सस्य विज्ञान ( Agronomy in hindi )

सस्य विज्ञान क्या है, परिभाषा, क्षेत्र एवं इसके सिद्धान्तों का अध्ययन


सस्य विज्ञान क्या है इसकी परिभाषा, क्षेत्र एवं इसके सिद्धान्तों का अध्ययन ( Definition of what is the science of science, study of the field and its principles ), Agronomy in hindi
सस्य विज्ञान ( Agronomy in hindi )


सस्य विज्ञान (एग्रोनामी) Agronomy meaning in hindi शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के एग्रोनोमस ( Agronomos ) शब्द से हुई है ।

एग्रोनोमोस शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — एग्रो और नोमोस ; अर्थात् Agronomos = Agr0 + nomoS यहाँ एग्रो ( Agro ) शब्द का अर्थ खेत और नोमोस ( nomos ) शब्द का अर्थ प्रबन्ध से है ।

सस्य विज्ञान (एग्रोनामी) क्या है? (Agronomy in hindi)


सस्य विज्ञान (Agronomy in hindi) सामान्यतः भूमि का उचित प्रबन्ध कर वैज्ञानिक विधि से फसलों को उगाने का अध्ययन सस्य विज्ञान (Agronomy in hindi) कहलाता है ।

"Study of land management and scientific cultivation of crops is called Agronomy. "

सस्य विज्ञान के जनक कोन है?


सस्य विज्ञान (Agronomy in hindi)  के जनक
सस्य विज्ञान के जनक पीटर डी क्रेसेन्जी को कहा गया है।

सस्य विज्ञान (एग्रोनामी) की परिभाषा (Definition of Agronomy in hindi)


“ सस्य विज्ञान (Agronomy in hindi) कृषि की वह शाखा है , जो फसल उत्पादन और मृदा प्रबन्ध के सिद्धान्तों व क्रियाओं से सम्बन्ध रखती है । ”

" Agronomy is that branch of agriculture , which deals with the principles and practice of crop production and field management . "

बाल सी० आर० के अनुसार

“सस्य विज्ञान फसल उगाने की एक ऐसी कला एवं विज्ञान है , जिसके अन्तर्गत भूमि का वैज्ञानिक ढंग से प्रबन्ध कर फसलों को उगाने का प्रयत्न किया जाता है । जिसके फलस्वरूप भूमि , जल व प्रकाश की प्रति इकाई से तथा कम श्रम व खर्च के साथ - साथ भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाये रखकर अधिकतम उत्पादन किया जाता है । ”

" Agronomy is the art and science of field crop culture , which includes the art and science of handling the crop plants and soil material as to produce the highest possible quality and quantity of the desired crop product from each unit of soil , water and light with a minimum immediate of future expenses in labour and soil fertility . "

स्थायी कृषि के सन्दर्भ में सस्य विज्ञान की परिभाषा


“ सस्य विज्ञान (Agronomy in hindi)  फसल एक भूमि का वह विज्ञान है , जिसके अन्तर्गत इच्छित फसलों की गुणवत्ता को बनाये रखते हुये भूमि , जल और प्रकाश की प्रति इकाई के उचित प्रयोग द्वारा अधिकतम उत्पादन प्राप्त किया जाता है । ”

" In terms of Sustainable Agriculture - " Agronomy is the science of handling the crops and the Soil as to produce highest possible quality and quantity of the desired crop product froin each unit of the land water and light with a minimum expense. " 

सस्य विज्ञान कृषि के क्षेत्र में भौतिक ( Physical ) , रसायनिक ( Chemical ) व जैविक ( Biological ) ज्ञान के द्वारा लाभकारी फसल उत्पादन में अपना महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है ।

उन्नत फसल उत्पादन ( Improved Agricultural Production ) और वर्तमान परिवेश में बदलती कृषि तकनीक से फसलों की उत्पादकता बढ़ी है ।

इस प्रकार स्स्य विज्ञान के सिद्धान्तों के अन्तर्गत उगाई जाने वाली फसलें और उनके वातावरण से सम्बन्ध का वैज्ञानिक आधार पर अध्ययन किया जाता है ।

सस्य विज्ञान (एग्रोनामी) के सिद्धांत ( Principles of Agronomy in hindi )


