खरपतवार किसे कहते है एवं उनका नियन्त्रण कैसे करते हैं

खरपतवार किसे कहते है एवं उनका नियन्त्रण कैसे करते हैं ( What are weeds called and how do we control them )


खरपतवार किसे कहते है एवं उनका नियन्त्रण कैसे करते हैं ( What are weeds called and how do we control them )
खरपतवार किसे कहते है एवं उनका नियन्त्रण कैसे करते हैं

खरपतवार किसे कहते है ( What is weed called )

आदिकाल से पौधे मनुष्य को प्रकृति द्वारा प्रदत बहुमूल्य धरोहर है ।

सम्पूर्ण विश्व में तीन लाख से अधिक पौधों की जातियाँ हैं । इनमें से लगभग तीन हजार जातियां मनुष्य जति के लिये आर्थिक रूप से लाभकारी है आर्थिक महत्व वाले पौधे की जातियों के साथ - साथ कुछ अन्य पौधे भी उगकर प्रतिस्पर्धा करते हैं ।

ये अवांछित अनावश्यक होते हैं जो मनुष्य एवं पशुओं के लिये हानिकारक होते हुए मनुष्य की गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं ।

ऐसे पौधों का उगना निश्चित रूप से चिंता का विषय है । कृषिकृत एवं अकृषिकृत क्षेत्रों में खपतवारों का उगना एक गम्भीर समस्या है ।

सघन खेती में उर्वरक , सिंचाई और बहुफसली खेती आदि के प्रयोग से खरपतवारों की समस्या और बढ़ी है ।

क्षेत्रों में भी खरपतवार विभिन्न स्थानों जैसे जलीय वातावरण , वनों , रेलवे लाइनों सड़क मार्गों हवाई अड्डों , औद्योगिक स्थनों एवं सौन्दर्यता के स्थानॊ में उगते हुये पाए जाते हैं ।

खरपतवार की परिभाषा ( Definition of weed )


ऐसा पौधा जो अवांछित स्थानों पर बिना बोए स्वयं ही उग जाता है और उस फसल को विभिन्न रूपों में क्षति पहुँचाकर उपज की हानि करता है , खरपतवार ( weed ) कहलाता है ।

जैसे - गेहूं की फसल में उगने वाला जंगली जई का पौधा ।

पीटर के अनुसार,

“ एक ऐसा पौधा जिसकी हानि करने की क्षमता उसकी लाथ करने की क्षमता से अधिक होती है , खरपतवार कहलाता है । "

बिल के अनुसार,

"एक ऐसा पौधा जिसे उस स्थान पर नहीं उगना चाहिये उग जाता है  खरपतवार कहा जाता है । "

खरपतवार क्या है ( What is Weed )


खरपतवार एक ऐसा अवांछित पौधा है जो बिना बोए ही खेतों तथा अन्य स्थानों पर कर तेजी से बढ़ता है और अपने समीप के पौधों की वृद्धि को दबाकर उपज  को घटा देता है जिससे फसलों की गुणवत्ता गिर जाती है ।

खरपतवार का दबाकर उपज क्षमता ( Yield) खरपतवार अवांछित पौधे हैं लेकिन सभी अवांछित पधि खरपतवार नहीं होते है ।

एक महत्वपूर्ण तथ्य है । ऐसे पौधे जो खरपतवार के रूप में जाने जाते हैं मनुष्य की क्रिया - कलापों का प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं ।

खरपतवार एक फसलयुक्त खेत , सड़क के किराने , बांग बगीचे तथा पार्क इत्यादि में कभी भी उगते हुये पाये जाते हैं ।

खरपतवारों के उदाहरण ( Example of weeds )


एकवर्षीय खरपतवार ( Anuual Weeds ) -


बथुआ ( Chinopodium album ) कृष्णनील ( Anagallis arvensis ) कनकुआ ( Commelina henghalensis )

द्विवर्षीय खरपतवार ( Biennial weeds )


बहुवर्षीय खरपतवार ( Perennial Weed ) -


मौथा ( Cyperus rotundus ) हिनखुरी ( Convolvulus arvensis ) , दूबवास ( Cyuodon dactylon )

