सिंचाई की विधियाँ ( Method of Irrigation in hindi )

सिंचाई एवं सिंचाई की प्रमुख विधियां कौन-कौन - सी है वर्णन कीजिए?


प्राकृतिक रूप से जल की आवश्यकता पूर्ति नहीं हो पाती है, अतः पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए कृत्विक रूप से पानी की व्यवस्था करनी पड़ती है, जिसे सिंचाई कहते है । 

भारत में जिन विधियों द्वारा सिंचाई की जाती है, उन्हें सिंचाई की विधियां (Methods of Irrigation in hindi) कहा जाता है ।

"कृत्रिम रूप से फसलों को पानी देने को सिंचाई (Irrigation in hindi) कहा जाता है ।"

Artificial application of water fir increasing the crop production is known as Irrigation.

फसलोत्पादन में जल के अभाव में पौधे का जीवन असंभव होता है, पौधों को जीवन काल में अधिक मात्रा में जल की आवश्यकता होती है ।

सिंचाई की विधियाँ ( Method of Irrigation in hindi )
सिंचाई की विधियाँ ( Method of Irrigation in hindi )


सामान्यतः किसी खेत अथवा फसल को किस प्रकार से पानी दिया जाता है, पानी देने की इस ढंग को सिंचाई की विधि (Method of Irrigation in hindi) रहते हैं ।

यह एक व्यवस्था होती है, जिसके द्वारा फसल उत्पादन में वृद्धि एवं विकास को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है ।

सिंचाई की विधियां (Methods of Irrigation in hindi) - सिंचाई की तीन प्रमुख विधियां होती है जिनके माध्यम से फसलों की सिंचाई का प्रयास किया जाता है ।

सतह सिंचाई (Surface Irrigation)
बौछारी सिंचाई (Sprinkler Irrigation)
अवभूमि सिंचाई (Sab surface or Drip, Trikle Irrigation)

इन्हें भी देखें


सिंचाई की विधियों के नाम (Method of Irrigation in hindi)


सिंचाई की प्रमुख विधियाँ, जो निम्नलिखित है, जिनके माध्यम से फसलों की सिंचाई  की जाती है ।


1. सतही सिंचाई विधि ( Surface Irrigation method )

2. पट्टीदार सिंचाई विधि ( Strip Irrigation Method )

3. बौछारी सिंचाई विधि ( Sprinkler Irrigation Method )

4. अवभूमि सिंचाई विधि ( Sub Surface method )

5. टपकदार या बूंद बूंद सिंचाई विधि( Drip or Trikle Irrigation method )


सिंचाई की विधियां एवं उनके लाभ व हानियां


भारत में कई तरह की सिंचाई की विधियां (Methods of irrigation in hindi) अपनाई जाती है, जिन सिंचाई विधियों के लाभ व उनकी हानियां निम्नलिखित है।


सतही सिंचाई विधि (Surface Irrigation Method in hindi)
सतही सिंचाई विधि (Surface Irrigation Method in hindi)


सतही सिंचाई विधि (Surface Irrigation Method in hindi) की यह विधि अत्यन्त प्राचीन है । कुल सिंचित क्षेत्र का 95 प्रतिशत भाग आज भी सतही सिंचाई विधि द्वारा सिंचित किया जाता है ।

इस विधि को धरातलीय अथवा गुरुत्वीय सिंचाई ( Gravity Irrigation ) के नाम से भी पुकारते हैं ।

इस विधि में जल प्रवाह को खेत के ऊपरी भाग पर फैलने के लिए खोल दिया जाता है ।

यह प्रक्रिया समतल भूमियों के लिए उपयुक्त होती है । भूमियों में जल वितरण में असमानता हो जाने के कारण असुविधा होती है ।

सतही सिंचाई विधि के लाभ ( Advantages of Surface Irrigation Method in hindi )


सिंचाई की अन्य विधियों की तुलना में इसमें प्रारम्भिक व्यय कम होता है । यह विधि आसान एवं सुविधाजनक होती है ।

इसमें विभिन्न यन्त्रों की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं । अतः छोटे किसानों के लिए सुविधाजनक होती है ।