सस्य विज्ञान के सिद्धान्तों का विस्तृत अध्ययन एक सस्य वैज्ञानिक को कम खर्च के द्वारा तथा कम से कम भूमि क्षीणता ( Degradatioir ) के साथ उपयुक्त उत्पादन लेने में सहायक होता है ।

सस्य विज्ञान मूल सिद्धान्तों का अध्ययन 


अधिकतम फसल उत्पादन एवं उचित मुदा प्रबन्ध हेतु अपनाये जाने वाले सस्य विज्ञान (Agronomy in hindi) के मूल सिद्धान्तों का अध्ययन निम्नलिखित शाखाओं के अन्तर्गत किया जाता है -

1 . मौसम विज्ञान ( Meteorology )
2 . भूमि एवं भू - परिष्करण क्रियायें ( Soil and Tillage Fractices )
3 . भूमि एवं जल संरक्षण ( Soil and Water Conservation )
4 . शुष्क कृषि ( Dryland Agriculture )
5 . भूमि उर्वरता व उर्वरक उपयोग ( Soil Fertility and Fertilizers use )
6 . सिंचाई जल प्रबन्ध ( Irrigation Water Management )
7 . खरपतवार प्रबन्ध ( Weekl management )
8 . फसल एवं फसल प्रणाली ( Crops and Cropping Systems )
9 . स्थाई कृषि ( Susatainable Agriculture )
10 . बीज गुणवत्ता एवं बौने का समय ( Seed Quality and Sowing Time )

भारत में  सस्य विज्ञान (एग्रोनामी) का विकास ( Development of Agronomy in India )


सस्य विज्ञान (Agronomy in hindi)  के विकास में भौतिक विज्ञान ( Physics ), रसायन विज्ञान ( Chernistry )  व जीव विज्ञान ( Biology ) आदि

विज्ञान की शाखाओं का महत्वपूर्ण योगदान हैं । इन विषयों से प्राप्त ज्ञान के आधार पर भारत में वैज्ञानिक कृषि का प्रारम्भ कुछ महत्वपूर्ण फल जैसे गन्ना, कपास व तम्बाकू को उगाने के साथ ही हुआ ।

सन् 1870 में कृषि रजस्व एवं वाणिज्य विभाग की स्थापना हुई ।

सन् 1880 में अकाल आयोग की सिफारिश पर फसल उत्पादन को बढ़ाने के लिये अलग से कृषि विभाग की स्थापना की गई ।

सन् 1903 में बिहार राज्य में पूसा नामक स्थान पर इपीरियल एग्रीकल्चर रिसर्च इन्सटीट्यूट व सन् 1912 में गन्ना प्रजनन केन्द्र कोयम्बटूर ( तमिलनाडु ) में स्थापित किया गया ।

तत्पश्चात् देश में बहुत से कृषि अनुसंधान संस्थान और कृषि महाविद्यालय सन् 1929 में प्रारम्भ किये गये ।

सम्पूर्ण देश में कृषि के उत्थान एवं कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिये केन्द्रीय स्तर पर दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ( ICAR ) की स्थापना सन् 1929 में की गई ।

सन् । 1936 में भूकम्प के पश्चात् इम्पीरियल एग्रीकल्चर रिसर्च इन्सटीट्यूट को पूसा से दिल्ली में स्थानान्तरित किया गया ।

सन् 1964 के लगभग कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना भारत के विभिन्न राज्यों में की गई ।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सस्य विज्ञान विषय को सन 1900 में स्वतन्त्र रूप से स्वीकार किया गया ।

संयुक्त राज्य अमेरिका में सन् 1908 में सर्वप्रथम अमेरिकन सोसायटी ऑफ एग्रोनामी की स्थापना हुई ।

इसी क्रम में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ( IARI ) , नई दिल्ली के सस्य विज्ञान विभाग में सन् 1955 में इण्डियन सोसायटी ऑफ एग्रोनामी ( ISA ) की स्थापना का गई ।

सस्य विज्ञान (एग्रोनामी) का क्षेत्र एवं योगदान  (Scope and Contribution of Agronomy)


कृषि उत्पादन ( Agriculture Production in hindi ) को बढ़ाने एवं स्थिरता प्रदान करेन हेतु सस्य विज्ञान ( Agronomy in hindi ) का महत्वपूर्ण योगदान है ।