खरीफ की फसलों के खरपतवार धान - मोथा , जंगली धान , सांवा , कौंदो , भंगछा , कनकुआ ।

मक्का - हजारदाना , मौथा , गुम्मा , बरू , दूब चौलाई ।

सोयाबीन , मूग , अरहर , मूंगफली हजारदाना , चौलाई , दूब , मौथा गुम्मा , हुलहुल ।

रबी की फसलों के खरफ्तवार चना , मटर , आलू , सरसो – चटरी - मटरी , गेगला , कृष्णनील , कंटीली , प्याजी , दूब , मौथा , बथुआ ।

गेहूँ चटरी - मटरी मुनमुना मौथा , सैंजी , हिरनखुरी , कृष्णनील दूब , बथुआ ।

बरसीम कृष्णनील , कंटीली , दूब , मौथा व कासनी ।



खरपतवारों की मुख्य विशेषताएँ ( Main Characteristics of Weeds )


( 1 ) कुछ खरपतवारों की बीज उत्पादन क्षमता बहुत अधिक होती है ।

जैसे — बथुआ का एक पौधा एक वर्ष में लगभग 70 , 0XN ) बीज पैदा करता है ।

( 2 ) खरपतवारों के बीजों का अंकुरण शीघ्र एवं तेजी से होता है ।

खरपतवारों के बीजों के अंकुरण वे वृद्धि को तापमान प्रोत्साहित करता है ।

रबी की फसलों एवं उसमें पाये जाने वाले खरपतवारों के लिये 5० - 22°C व खरीफ 22°C व खरीफ के खरपतवारों के लिये 19°C - 30°C तापमान उपयुक्त होता है ।

( 3 ) कुछ खरपतवारों की बड़े लम्बी और विकसित हो जाती है । 

उदाहरण-

कांस व हिरनखरी खरपतवारों की जड़े भूमि में 7 मीटर तक की गहराई तक पहुँच जाती है ।

( 4 ) कुछ खरपतवार फसल के पौधों के समान होते हैं अतः खरपतवार और फसल के पौधों को पहचानना कठिन हो जाता है । जैसे गेहूं की फसल में जंगली जई का पौधा ।

( 5 ) खरपतवार का पौधा किसी भी फसल के पौधों के साथ स्थान , प्रकाश , वायु , पोषक 9 \ कुछ खरपतवार आता है ।

जैसे पौधों के साथ स्म करता के पौधों के तत्व मृदा नमी व 0 , के लिये प्रतिस्पर्धा करता है ।

( 6 ) कुछ खरपतवारों के बीजों का आकार एवं रंग फसल के पौधे के बीजों के होते हैं जिससे अन्तर करना सरल नहीं होता ।

( 7 ) स्वभाव से कठोर होते हैं व प्रतिकूल परिस्थितियों में उगने की क्षमता रखते हैंं।

( 8 ) खरपतवार के पौधे पर कीटों व बीमारियों का प्रभाव कम होता है ।

( 9 ) कुछ खरपतवार दुर्गन्धयुक्त एवं विषैले होते हैं जैसे धतूरा व हुलहुल ।

( 10 ) कुछ खरपतवारों के बीजों पर पंख , बाल व कांटे होते हैं जो इनके बीजों के प्रसारण में सहायक होते हैं ।


उदहारण - आक , सत्यानाशी व गेहूंसा आदि ।

फसल - खरपतवार प्रतियोगिता ( Crop weed competition )


फसल के पौधों व खरपतवारों में सौर - ऊर्जा , वायु , स्थान , समय , मृदा नमी , पोषक तत्व व ऑक्सीजन के लिये संघर्ष होता है ।

किन्हीं दो पौधों में जब तक संघर्ष नहीं होता जब तक कि उनकी आवश्यकता से अधिक पोषक तत्व , जल और सौर ऊर्जा की उपलब्धता बनी हुई हैं ।

किसी भी एक कारक के आवश्यकता से कम होने पर संघर्ष शुरू हो जाता है ।

इस प्रकार यदि भूमि में पोषक तत्वों व जल की अधिकता है तो पौधों की वृद्धि प्रकाश पर निर्भर करती है ।