सतही सिंचाई विधि से हानियाँ ( Disadvantages ) -


इस विधि की जल प्रयोग दक्षता कम होती है । इसमें पर्याप्त जल की क्षति होती है ।

इसमें पोषक तत्व के नष्ट होने की सम्भावना रहती है, अधिक जलभराव हो जाने के कारण भूमि ऊसर बनने की सम्भावना भी रहती है ।

जल भराव (Flooding)


जल भराव दो प्रकार का होता है, जो निम्नलिखित है -


अनियंत्रित जल भराव (Wild Flooding)
नियंत्रित जलभराव (Controlled Flooding)


( i ) अनियन्त्रित जल भराव ( Wild Flooding ) –


यह सिंचाई की प्राचीन पद्धति है, इसमें पानी को कम नियन्त्रित करने की आवश्यकता पड़ती है ।


इस विधि में पानी को प्राकृतिक ढाल के अनुरुप खेत में खोल दिया जाता है । जिसमें जल का वितरण असमान होता है ।


खेत का कोई भाग तो जलमग्न हो जाता है, कोई भाग सूखा रह जाता है, जिससे फसल वृद्धि भी एक समान नहीं हो पाती ।


( ii ) नियन्त्रित जल भराव ( Controlled Flooding ) –


इस विधि में सर्वप्रथम खेत को समतल बनाया जाता है ।


खेत की आकृति के अनुरुप आवश्यक क्यारियों के विभाजन क्यारियों तथा मेड़ों के आकार एवं व्यवस्था के अनुसार इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है -


( अ ) कटवां अथवा तोड़ विधि ( Flood Irrigation ) –


इस विधि को अपनाने के लिए अधिक मात्रा में जल की उपलब्धता आवश्यक है, नहरों से सिंचाई की जाने वाली भूमियों में यह विधि अपनाई जाती है ।


इस विधि में पानी अधिक व्यय होता है, भूमि दलदली हो जाती है ।


फसल क्षतिग्रस्त हो जाती है । खरपतवारों का प्रकोप होता है ।


जल स्तर ऊँचा उठता है एवं विभिन्न प्रकार के रासायनिक परिवर्तन होने की सम्भावना होती है ।


सतही सिंचाई विधि (Methods of Irrigation in hindi)
सतही सिंचाई विधि (Methods of Irrigation in hindi)


( ब ) क्यारी विधि ( Bed or Bordar Irrigation ) -


इस विधि के अन्तर्गत पूरे खेत को छोटी - छोटी क्यारियों में बदल दिया जाता है । जो मेड़ों के द्वारा एक दूसरे से पृथक होतं है ।


इस प्रकार की व्यवस्था में खेत में मामूली ढाल होना आवश्यक है । जिससे ऊँचे स्थान पर बनी क्यारियों में पानी समान रूप से परत के रुप में लगाया जाता है ।


सामान्यत: फसलों की सिंचाई के लिए यह विधि अच्छी है ।


( स ) थाला विधि ( Basin Method ) -


इस विधि में पौधों के तने के चारों तरफ थाले बनाये जाते हैं । जिसमें 5 से 15 सेमी. तक पानी भरा जाता है ।


भारी गठन वाली भूमि के लिये यह विधि उपयुक्त है ।


यह विधि समतल भूमियों, सीधी बढ़ने वाली फसलों एवं अधिक पानी उपलब्ध होने वाले स्थानों पर अपनाई जाती है ।


( द ) अँगूठी विधि ( Ring Method ) -


यह थाला विधि का ही सुधारा गया रुप है । बागों की सिंचाई के लिए यह विधि उपयुक्त है ।


इस विधि में पानी एक थाले से दूसरे थाले में जाने की सम्भावना नहीं रहती ।


थाला विधि में एक थाले से दूसरे थाले में पानी जाने की सम्भावना रहती है ।


( य ) समोच्च फॅड विधि ( Contour Furrow Method ) -


ऊँची - नीची भूमि में सिंचाई के लिए यह विधि अपनाई जाती है ।


यह पर्वतीय क्षेत्रों की सिंचाई के लिए उपयुक्त है, लेकिन अधिक लोकप्रिय नहीं है ।


( र ) मेंड एवं फॅड विधि ( Ridge and furrow Method ) -


इस विधि में सम्पूर्ण प्रक्षेत्र को फॅड एवं मेडों में विभाजित करके फँडों में सिंचाई की जाती है ।