सस्य विज्ञान के क्षेत्र में किये गये समन्वित प्रयासों से विगत वर्षों में हमारे देश में आई हरित क्रान्ति ( Green Revolution ) के कारण कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई है ।

सन् 1950 - 51 में देश का कृषि उत्पादन लगभग 50 - 8 मिलियन टन था और वर्तमान समय में बढ़कर 221 मिलियन टन के लगभग हो चुका है , जिसके परिणामस्वरूप इस समय हमारे देश से लगभग 25 देशों को अन्न निर्यात ( Export ) किया जा रहा है ।

इसी के साथ - साथ हमारे देश की बढ़ती जनसंख्या ( लगभग 110 करोड़ ) की अन्न आवश्यकता की पूर्ति हेतु कृषि उत्पादन की दर ( Rate ) में निरन्तर वृद्धि नितान्त आवश्यक है । 

इस बढ़ती हुई अन्न की आवश्यकता की पूर्ति के लिये कृ दिन में निरन्तर वृद्धि के अतिरिक्त एक उपाय जुताई के अन्तर्गत क्षेत्रफल ( Area ) बढ़ाकर उत्पादन बढ़ाने का है ।

परन्तु हमारे देश में भूमि सीमित है अतः जुताई के अन्तर्गत क्षेत्रफल को बढ़ाने की सम्भावनायें नगण्य हैं ।

केवल वैज्ञानिक कृषि विधियों ( Scientific Agronomical Practices ) को अपनाने के साथ सघन कृषि ( Intensive Agriculture ) द्वारा ही हम अन्न उत्पादन को भविष्य में बढ़ा सकते हैं ।

भारत मे  सस्य विज्ञान (एग्रोनामी) का विकास ( Development of agronomy in India )


( 1 ) खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता एवं सुरक्षा ( Food Security & Stability ) -


हमारे देश में गत वर्षों में हरित क्रान्ति के फलस्वरूप कृषि उत्पादन 221 मिलियन टन तक पहुँच चुका है ।

देश में अन्न भंडार पूर्ण रूप से भरे हुए हैं और पर्याप्त मात्रा में बहुत से देशों को गेहूं , चावल , चीनी आदि के निर्यात की प्रचुर संभावनायें बढ़ी हैं ।

यह सब वैज्ञानिक पद्धति से सघन कृषि को अपनाकर संभव हुआ है ।

( 2 ) वस्त्रों की प्राप्ति ( Availability of Clothes ) -


अन्न के अतिरिक्त वस्त्र भी हमारी मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है । इसकी पूर्ति के लिये विभिन्न प्रकार की रेशे ( Fiber ) वाली फसलों को उगाया जाता है जैसे कपास

( 3 ) दैनिक उपयोग की वस्तुओं की प्राप्ति ( Availability of Goods for Daily Use ) -


समाज में प्रतिदिन विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता होती है । इनका उत्पादन सस्य विज्ञान के द्वारा ही संभव है जैसे ईधन व तेल ।

( 4 ) रोजगार का साधन ( Source of Employment ) -


सस्य विज्ञान के सिद्धान्तों एवं क्रियाओं को अपनाकर बहुत से लोगों को रोजगार मिलता है ।

फसल की बुवाई से कटाई तक किसानों , कृषि मजदूरों आदि को भरपूर मात्रा में रोजगार का अवसर मिलता है ।

कृषि उत्पादन के आधार पर ही बाजार में पर्याप्त गतिविधियाँ संचालित होती हैं व व्यापारियों को चर्ष भर कृषि विपणन ( Agriculture Marketing in hindi ) के द्वारा आय होती रहती है ।

( 5 ) मृदा उर्वरता में वृद्धि ( Increase in Soil Fertility ) -


यह एक सर्वविदित तथ्य है कि नवीनतम कृषि तकनीक एवं सघन कृषि को अपनाकर भूमि में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है ।

परन्तु सधन कृषि प्रणाली को अपनाने से विभिन्न फसलों के अवशेष जैसे जड़े , पत्तियाँ व पौधे के अन्य भागों के जुताई के समय खेत में मिल जाने से जीवांश पदार्थ की मात्रा में वृद्धि होती है , जिसके फलस्वरूप मृदा ऊर्वरता में वृद्धि व विकास होता है । 