जल व प्रकाश की अधिकता में व पोषक तत्वों की कमी होने पर खरपतवार व फसल के पौधों में पोषक तत्वों की पूर्ति हेतू संघर्ष शुरू हो जाता है ।

इस प्रकार खरपतवार का फसल के पोधे के साथ सौर - ऊजी , वायु , पोषक तत्व स्थान व मृदा नमी आदि के लिये संघर्ष करना फसल खरपतवार प्रतियोगिता ( Crop - weed competition ) कहलाता है । 

फसल खरपतवार प्रतियोगिता को प्रभावित करने वाले कारक ( Factors affecting crop - weed competition )


फसल खरपतवार प्रतियोगिता को बहुत से कारक प्रभावित करते हैं जिनमें मृदा - नमी . पोषक तत्व , सौर ऊर्जा , स्थान , समय व ऑक्सीजन की पूर्ति प्रमुख हैं ।

इन कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है |

1 . पोषक तत्व ( Nutrients ) -

फसल खरपतवार प्रतियोगिता में पोषक तत्वों के लिये संघर्ष अति महत्वपूर्ण है ।

पौधों की वृद्धि में आवश्यक पोषक तत्व के लिये खरपतवार फसल के पौधों के साथ स्पर्धा करते हैं ।

किसी भी तत्व की कमी की अवस्था में फसलों व खरपतवारों के बैचि उस तत्व को ग्रहण करने के लिये प्रतियोगिता प्रारम्भ हो जाती है जिससे फसल की वृद्धि एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।

एक आंकलन के अनुसार खरपतवार भूमि से फसलों की वृद्धि के लिये आवश्यक पोषक तत्वों जैसे - नाइट्रोजन - 47 % , फॉस्फोरस 42 % पोटेशियम 55 % कैल्शियम 39 % और मैग्नीशियम 24 ग्रहण करते हैं ।

चौलाई खरपतवार की जातियां प्रायः अपने शुष्क पदार्थ में 30 % से अधिक नाइट्रोजन संचित करती है ।

बथुआ और कुल्फा खरपतवारों के शुष्क पदार्थ में 13 % पौटेशियम पाया जाता है ।

खरपतवारों को शुष्क पदार्थ की उत्पादन 1 - 10 टन / हैक्टेयर तक होता है । टिशियम 55 % कैल्शियमवश्यक पोषक तत्वों जैसे आकलन के अनुसार खरपतवार

2. मृदा नमी ( Soil moisture ) -

सामान्यतः फसल व खरपतवारों के बीच होने वाली याध को प्रभावित करने वाले कारकों में मृदा नमी एक महत्वपूर्ण कारक है ।

शुष्क व अशुष्क भूमियों में नमी के कारण स्थिति और भी गम्भीर हो जाती है ।

सामान्यतः खरपतवार , फसल के पौधों की अपेक्षा अधिक मात्रा में जल का उसवेदन करते हैं ।

इसीलिए शुष्क कृषि वाले क्षेत्रों में खरपतवार युक्त खेत से खरपतवार रहित खेत की अपेक्षा वास्तविक वाष्पी वाष्पोत्सर्जन ( Actual evon - transpiration ) अधिक होता है ।

सामान्यतः भूमि की प्रथम 15 सेमी की गहराई से मुख्य रूप से व 90 सेमी की गहराई तक खरपतवार भूमि से नमी ग्रहण करते हैं ।

3 . सौर - ऊर्जा ( Solar - energy ) -

अन्य कारकों की भांति सूर्य से प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा भी फसल खरपतवार प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करती है ।

खरपतवार के पौधों की ऊंचाई सौर ऊर्जा के प्रयोग करने के लिये फसल के पौधों के साथ संघर्ष करने वाला प्रमुख कारक है ।

भूमि में नमी व पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा व सौर - ऊर्जा की उपस्थिति में खरपतवार फसल के पौधों से अधिक वृद्धि करते हैं और उनकी ऊँचाई तेज़ी से बढ़ती है ।

सौर ऊर्जा के लिये खरपतवारों द्वारा प्रतिस्पर्धा फसलों के बीजांकुर ( Seedling ) के साथ ही शुरू हो जाती है ।

यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है जब एक पौधे की छाया दुसरे पौधे पर पड़ती है तो प्रकाश के अधिक होने पर भी कोई लाभ नहीं होता ।