यह विधि सब्जी की फसलों एवं गन्ने के लिए उपयुक्त है ।


इस विधि में पानी कम मात्रा में व्यय होता है ।


यह विधि कम पानी वाले स्थानों के लिए अच्छी है ।


2. पट्टीदार सिंचाई विधि ( Strip Irrigation Method in hindi ) -


पट्टीदार सिंचाई विधि (Strip Irrigation method in hindi) पानी की अत्यन्त कमी वाले के लिए है इस विधि में क्रमशः कम एवं अधिक जल मॉग वाली फसलों को पट्टियों में लगाया जाता है तथा पट्टियों में ही सिंचाई की जाती है ।

पट्टीदार सिंचाई विधि (Strip Irrigation method in hindi)
पट्टीदार सिंचाई विधि (Strip Irrigation method in hindi)


इस प्रकार से नमी अधिक नमी वाली पट्टी ३ कम नमी वाली पट्टी की और बढ़ती है जिससे कम नमी चाहने वाली फसल की सिंचाई स्वतः होती रहती है । इस प्रकार दोनों फसल को लाभ होता है ।


3. बौछारी सिंचाई विधि  ( Sprinkler Irrigation Method in hindi )


बोछारी सिंचाई विधि (Sprinkler Irrigation Method in hindi) में जल पाइप लाइन के माध्यम से छिड़काव स्थल पर ले जाया जाता है ।

जहाँ पर फुहार के माध्यम से वर्षा की बूंदों की तरह जल फसल पर छिड़का जाता है ।

बोछारी सिंचाई विधि (Sprinkler Irrigation Method in hindi)
बोछारी सिंचाई विधि (Sprinkler Irrigation Method in hindi)



इस विधि को ओवर हैड सिंचाई प्रणाली भी कहते हैं । यद्यपि इस विधि में प्रारम्भिक व्यय अधिक होता है । लेकिन सिंचाई की उत्तम विधि है ।

सतही सिंचाई विधि की तुलना में इस विधि द्वारा 25 से 30 प्रतिशत सिंचाई जल की बचत होती है ।

इस विधि को प्रोत्साहन देने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारें कृषकों को संयन्त्र लगाने के लिए अनुदान दे रही है । 

बौछारी सिंचाई विधि के लाभ ( Advantages of Sprinkler Irrigation in hindi )


1. बोछारी सिंचाई विधि में सिंचाई के लिए नालियों में बनाने एवं उनकी देखरेख की आवश्यकता नहीं होती इससे श्रम एवं व्यय की बचत होती है । 

2. पानी के नियन्त्रित प्रयोग से सिंचाई दक्षता ( Irrigation Capacity ) में होती है ।

3. जलश्रोत से अधिक ऊँचाई पर स्थित खेतों में भी इस विधि से सिंचाई सम्भव है।

4. इस विधि द्वारा कम सिंचाई योग्य जल से अधिक क्षेत्र की सिंचाई करना सम्भव है । 

बौछारी सिंचाई विधि की हानियाँ ( Disadvantage of Sprinkler Irrigation in hindi )


1. बोछारी सिंचाई विधि से सिंचाई करने में प्रारम्भिक व्यय अधिक आता है । 

2. यंत्रों के रख रखाव एवं संचालन पर अधिक खर्चा होता है ।

3. एक निश्चित सीमा से अधिक वायु प्रवेग का सिंचाई की दक्षता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है ।

4. फंफूद जनित रोग से संवेदनशील फसलों पर सिंचाई के लिए यह विधि उपयुक्त नहीं है ।

5. हानिकारक लवणों के प्रति संवेदनशील फसलों के लिए इस विधि से सिंचाई करना उपयुक्त नहीं है । 

6. घुलनशील लवणयुक्त पानी से सिंचाई करने पर उत्पादन प्रभावित होता है ।

4. अवभूमि सिंचाई विधि ( Sub - Surface Irrigation Method in hindi )


