिक लोकप्रिय नहीं है ।


( र ) मेंड एवं फॅड विधि ( Ridge and furrow Method ) -

इस विधि में सम्पूर्ण प्रक्षेत्र को कँड एवं मेडों में विभाजित करके दूंडों में सिंचाई की जाती है । यह विधि सब्जी की फसलों एवं गन्ने के लिए उपयुक्त है । इस विधि में पानी कम मात्रा में व्यय होता है । यह विधि कम पानी वाले स्थानों के लिए अच्छी है ।


( व ) पट्टीदार विधि ( Strip Method ) -

यह विधि पानी की अत्यन्त कमी वाले क्षेत्रों के लिए है इस विधि में क्रमशः कम एवं अधिक जल माँग वाली फसलों को पट्टियों में लगाया जाता है तथा पट्टियों में ही सिंचाई की जाती है इस प्रकार से नमी अधिक नमी वाली पट्टी से कम नमी वाली पट्टी की और बढ़ती है जिससे कम नमी चाहने वाली फसल की सिंचाई स्वतः होती रहती है । इस प्रकार दोनों फसल को लाभ होता है ।


सतही सिंचाई विधि के लाभ | advantages of surface irrigation method in hindi


  • सिंचाई की अन्य विधियों की तुलना में इसमें प्रारम्भिक व्यय कम होता है ।
  • यह विधि आसान एवं सुविधाजनक होती हैं ।
  • इसमें विभिन्न यन्त्रों की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
  • अतः छोटे किसानों के लिए सुविधाजनक होती है ।


सतही सिंचाई विधि से हानियाँ  -

  • इस विधि की जल प्रयोग दक्षता कम होती है ।
  • इसमें पर्याप्त जल की क्षति होती है ।
  • इसमें पोषक तत्त्वों के नष्ट होने की सम्भावना रहती है, अधिक जलभराव हो जाने के कारण भूमि ऊसर बनने की सम्भावना भी रहती है ।


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2. अवभूमि या अधोसतह सिंचाई विधि ( Subsurface Irrigation )


अवभूमि सिंचाई के अन्तर्गत पौधों के जड़ क्षेत्र को एक छेद युक्त पाइप के माध्यम से पानी दिया जाता है ।

इस विधि का प्रयोग अधिक गहरे जलस्तर एवं 2 मीटर के लगभग गहराई में स्थित कठोर पटल वाली भूमियों में किया जाता है । भूमि में 15 से 30 मीटर अन्तराल पर चौड़ी एवं गहरी खाई खोदी जाती है । खाई को पानी से भर दिया जाता है । इस खाई से रिसकर फसलों को पानी मिलता है ।

भारतवर्ष में यह विधि केरल में नारियल के पेड़ों एवं कश्मीर में सब्जियों की खेती के लिए प्रयुक्त होती है । यह विधि उथले जल स्तर वाली भूमियों के लिए उपयोगी होती है ।


अधोसतही सिंचाई से क्या लाभ हैं? | advantage of subsurface irrigation

  • अधोसतही सिंचाई का प्रयोग करने से वाष्पीकरण द्वारा सिंचाई जल की हानि नगण्य होती है ।
  • फसलों में इस विधि से सिंचाई करने पर खरपतवार कम उगते हैं ।


अधोसतही सिंचाई से हानियां -

  • इस विधि से सिंचाई करने पर भूमिगत सिंचाई जल की हानि होती है ।


3. बौछारी सिंचाई विधि ( Sprinkler Irrigation )


सिंचाई की इस विधि में जल पाइप लाइन के माध्यम से छिड़काव स्थल पर ले जाया जाता है । जहाँ पर फुहार के माध्यम से वर्षा की बूंदों की तरह जल फसल पर छिड़का जाता है । इस विधि को ओवर हैड सिंचाई प्रणाली भी कहते हैं ।

यद्यपि इस विधि में प्रारम्भिक व्यय अधिक होता है । लेकिन सिंचाई की उत्तम विधि है । सतही सिंचाई की तुलना में इस विधि द्वारा 25 से 50 प्रतिशत सिंचाई जल की बचत होती है ।

इस विधि को प्रोत्साहन देने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारें कृषकों को संयन्त्र लगाने के लिए अनुदान दे रही है ।


बौछारी सिंचाई के लाभ | advantages of sprinkler irrigation

  • इस विधि में सिंचाई के लिए नालियाँ, मेड़ें बनाने एवं उनकी देखरेख की आवश्यकता नहीं होती इससे श्रम एवं व्यय की बचत होती है ।
  • पानी के नियन्त्रित प्रयोग से सिंचाई दक्षता (irrigation capacity) में वृद्धि होती है ।
  • जलश्रोत से अधिक ऊँचाई पर स्थित खेतों में भी इस विधि से सिंचाई सम्भव है ।
  • इस विधि द्वारा कम सिंचाई योग्य जल से अधिक क्षेत्र की सिंचाई करना सम्भव है ।