फसलों को खरपतवार रहित रखने के लिये खरपतवारनाशियों का प्रयोग की क्रान्तिक अवस्थाएँ ( Critical periods of use of herbicides in crops to make them free । from weeds ) - 


फसलों को खरपतवार रहित बनाने के लिये खरपतवार नाशियों को उनकी क्रान्तिक अवस्था ( Critical stane ) पर प्रयोग करना अति महत्वपूर्ण है ।

ऐसी स्थिति में खरपतवारों को उनकी प्रारम्भिक वद्धि से ही नियन्त्रण करने में सहायता मिलती है ।

विभिन्न खरपतवार नाशियों के विभिन्न फसलों में प्रयोग का समय भी अलग - अलग होता है ।

खरपतवारों की क्रांतिक अवस्था में रसायनों का प्रयोग कर इन पर आसानी से नियन्त्रण किया जा सकता है ।

खेतों में खरपतवारनाशियों का प्रयोग निम्न क्रांतिक अवस्थाओं पर किया जाता है -


( i ) फसलों की बुवाई से पूर्व ( Pre - sowing application ) -

खेत में किसी फसल की बुवाई से पूर्व ही खरपतवारनाशियों का प्रयोग करना चाहिये ।

ऐसा करने से बोई गई फसल के अंकुरण से पर्व खरपतवारों के निर्गमन , अंकुरण व उनके स्थापन में क्षीणता आ जाती है । और फसल में सफलता पूर्वक खरपतवार को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है ।

( ii ) निर्गमन से पूर्व ( Pre - emergence ) -

इस समय पर खरपतवार नाशियों का प्रयोग फसल को बुवाई के बाद बीजाकुरों के निपमन और अंकुरण से पूर्व किया जाता है ।

खेत में यह स्थिति फसल , खरपतवार और फसल व खरपतवार के निर्गमन से पूर्व होती है ।

( iii ) निर्गमन के पश्चात् ( Post emergence ) -
खेत में उगाई गई फसल व खरपतवार दोनों के निर्गमन एवं अंकुरण के पश्चात् खरपतवारनाशी का प्रयोग क्रांतिक अवस्था पर किया जाता है ।

खरपतवारो को नियन्त्रण करने की विधियाँ ( Methods of controlling weeds )


खरपतवार नियन्त्रण के लिये विभिन्न विधियों अपनाई जाती है ।

खरपतवार नियन्त्रण की विधियाँ सस्य वैज्ञानिक विधियाँ

1. रसायनिक विधियाँ


2 . सस्य वैज्ञानिक विधियाँ


3. भौतिक विधियाँ

4. जैविक विधियाँ


1 . भौतिक विधियाँ ( Physical or Mechanical Methods ) -


इनको यान्त्रिक विधियाँ भी कहते हैं । खरपतवार नियन्त्रण की ये विधियाँ प्राचीनकाल से प्रचलित हैं ।

वर्तमान समय में इन विधियों का प्रयोग पौधशाला , लॉन ( Lawn ) तथा फूलों की क्यारियों में खरपतवार नियन्त्रण हेतु किया जाता है ।

विभिन्न प्रकार के यन्त्र जैसे खुरपी , फावड़ा , खुदाई , फोर्क , हैण्ड हो आदि का प्रयोग खरपतवारों को नष्ट करने के लिये किया जाता है ।

खरपतवारों के नियन्त्रण हेतु निम्न भौतिक विधियाँ प्रयोग में लाई जाती है -

( i ) हाथ से उखाड़ना ( Iland Pulling ) 

( ii ) निराई गुड़ाई करना ( Hoeing ) 

( iii ) मोवर का प्रयोग ( Use of mover ) 

( iv ) जल भराव ( Flooing )

( v ) मल्च का प्रयोग ( Use of Mulch )

( iv ) भू - परिष्करण क्रियाओं के द्वारा ( By tillage practices ) 

( v ) भूमि की सतह पर आग से जलाना ( Burning On Soil surfacc )

2 . सस्य वैज्ञानिक विधियाँ ( Agronomical methods ) -


कृषि के प्रारम्भ से ही खरपतवारों को नष्ट करने की सस्य वैज्ञानिक विधियाँ भी किसी ना किसी रूप में प्रयोग की जाती रही है ।