अवभूमि सिंचाई विधि (sub-surface Irrigation Method in hindi) के अन्तर्गत पौधों के जड़ क्षेत्र को एक छेद युक्त पाइप के माध्यम से पानी दिया जाता है ।

अवभूमि सिंचाई विधि का प्रयोग अधिक गहरे जलस्तर एवं 2 मीटर के लगभग गहराई में स्थित कठोर पटल वाली भूमियों में किया जाता है ।

भूमि में 15 से 30 मीटर अन्तराल पर चौडी एवं गहरी खाई खोदी जाती है । खाई को पानी से भर दिया जाता है । इस खाई से रिसकर फसलों को पानी मिलता है ।

भारतवर्ष में यह विधि केरल में नारियल के पेड़ों एवं कश्मीर में सब्जियों की खेती के लिए प्रयुक्त होती है ।

यह विधि उथले जल स्तर वाली भूमियों के लिए उपयोग होती है ।

5. ड्रिप या टपकदार, बूंद - बूंद सिंचाई विधि ( Drip or Trikle Irrigation Method in hindi )


ड्रिप या टपकदार, बूंद बूंद सिंचाई विधि (drip & trikle Irrigation Method in hindi) की नयी विकसित विधि है । 

यह कम जल उपलब्धता वाले स्थानों में प्रयोग की जाती है ।

सन 1940 में इजराइल के इंजीनियर सिमका ब्लास ( Simca Blase ) ने देखा कि पानी की टोंटी से रिसाव होने वाले स्थान के वृक्षों की वृद्धि उसके आस पास के वृक्ष से अधिक थी ।

इसके आधार पर उन्होंने वर्ष 1964 में टपकदार सिंचाई पद्धति विकसित की साथ ही उसको पेटेन्ट भी कराया ।

साठवें दशक के अन्त में, आस्ट्रेलिया संयुक्त राष्ट्र ।

अमेरिका एवं विश्व के अनेक देशों में इसका प्रयोग हुआ । 

आज इस विधि का सभी देशों में व्यापक प्रचार - प्रसार दआ है ।

ड्रिप या टपकदार, बूंद बूंद सिंचाई विधि (drip & trikle Irrigation Method in hindi)
ड्रिप या टपकदार, बूंद बूंद सिंचाई विधि (drip & trikle Irrigation Method in hindi)



टपकदार या बूंद बूंद सिंचाई विधि (drip & trikle Irrigation Method in hindi) में भूमि के भीतर प्लास्टिक का जालीयुक्न पाइप हुल स्तर से नीचे पौधों जड क्षेत्र में स्थापित किया जाता है।

यांत्रिक विधि द्वारा उत्सर्जक की सहायता से जल को सिंचाई ( Irrigation in hindi ) क्षेत्र में प्रदान किया जाता है ।

विभिन्न अध्ययनों के आधार पर सिद्ध हो चुका है, की वातावरण में होने वाली हानि से पानी को बचाते हुए उचित वृद्धि एवं अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए टपकदार सिंचाई (Drip Irrigation) एक उत्तम विधि है ।

सिंचाई जल की माप एवं सिंचाई जल माफ की विधियां


सिंचाई जल की माप ( Measurement of Irrigation Water ) - जल प्रबन्धन हेतु सिंचाई जल की माप अति आवश्यक है ।


विभिन्न सिंचाई सम्बन्धी कार्यों में जल की माप अति उपयोगी होती है ।


जैसे - सिंचाई की योजना बनाने में सिंचित क्षेत्र की गणना में, जल क्षति के ऑकलन में, सिंचाई विधि के चुनाव में, इसमें सहायता मिलती है ।


सिंचाई जल की माप दो स्थितियों में की जाती है -


( i ) स्थिर पानी की माप जलाशय तालाब एवं बाँध के पानी की माप आयतन

जैसे - लीटर घनमीटर, हैक्टेयर मीटर अथवा हैक्टेयर सेन्टीमीटर में की जाती है ।


( ii ) प्रवाहित पानी की माप - नदियों, नहरों, सिंचाई की नालियों आदि से प्रवाहित जल की समय के सन्दर्भ में व्यक्त किया जाता है ।