( 6 ) चारे की प्राप्ति ( Availability of Fodder ) -


हमारे देश में पशुओं की पर्याप् संख्या है । वर्तमान समय में मशीनीकरण के युग में भी हमारी खेती पशुओं पर बहुत कुछ निर्भर करती है ।

इसके अतिरिक्त दुधारू पशुओं के लिये भी हमें चारे की व्यवस्था करनी पड़ती है । पशुओं के लिये चारे का होना सघन सस्य क्रियाओं के द्वारा ही संभव है ।

( 7 ) उद्योगों के लिये कच्चा माल ( Raw Materials for Industries ) -


ग्रामीण एवं शहरी स्तर पर चलने वाले विभिन्न उद्योग धन्धों के लिये कच्चे माल की आवश्यकता होती है । यह कच्चा माल विभिन्न कृषि उत्पादों से प्राप्त होता है ।

अत : सभी कृषि उद्योगों ( Agricultural Industries ) का विकास सस्य विज्ञान पर निर्भर करता है ।

( 8 ) कृषकों की आय में वृद्धि ( Increase in Incorne of Farmers ) -


सघन कृषि प्रणाली एवं नवीनतम कृषि तकनीकों को अपनाने से प्रति इकाई क्षेत्रफल में कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई है । कृवि उत्पादन में वृद्धि कृषकों की आय में वृद्धि का सूचक है ।

( 9 ) सामाजिक स्तर पर प्रभाव ( Effect on Social Status ) -


कृषि उत्पादन में हुई वृद्धि से कृषक की आय में पर्याप्त वृद्धि हुई है , जिससे निश्चित रूप से किसान के रहन - सहन का स्तर बढ़ता है , जो उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक होता है ।

( 10 ) भूमि की गुणवत्ता में सुधार ( Improvement in the Quality of Soil ) -


सघन कृषि एवं नवीनतम सस्य क्रियाओं को अपनाने के लिये भूमि में विभिन्न प्रकार की सस्य क्रियाएँ करनी पड़ती हैं ।

इन सस्य क्रियाओं से भूमि में पर्याप्त वायु संचार , भूमि की संरचना एवं रचना में सुधार , भूमि की जल अवशोषण क्षमता में वृद्धि पर्याप्त जल विकास आदि प्रभाव होते हैं , जिससे भूमि की गुणवत्ता में सुधार होता है और भूमि का मूल्य बढ़ता है ।

( 11 ) राष्ट्रीय आय में वृद्धि ( Increase in National Income ) -


नवीनतम सस्य वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर हमारे देश के कृषि उत्पादन में गुणात्मक वृद्धि हुई है , जिससे प्रति इकाई क्षेत्रफल में फसलों की उपज अधिक हुई और किसानों की आय भी बड़ी । उत्पादन में वृद्धि से राष्ट्र की कुल वार्षिक आय में भी वृद्धि हुई है । 

( 12 ) अन्तराष्ट्रीय प्रतिष्ठा में वृद्धि ( Increase in International Prestige ) -


एक सुखद अनुभव है कि इस समय खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता के अतिरिक्त लगभग 25 दे  को भारत से अन निर्यात किया जा रहा है । यह भारतवासियों के लिये गौरव का प्रतीक है, जिमने भारतीया को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा में

सस्य वैज्ञानिकों का भविष्य में  कर्तव्य ( Future duties of Agro scientists )


कृषि विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में कृषि उत्पादन की दृष्टि से सस्य विज्ञान का महत्वपूर्ण स्थान है । हमारे देश की तीव्र जनसंख्या वृद्धि ने कृषि वैज्ञानिकों को कृषि उत्पादन में भी निरन्तर स्थाई तथा अनुपातिक वृद्धि करने के लिये प्रेरित किया है ।

कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिये सस्य विज्ञान की नवीनतम तकनीकों एवं सघन कृषि प्रणाली को अपनाना आवश्यक हैं ।

इसके अतिरिक्त कृषि उत्पादन को जुताई के अन्तर्गत अधिकतम क्षेत्रफल के विस्तार से बढ़ाया जा सकता है , परन्तु हमारे देश में कृषिकृत क्षेत्रफल के विस्तार की संभावनाएँ सीमित हैं ।