सस्य विधियों के प्रयोग से खरपतवार नियन्त्रण करने पर पौधों की वृद्धि खरपतवारों की तुलना में तेजी से होती है।

जिससे खरपतवारों के पौधों की वृद्धि शिथिल हो जाती है तथा वे ढक जाते हैं ।

इन विधियों में उत्तम फसल प्रबन्ध से सम्बन्धित सभी उपाय मलित होते हैं ।

अतः इन्हें कृषिकृत विधियाँ अथवा कुषण क्रियाओं सम्बन्धी विधियाँ भी कहते हैं ।

ये विधियाँ निम्नलिखित हैं -


( i ) फसल चक्र ( Crop rotation )

( ii ) फसलों का चुनाव ( Selection )

( iii ) परिश्करण क्रियाएँ ( Tillage proctices )

( iv) पलेवा सिंचाई ( Palewa irrigation )

( v ) बुवाई का समय ( Time of sowin )

( vi ) बुवाई की गहराई ( Depth of sowing )

( vii ) बीजदर एवं अन्तरण ( Seed rate and spacing )
( viii ) कार्बनिक खादी का प्रयोग ( Use of organic manures ) 

( viiii ) भूमि सुधारकों का प्रयोग ( Use of Soil Amendments ) 

( x ) उर्वरक प्रयोग करने की विधि ( Method of Fertilizer Application )

( xi ) भूमि को पती छोड़ना ( Fallowing of Land )

( xii ) परती भूमि में पानी भरना ( Flooding of Fallow lands ) 

( xiii ) खेत की तैयारी एवं अन्तरासस्यन ( Preparation of field and intercropping )

( xiiii) फसल कटाई की विधि ( Method of Crop Harvesting )

( 3 ) रसायनिक विधियाँ ( Chemical Methods ) -


प्राचीन समय से खरपतवारों पर नियन्त्रण हेतु रसायनों का प्रयोग किया जाता है ।

प्राकृतिक वनस्पति पर , सड़कों के किनारे , बाढ़ की लाइनों और पैदल चलने के रास्तों के आस - पास नियन्त्रण हेतु विभिन्न प्रकार के पदार्थ जैसे लवण , राख , व्यर्थ पड़े पदार्थ और उद्योग धुन्धों से निकलने वाले कुडे कचरे का प्रयोग किया जाता था ।

हमारे देश में रसायनिक खरपतवार नियन्त्रण लगभग सन् 1945 में प्रारम्भ हुआ ।

इस समय लगभग 400 खरपतवारनाशी विभिन्न कम्पनियों द्वारा निर्मित कर बिक्री हेतु बाजार में उपलब्ध है ।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ( ILC . A . R . ) नई दिल्ली द्वारा खरपतवार नियन्त्रण विषय पर भारतीय खरपतवार नियन्त्रण संस्थान ( ILI . WS ) भोपाल मध्य प्रदेश में स्थापित किया जा चुका है ।

इस संस्थान की देखरेख में विभिन्न राज्यों में खरपतवारों से सम्बन्धिन समस्याओं व नए - नए खरपतवारनाशियों का प्रयोग आदि विषयों पर विकास कार्य प्रगति पर है ।

खरपतवारों का नियंत्रण कैसे करें
खरपतवारों का नियंत्रण कैसे करें

खरपतवारों के नियंत्रण की विभिन्न रासायनिक विधियाँ निम्नलिखित हैं -

( i ) वरणात्मक खरपतवारनाशी ( Selective Herticides )

( a ) पर्णीय छिड़काव ( foliage  ) 

( b ) भूमि प्रयोग ( Soil Application )

( ii ) अवरणात्मक खरपतवारनाशी ( Non selccive Herbicides ) 

( a ) पणय छिडकाव ' ( foliage Application ) ( b ) भूमि प्रयोग ( Soil Application )

( 4 ) जैविक विधियाँ ( Biological Methods ) -


जैविक विधियों द्वारा खरपतवार नियन्त्रण का कार्य वर्तमान समय में बढ़ते हुये पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य के लिये खरपतवारनाशि से बढ़ते प्रदूषण को रोकने हेतु उपयुक्त माना गया है ।