बौछारी सिंचाई की हानियाँ | disadvantage of sprinkler irrigation

  • इस विधि से सिंचाई करने में प्रारम्भिक व्यय अधिक आता है । यन्त्र के रख रखाव एवं संचालन पर अधिक खर्चा होता है ।
  • एक निश्चित सीमा से अधिक वायु प्रवेग का सिंचाई की दक्षता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ।
  • फंफूद जनित रोग से संवेदनशील फसलों पर सिंचाई के लिए यह विधि उपयुक्त नहीं है ।
  • हानिकारक लवणों के प्रति संवेदनशील फसलों के लिए इस विधि से सिंचाई करना उपयुक्त नहीं है । घुलनशील लवणयुक्त पानी से सिंचाई करने पर उत्पादन प्रभावित होता है ।


4. टपकदार या ड्रिप सिंचाई विधि ( Drip, Trikle Irrigation )


यह सिंचाई ऐसे क्षेत्रों में अपनाई जाती है जहाँ पानी की बहुत कमी होती है ।

इस विधि में सिंचाई जल धीरे - धीरे बूंद - बूंद करके पौधों के जड़ क्षेत्र के निकट प्रयोग किया जाता है । इस विधि में भूमि की बहुत थोड़ी सतह ही गीली हो जाती है ।

इस विधि से फर्टीगेशन की प्रक्रिया का दक्षतापूर्वक प्रयोग सम्भव होता है । इसमें सिंचाई प्रणाली हवा अथवा चक्रवात द्वारा प्रभावित नहीं होती है ।

इस प्रणाली में सिंचाई जल की आपूर्ति पौधों के जड़ क्षेत्र में होने के कारण ड्रिपर (dripper) की ऊँचाई बहुत कम रखी जाती है ।


टपकदार या ड्रिप सिंचाई विधि के लाभ

  • यह विधि कम सिंचाई जल उपलब्ध होने पर अपनाई जाती है ।
  • यह विधि शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त इस विधि की सिंचाई दक्षता अधिक होती है ।


टपकदार या ड्रिप सिंचाई विधि से हानियां

  • इसमें सिंचाई दक्षता अधिक आती है ।
  • इस विधि से उत्पादन में तुलनात्मक अधिक वृद्धि होती है ।


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सिंचाई की आवश्यकता क्यों होती है वर्णन कीजिए?| necessity of irrigation in plants in hindi


भारतीय कृषि वर्षा पर आधारित है परन्तु हमारे देश में वर्षा असमान व अनिश्चित होने के कारण पौधों की सम्पूर्ण जल की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पाती और अन्य विकल्प के रूप में कृत्रिम रूप से जल देने का कार्य अच्छे उत्पादन के लिए आवश्यक हो जाता है अर्थात् सिंचाई आवश्यक हो जाती है ।

वर्षा की अपर्याप्त मात्रा तथा असमान वितरण के कारण फसलों में जल देने की आवश्यकता होती है ।

वर्तमान समय में सघन कृषि कार्यक्रम व कुछ महत्वपूर्ण फसलों को उगाने के कारण भी वर्षा जल के अतिरिक्त सिंचाई जल पर निर्भर करना पड़ता है ।

फसलों की वानस्पतिक वृद्धि होने के कारण अतिरिक्त जल की आवश्यकता होती है । भूमि में उपलब्ध जल की मात्रा के आधार पर भी सिंचाई (irrigation in hindi) करने की आवश्यकता को निर्धारित किया जाता है ।

इनके अतिरिक्त पौधे की वृद्धि की विभिन्न अवस्थाओं में जल की आवश्यकता में कमी या वृद्धि होती रहती है ।

साथ ही साथ पौधों के जड़ क्षेत्र में जल संग्रहण क्षमता (water storage capacity) द्वारा सिंचाई की आवश्यकता प्रभावित होती है ।


सिंचाई से क्या लाभ हैं एवं अधिक सिंचाई जल से होने वाली हानियां लिखिए?