अतः कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रति इकाई क्षेत्रफल में उत्पादन को बढ़ाना ही एक मात्र उपाय है ।

गत वर्षों में सस्य विज्ञान अनुसंधान विभिन्न क्षेत्रों जैसे बहफसली प्रणाली , खरपतवारों की रोकथाम ; जल व उर्वरकों का समुचित उपयोग ; नई जातियों से सम्बन्धित कृषि क्रियाओं का अध्ययन , नई फसल प्रणाली जो कि उर्वरकों के आर्थिक दृष्टिकोण एवं उपलब्धता पर आधारित है तथा मृदा नमी संरक्षण विशेषतमा जल समेट प्रबन्ध ( Water Harvesting ) तक रहा है ।

भविष्य में अन्न की आवश्यकता की पूर्ति हेतु सस्य वैज्ञानिकों के द्वारा संरक्षण खेती , मृदा , जल , समय एवं उर्वरकों के प्रयोग द्वारा प्रति इकाई क्षेत्रफल में उत्पादन बढ़ाना , प्रतिकूल मसिम के रहते हुये कृषि उत्पादन में स्थिरता लाना , कम व अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भूमि का समुचित उपयोग , कृष्ण क्रियाओं पर लगने वाली ऊर्जा , उर्वरक एवं जल की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिये ऊर्जा का समचित प्रबन्ध तथा इसी के साथ - साथ कृषि की नवीनतम तकनीकों तथा प्रकाश , आर्द्रता व तापक्रम आदि वातावरणीय कारकों के साथ सामंजस्य कर अध्ययन करना होगा ।

पौधों के प्रारूप ( Model ) सम्बन्धी विभिन्न बिन्दुओं जैसे पौधों का आकार , पौधों पर पत्तियों की संख्या , पत्तियों की प्रकृति व लम्बाई तथा खेत में पौधों की पंक्तियों की दिशा को भी अधिकतम लाभ की दृष्टि से सुनियोजित कर सौर ऊर्जा का दोहन करना होगा ।

किसी क्षेत्र विशेष के लिये अनुसंधान कार्यों की सुविधाओं को जुटाना तथा सस्य विज्ञान से सम्बन्धित अन्य विशेषज्ञों का समय - समय पर सहयोग लेना आदि विषयों पर विशेषतया ध्यान केन्द्रित करना होगा ।

भारत एक कृषि प्रधान देश है? ( India is an agricultural country )


स्वतन्त्रता के पश्चात् से ही भारत में कृषि के क्षेत्र में बहुत उन्नति हुई है, तथा कृषि क्षेत्र ने राष्ट्रीय विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।

हरित - क्रान्ति काल ( Green Revolution Period ) सन् 1965 . 2000 में भारत के कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई तथा कृषि क्षेत्र ने राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद ( GDP ) के विकास में लगभग 3 : 5 % का योगदान देकर राष्ट्रीय विकास को गति प्रदान की ।

आज भी कृषि क्षेत्र राष्ट्र के GDP के विकास को लगभग 4 % का योगदान दे रहा है ।

भारत में सन् 1950 - 51 को कृषि उत्पादन 50 . 8 मिलियन टन से बढ़कर आज लगभग 205 मिलियन टन हो गया है , जिसके फलस्वरूप भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के साथ - साथ विदेशों को अन्न निर्यात भी कर रहा है जिससे विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है ।

आज सम्पूर्ण विश्व की आबादी लगभग 6 अरब है तथा अन्न उत्पादन लगभग 1887 मिलियन टन मात्र है , जबकि विश्व का कुल अन्न उपभोग 1947 मिलियन टन है ।

यह बढ़ता हुआ अन्तर खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ाने के लिये प्रेरित करता है , परन्तु सीमित कृषिकृत क्षेत्र ने उपज वृद्धि के उपायों को फसल सघनता ( Cropping Intensity ) और स्थायित्व ( Sustainability ) जैसे सस्य वैज्ञानिक उपायों के महत्व को परिलक्षित किया है ।

अतः दिया गया कथन उचित ही है कि “ कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है और सस्य विज्ञान इसकी धुरी है। "

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