इस विधि में कीटों मछलियों , घोंघी , धन्न फफेद व प्रतिस्पर्धात्मक पोधों का प्रयोग खरपतवार नियन्त्रण में किया जाता है ।

कीटों एवं पादप रोग द्वारा जैविक विधि से खरपतवार नियन्त्रण एक प्राचीन एवं प्रभावकारी विधि है ।

जैविक नियन्त्रण विकास की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है । अन्य विधियों के असफल रहने पर जैविक विधियों का प्रयोग सफल पाया गया है ।

खरपतवारों पर जैविक नियन्त्रण खरपतवारों के प्राकृतिक शत्रुओं द्वारा किया जाता है ।

इन प्राकतिक शत्रुओं में कीट , रोगों के जीवाणु , जानवर व विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां सम्मिलित है ।

खरपतवारों के जैविक नियन्त्रण में विभिन्न प्रकार के जैविक साधनों की सक्रिय भूमिका रहती है ।

( 5 ) अन्य विधियाँ ( Other methods ) -


खरपतवारों पर कुछ अन्य विधियों द्वारा भी नियन्त्रण संभव है ।

ये विधियाँ निम्नलिखित हैं -

( i ) ट्रॅक इन्जेक्शन ( Trunk Injection )

( ii ) जार विधि ( Jar Method ) 

( ii ) सिंचाई की नालियों में रासायनिक उपचार ( Chernical Treatment in irrigation channels )

रसायनिक विधि द्वारा खरपतवार नियन्त्रण के लाभ Merits of weed control by chemical Methods ) -


भारत में रसायनों का प्रयोग खरपतवारनाशियों के रूप में सन 1944 में प्रारम्भ हुआ । इस समय लगभग 400 खरपतवारनाशी विभिन्न कम्पनियों द्वारा निर्मित किये जा चुके हैं और प्रयोग के लिये बाजार में उपलब्ध है ।

रसायनिक खरपतवार नियन्त्रण का वृहद स्तर पर लाभकारी प्रयोग करने के लिये खरपतवारनाशी प्रभावी तथा सस्ता होना चाहिये ।

इस समय खरपतवारनाशियों का प्रयोग सम्पूर्ण विश्व में सफलतापूर्वक किया जा रहा है ।

 खरपतवार नियन्त्रण हेतु रसायनें के प्रयोग से निम्न लाभ होते हैं ।

( 1 ) रसायनों द्वारा खरपतवार नियन्त्रण कम परिश्रम एवं कम समय में होता है ।

( 2 ) थोड़े समय में कम श्रम के साथ अधिक क्षेत्रफल पर खरपतवारों का नियन्त्रण | किया जा सकता है ।

( 3 ) कुछ रसायन खरपतवारों द्वारा तेजी से ग्रहण कर अन्य भागों में पहुँच जाते हैं और वे पौधे के भूमिगत तथा भूमि से ऊपर सभी अंगों को समाप्त कर देते हैं ।

( 4 ) खड़ी फसल के सभी खरपतवार एक खरपतवारनाशी के प्रति माही होते हैं । खरपतवार फसलों की लाइनों के बीच में होने से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ।

( 5 ) रसायनों के प्रयोग से खरपतवारों के बीजों की सघनता भी रूक जाती है ।

( 6 ) खरपतवारनाशियों के प्रयोग में आने वाला खर्च हाथ से निराई गुडाई करने पर आने वाले खर्च की अपेक्षा कम होता है ।

( 7 ) अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में कृषक अधिक जल भराव के कारण निराई करने में असमर्थ रहते हैं । वहाँ पर रसायनिक विधि द्वारा खरपतवारों पर सरलता से नियन्त्रण सम्भव है ।

( 8 ) कुछ खरपतवारों पर कॉटे व बाल पाए जाते हैं , उन्हें अन्य विधियों की अपेक्षा रसायनिक विधि द्वारा नियन्त्रित किया जाता है ।

( 9 ) बहुवर्षीय खरपतवारों को नियन्त्रित करने के लिये अन्य विधियों की तुलना में यह एक प्रभावशाली विधि है ।