जैसे - घनमीटर प्रति सेकेण्ड, लीटर प्रति घण्टा, क्यूसिक प्रति सेकेन्ड, हैक्टेयर सेन्टीमीटर प्रति घण्टा आदि ।


जल माप की विधियाँ ( Methods of Water Measurement )


सिंचाई जल माप के लिये निम्नलिखित विधियों का प्रयोग किया जाता है -


( 1 ) आयतन विधि ( Volume Method )
( 2 ) प्रवेग - क्षेत्र विधि ( Velocity - area Method )


( 3 ) मापन संरचनायें ( Measuring Structures )


( i ) आयतन विधि ( Volume Method ) -


छोटे झरनों द्वारा प्रवाहित होने वाले जल की माप के लिये यह एक सरल विधि है ।


इस विधि में झरने के नीचे एक निश्चित आयतन वाली बाल्टी अथवा अन्य बर्तन रख दिया जाता है । जितना समय यह बर्तन भरने में लगता है, उस समय को स्टाप वाच की सहायता से लिख लिया जाता है ।


इस प्रणाली में जल को नापने के लिये कई इकाइयाँ प्रयोग की जाती है जो निम्न प्रकार है -


1. लीटर -1000 घन सेन्टीमीटर पानी एक लीटर के बराबर होता है ।


2. घन मीटर - एक मीटर चौड़े, एक मीटर लम्बे तथा एक मीटर गहरे घन के बराबर पानी की मात्रा को एक घनमीटर कहते हैं ।

एक घन मीटर में 1000 लीटर पानी आता है ।


3. हैक्टर मीटर - एक हैक्टर क्षेत्रफल में एक सेमी . ऊँची पानी की मात्रा को एक हैक्टर मीटर कहते है ।


4. हैक्टर सेन्टीमीटर - एक हैक्टर क्षेत्रफल में एक सेमी. ऊँची पानी की मात्रा को एक हैक्टर मीटर कहते है ।


5. क्यूसैक - एक निश्चित बिन्दु से एक घन मीटर प्रति सेकेण्ड की दर से बहने वाले पानी की मात्रा क्यूसैक ' कहलाती है । यह आजकल की प्रचलित इकाई है ।


6. लीटर प्रति सेकेण्ड – एक निश्चित बिन्दु से लीटर प्रति सेकण्ड की गति से बहने वाली मात्रा लीटर प्रति सेकण्ड कहलाती है ।


100 घन मीटर हैक्टर सेण्टीमीटर 1,00,000 लीटर 1,00,000 लीटर 1


जल माप की इकाईयाँ ( Units of Water Measurement )


1. क्यूसेक ( Cusec ) -


किसी जल प्रवाह स्रोत से एक सेकेण्ड में जितने घनफुट पानी प्रवाहित होता है, उसे क्यूसेक के नाम से जाना जाता है ।

1 क्यूसेक = एक घनफुट प्रति सेकेण्ड = 62-5 पौण्ड या 6-25 गैलन या 28-35 लीटर


2. क्यूमेक ( Cumec ) -


इसका अर्थ क्यूविक मीटर प्रति सेकेण्ड है । अर्थात एक सेकेण्ड में एक घनमीटर बहे हुये पानी से है ।

एक घनमीटर पानी का आयतन = 1000 लीटर पानी का आयतन


3. एकड़ इन्च ( Acre inch ) -


एक एकड़ क्षेत्रफल पर एक इन्च खड़े पानी को एकड़ इन्च के नाम से पुकारते हैं ।

एक एकड़ इन्च पानी = 3630 घनफुट पानी होता है । आजकल मैट्रिक प्रणाली में इसे हैक्टेयर - सेन्टीमीटर से व्यक्त करते हैं ।


जिसका अर्थ होता है - एक हैक्टेयर क्षेत्रफल पर एक सेन्टीमीटर पानी खड़ा करना । एक हैक्टो - सेन्टीमीटर = 100 घन मीटर = 100000 लीटर पानी

Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.

Previous Post Next Post