भारतीय कृषि में सिंचाई का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है ।

सिंचाई करने से फसलों की वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है तथा कृषि (agriculture in hindi) उत्पादन बढ़ जाता है जो किसी भी क्षेत्र की सम्पन्नता का प्रतीक माना जाता है ।


सिंचाई के प्रमुख लाभ | advantages of irrigation in hindi


सिंचाई से होने वाले लाभ निम्न प्रकार हैं -

  • खेतों में खड़ी फसल की सिंचाई करने से प्रति इकाई क्षेत्रफल में फसलों का उत्पादन अधिक होता है । अधिक उत्पादन होने से कृषक की आय में वृद्धि होती है ।
  • कृषक की आय में वृद्धि से राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है ।
  • कृषक की आय बढ़ने से उसके सामाजिक स्तर में सुधार होता है ।
  • नहरी जल से खेतों की सिंचाई करने से जल स्तर में वृद्धि होती है ।
  • निरन्तर कई वर्षों तक वर्षा न होने पर केवल सिंचाई के सहारे ही फसलों को उगाना सम्भव है ।
  • ऐसी फसलें जिनकी जल माँग अधिक होती है, उन्हें उगाने में सिंचाई जल सहायक होता है ।
  • सिंचाई जल परियोजनाओं से विद्युत का भी उत्पादन किया जाता है ।
  • सिंचाई परियोजनाओं की सहायता से मछली पालन व्यवसाय के लिए जल संग्रहण में सहायता मिलती है ।
  • सिंचाई जल परियोजनाओं की सहायता से विभिन्न स्थानों पर जलीय पर्यटन केन्द्रों (recreational spots) का विकास सम्भव होता है ।


अधिक सिंचाई जल से हानियाँ | disadvantages of excess irrigation water in hindi


सिंचाई से होने वाली प्रमुख हानियां निम्न प्रकार हैं -

  • अत्यधिक सिंचाई जल से सम्पूर्ण फसल नष्ट हो सकती है ।
  • क्षेत्र के जलमग्न होने का खतरा रहता है, जिससे क्षेत्र के नागरिकों का दैनिक जीवन प्रभावित होता है । भूमि में अधिक पानी लगने से भूमि के दलदली होने की सम्भावना रहती है और वह कई वर्षों तक खेती के अयोग्य ही रहती है ।
  • दलदली भूमि में बहुत से बीमारी फैलाने वाले खरपतवार उग जाते हैं, जिन्हें नष्ट करना दूभर हो जाता है ।
  • अधिक जल भराव के कारण उस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की बीमारियों के फैलने का खतरा हो जाता है ।


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सिंचाई के क्या उद्देश्य है? | purpose of irrigation in hindi


मृदा में सिंचाई निम्नलिखित उद्देश्यों से की जाती है -

  1. मृदा में आवश्यक नमी की व्यवस्था हेतु ।
  2. उत्पादन को सुनिश्चित एवं फसलों को असामयिक सूखे के प्रकोप से बचाने हेतु ।
  3. वातावरण को पौधों की वृद्धि के अनुकूल बनाने हेतु । मृदा के अन्दर उपस्थित लवर्णों को घोलने एवं उन्हें मृदा से बाहर निकालने के लिये ।
  4. भूमि की कठोर परों को नम करने के लिए ।
  5. भूमि में बीज अंकुरण हेतु उपयुक्त नमी की व्यवस्था के लिए ।


सिंचाई के मूल सिद्धान्त लिखिए? | principles of irrigation in hindi


सिंचाई के कुछ प्रमुख मूल सिद्धान्त निम्न प्रकार हैं -

  1. फसलों में नमी का स्तर बनाये रखना चाहिए, मृदा में जल का 60 प्रतिशत भाग नष्ट हो जाने पर पुनः सिंचाई कर देनी चाहिए ।
  2. धान के अलावा अन्य फसलों में एक घण्टे से अधिक पानी नहीं रुकना चाहिए इससे फसलों पर विपरीत हानिकारक प्रभाव पड़ता है ।
  3. सिंचाई करने से पहले खेत को समतल करके इसमें उचित प्रकार से क्यारी, मेड़, नाली बना लेनी चाहिए जिससे कम से कम पानी अधिक क्षेत्रफल की सिंचाई के लिए उपयोग हो सके ।
  4. सिंचाई के उपरान्त पानी की क्षति को रोकने के लिए नमी संरक्षण प्रविधि, पलवार या खरपतवार नियन्त्रण द्वारा कम करने के प्रयास होने चाहिए ।
  5. सिंचाई प्रक्रिया इस प्रकार की होनी चाहिए जिसमें जल सम्पूर्ण नमी क्षेत्र में फैले इससे मृदा में वायु संचार, पोषक तत्त्व आपूर्ति, जीवाणु प्रजजन, पौधों में ऊतक, वृद्धि सम्बन्धी सहायता मिलती है ।सिंचाई के साथ कीटनाशकों का प्रयोग मितव्ययी होता है । सिंचाई का कार्यक्रम जलवायु, मृदा नमी, को दृष्टिगत रखकर बनाना चाहिए ।

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