भारत के जल संसाधन ( Water resources in hindi )

जल संसाधन क्या है (water resources in hindi) एवं भारत में पाये जाने प्रमुख जल संसाधन कोन से है?

जल संसाधन (water resources in hindi) - सभी मनुष्यों, पशु - पक्षी, जीव - जन्तु एवं वनस्पतियों की मूलभूत आवश्यकता जल ही हैं ।

सभी प्राणियों की शारिरिक रचना में 90 प्रतिशत तक जल का अंश पाया जाता है ।


वर्षा के माध्यम से प्रकृति ने भारत को यथोचित जल संसाधन (water resources in hindi) सम्पदा प्रदान की है ।

पृथ्वी तल का लगभग 70 प्रतिशत से अधिक जल भाग से आच्छादित है ।

पृथ्वी तल पर जल द्रव, ठोस एवं गैस तीनों रुपों में पाया जाता है ।


जल संसाधन क्या है? ( Water resources in india )


जल संसाधन (water resources in hindi) अविभाज्य होते है, इसमें वर्षा का जल, नदी जल  सतही तालाब, झीलें, भूमि - जल सभी एक जल प्रणाली के घटक होते हैं ।

"जल प्राणी के जीवन का आधार है ।"

भारत में हिमपात सहित कुल वर्षा के लगभग 4000 बिलियन घन मीटर में सतही एवं प्रयोग करने - योग्य भू जल सहित जल की कुल प्राप्यता लगभग 1869 बिलियन घन मीटर है ।


भारत में जल संसाधन की उपलब्धता एवं जल संसाधन के प्रकार

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भारत के जल संसाधन ( Water resources in hindi )


भारत के जल संसाधन (Water resources of india in hindi)


भारत में वार्षिक वृष्टि का हिमपात सहित अनुमान 40 करोड़ हैक्टेयर मीटर लगाया गया है ।

वाष्पीकरण और अन्य प्रकार के जले की हानि को ध्यान में रखते हुए धरातलीय ( धरातल पर बहने वाले ) जल की शक्यता 18 करोड़ हेक्टेयर मीटर ऑकी गई है ।

स्थलाकृतिक और अन्य बाधाओं के कारण इसमें से केवल 6.8 करोड़ हेक्टेयर मीटर जल को ही संसाधन ( उपयोग करने योग्य ) आँका गया है ।


इसी प्रकार पुनः भरने योग्य भूमिगत जल संसाधन (water resources in hindi) को 6 करोड़ हैक्टेयर मीटर आँका गया है ।

जिसमें से 4.2 करोड़ हेक्टेयर मीटर का ही उपयोग किया जा सकता है ।


इस प्रकार भारत में जल संसाधन (water resources in india) कुल उपयोगी लगभग करोड़ हेक्टेयर मी अनुमानित हैं ।


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भारत में जल संसाधन की उपलब्धता का विवरण


भारत में सतही जल संसाधन को दो निम्न वर्गों में बाँटा गया है -

( 1 ) उत्तरी भारत के जल संसाधन
( 2 ) दक्षिणी भारत के जल संसाधन


भारत में जल संसाधन की उपलब्धता


भारत देश की नदियों में बहने वाले जल की कुल मात्रा का लगभग 62 % (1156 लाख हेक्टेयर मीटर) उत्तरी भारत की नदियों में प्रवाहित होता है और 38 % (703 लाख हेक्टेयर मीटर) दक्षिणी भारत की नदियों में प्रावित होता है ।

वास्तव में भारत की जल सम्पदा (water resources in hindi) का अधिकतम भाग उन क्षेत्रों में है जहाँ वर्षा 125 सेमी से अधिक होती है । 

परन्तु सिंचाई (Irrigation in hindi) के लिये जल को सबसे अधिक आवश्यकता सामान्य से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में होती है ।


भारत में राजस्थान, गुजरात और तमिलनाडु सबसे अधिक जल संसाधन (water resources in hindi) की कमी वाले राज्य है ।

पश्चिमी पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और आन्ध्र प्रदेश ( रायल सीमा ) और कर्नाटक में भी पर्याप्त जल संसाधन (water resources in hindi) नहीं है ।

इसके समाधान के लिये ही अतिरिक्त जल वाले नदी बेसिनों को जल उन नदी बेसिन की ओर ले जाने की योजानयें तैयार की जा रही है, जहाँ जल की कमी है । 


भारत में जल संसाधन के प्रकार


1. भूमिगत जल संसाधनों का वितरण -

उत्तरी तथा तटीय मैदानों में ही भूमिगत जल के पर्याप्त भण्डार पाये जाते हैं ।

देश के अन्य भागों में इसकी आपूर्ति अपर्याप्त है ।

कुछ स्थानों में भूमिगत जल की गहराई 15 मीटर से अधिक है ।

इस प्रकार देश के अधिकांश भागों में कृषि तथा अन्य कार्यों के लिए जल की उपलब्धि अनियमित तथा अपर्याप्त है ।


2. उत्तरी भारत के नदी बेसन जल संसाधन -

सिन्धु बेसिन, गंगा बेसिन और ब्रह्मपुत्र बेसिन उत्तरी भारत के तीन बड़े नदी बेसिन है ।

इन तीनों नदी बेसिनों को इन नदियों को सहायक नदियों के पृथक - पृथक नदी बेसिनों में बाँटा गया है ।

उत्तरी भारत की नदियों को वर्षा के अलावा हिमालय पर्वत का हिम पिघलने से भी गर्मियों में जल प्राप्त होता रहता है । 