( 10 ) बंजर व बेकार पड़ी भूमियों में खरपतवारों के ऊपर अवरणात्मक ( Non - selective ) रसायनों का छिड़काव कर इन्हें सरलतापूर्वक नष्ट किया जा सकता है ।

रसायनिक विधि द्वारा खरपतवार नियन्त्रण से हानियाँ ( Demerits of weed control by chemical Methods )


( 1 ) कोई भी खरपतवारनाशी खरपतवारों की सभी जातियों को नष्ट नहीं करता है । खरएतवारनाशी के प्रयोग से केवल कुछ विशेष खरपतवारों पर नियन्त्रण किया जा सकता है ।

( 2 ) खरपतवारनाशियों के सफल प्रयोग हेतु कीटनाशी , कवकनाशी और उर्वरकों की तरह ही रसायनों के प्रयोग के बारे में सम्पूर्ण जानकारी होना आवश्यक है । अनुचित है अव्यवस्थित प्रयोग से लाभ की अपेक्षा हानि अधिक हो सकती है ।

( 3 ) छिड़काव करने वाले उपकरण का मूल्य कृषक द्वारा प्रारम्भ में ही खर्च करने के कारण यह एक उत्साहित करने वाली स्थिति नहीं है । सहकारी स्तर पर समितियों बनाकर इस समस्या का निदान सम्भव है ।

( 4 ) खरपतवारानाशियों के उचित प्रकार से प्रयोग के लिये एवं किसानों को लिये प्रशिक्षित लोगों की कमी इस क्षेत्र की एक प्रमुख समस्या है । यह समस्या भी सम साथ हल होती जा रही है ।

रासायनिक खरपतवार नियन्त्रण की सफलता एवं भविष्य ( Success and Future of Chemical Weed Control ) -


कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये खरपतवारों का नियन्त्रण अत्यन्त आवश्यक है ।

खरपतवारों के नियन्त्रण में खरपतवारनाशी रसायनों की प्रमुख भूमिका है ।

इन रसायनों का प्रयोग खरपतवार नियन्त्रण की अन्य विधियों जैसे भौतिक , जैविक व सस्य वैज्ञानिक आदि की तुलना में अत्यन्त प्रभावकारी सिद्ध हो चुका है ।

अतः कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु इन रसायनों की उपलब्धता बढ़ाने के लिये निरन्तर नए - नए रसायनों का विकास व व्यापारिक स्तर पर इनके निर्माण की आवश्यकता बढ़ी है ।

इस समय लगभग 400 से अधिक खरपतवारनाशी रसायन प्रयोग में लाए जा रहे है ।

इन रसायनों के निर्माण एवं विकास हेतु भारी मात्रा में प्रारम्भिक स्तर पर धन की आवश्यकता होती है जिसका अर्थ है खरपतवारों के नियन्त्रण एवं उन्मूलन पर खर्च ।

परन्तु रसायनों के प्रयोग से यह सिद्ध हो चुका है कि भौतिक नियन्त्रण की तुलना में यह एक सस्ती । एवं प्रभावकारी विधि है । इनके प्रयोग से कृषि उत्पादन बढ़ता है तथा खरपतवार नियन्त्रण पर होने वाले खर्च में कमी आती है ।

खरपतवार के प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने के कारण इनके प्रयोग की प्रबल सम्भावनाएँ हैं । 

खरपतवारनाशियों के अवशोषण , परिवहन , क्रियाविधि , रसायनिक उपचार तथा खरपतवारों को आकारिकी व बाह्य संरचना पर रसायनों के प्रभाव का विस्तृत अध्ययन एवं शोध कार्य प्रगति पर है ।

इस शोध कार्य में जैव रसायन , भू रसायन , सूक्ष्म जीव विज्ञान , पादप कार्यिकी और सस्य विज्ञान आदि विभागों के वैज्ञानिक कार्यरत हैं ।

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि खरपतवारनाशियों के निरन्तर बढ़ते हुए प्रयोग से पर्यावरण प्रदूषण को भारी खतरा उत्पन्न हो गया है ।

परन्तु आज भी यह खतरा इनसे लाभ की तुलना में नगण्य है तथा इसे कम करने के प्रयास भी निरन्तर जारी है । ।



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