अतः ये लगातार बहने वाली नदियाँ हैं और इनमें जल की विपुल राशि बहूती है ।


3. दक्षिणी भारत में सतही जल का बहाव व विकास - 

भारत की नदियों में कुल मटिर उपयोग करने योग्य जल का वार्षिक बहाव होता है ।

दक्षिणी भारत के प्रमुख नदी बेसिन में उपयोग उपयोग करने योग्य वार्षिक जल बहाव की मात्रा की दृष्टि से गोदावरी, कृष्णा और महानदी के बेसिन मर न महत्वपूर्ण हैं ।

दक्षिण भारत के 10 नदी बेसिनों में कार्यशील लगभग 52 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई क्षमता है और 55 सिचाई क्षमता 103 लाख हेक्टेयर होगी ।


इस प्रकार कार्यशील और निर्माणाधीन परियोजनाओं द्वारा लगभग 55 % सिंचाई क्षमता की प्राप्ति हो जायेगी ।

गोदावरी बेसिन में 46 % कृष्णा बेसिन, 70 % कावेर में 76 महानदी बेसिन में 31 यातायात परियोजनाओं की लगभग 52 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई और नर्मदा बेसिन में 78 % उपयोग करने योग्य जल का फसल सिंचाई के लिये प्रयोग हो सकेगा ।


भारत में सिंचाई के जल संसाधन


फसलों की सिंचाई हेतु जिन माध्यमों के द्वारा जल प्राप्त होता है, ये माध्यम सिंचाई के स्त्रोत (Soures of Irrigation in hindi) कहलाते हैं ।


सिंचाई हेतु जल विभिन्न माध्यमों से प्राप्त होता है, जिसका वर्गीकरण निम्न प्रकार है -


( 1 ) धरातलीय स्त्रोत

नहरों के माध्यम से सिंचाई
तालाबों के माध्यम से सिंचाई
नदियों एवं झरनों द्वारा सिंचाई


( 2 ) भूमिगत स्त्रो

कुओं द्वारा सिंचाई
नल / पम्प सेट द्वारा सिंचाई


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भारत में सिंचाई स्रोत के प्रकार


( 1 ) धरातलीय स्त्रोत ( Surface Sources )


नहरों द्वारा सिंचाई -

नहरों द्वारा सिंचाई को देश में बड़े पैमाने पर शुरुआत पिछली शताब्दी से हुई है ।

आज यह देश का एक प्रमुख सिंचाई साधन बन गया है । 

2001 - 02 में देश की कुल सिंचित भूमि 106G:1 लाख हेक्टेयर में से लगभग 4797 लाख हेक्टेयर को नहरों द्वारा सींचा गया ।


नहरों द्वारा सिंचाई के प्रमुख लाभकारी क्षेत्र उत्तरी मैदान और प्रायद्वीपीय भारत में डेल्टा प्रदेश है ।

कुल सिंचित भूमि का हरियाणा में 52 %, पंजाब में 36 %  बिहार व झारखण्ड, में 37 %, उड़ीसा में 47 %, पश्चिमी बंगाल में 38 %, उत्तर प्रदेश एवं उत्तरांचल में 30 %, आन्ध्र प्रदेश में 42 %, कर्नाटक में 40 %, तमिलनाडु में 32 %, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में 36 %, राजस्थान में 33 % और महराष्ट्र में 23 % नहरों द्वारा सींचा गया ।


नहरें प्राय: दो प्रकार की होती हैं -

( i ) मौसमी अथवा बरसाती नहरें इन नहरों में केवल जुलाई से सितम्बर तक पानी रहता है, बाकी समय वर्षा न होने के कारण पानी नहीं रहता ।

( ii ) सतत अथवा नित्यवाही नहरें इन नहरों में पानी का प्रवाह निरन्तर बना रहता है, बारह महीने पानी की व्यवस्था रहती है ।


नहरों द्वारा सिंचाई के लाभ ( Advantages of Irigation through Canal ) -

( i ) नहरों के माध्यम से सिंचाई करना अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है ।

( ii ) नहरों के माध्यम से पानी के साथ मिट्टी एवं कुछ पोषक तत्त्व भी खेतों को मिलते है, जिससे खेतों की उर्वरता बढ़ती है ।

( iii ) फसलों की उपज में अपेक्षाकृत वृद्धि देखी जाती है ।

( iv ) नहरों द्वारा सींचे गये क्षेत्र में अधिक हरियाली बाग - बगीचों में अच्छी पैदावार एवं उपयुक्त जलवायु देखने में आती है ।

( v ) रेतीली भूमियों में नहरों के माध्यम से सिंचाई करने पर वायु मृदा क्षरण में रुकावट आती है ।

( vi ) नहरों के माध्यम से संचार एवं यातायात सुविधाओं का भी विकास होता है ।

( v ) नहरों द्वारा सिंचाई आर्थिक दृष्टि से भी लाभप्रद हैं ।


नहरों द्वारा सिंचाई के दोष ( Demerits of Irrigation through Canal ) -

( i ) कच्ची नहरों के तल से पानी रिसते रहने से जल तल ऊपर उठ जाता है और सारा क्षेत्र जलाक्रांत होकर खेती के लिये बेकार हो जाता है ।

( ii ) नहों वर्षा के जल और हिम पर निर्भर करती हैं । अतः मानसून असफल होने पर नहरों में पानी कम हो जाता है ।

( iii ) भौम जल स्तर धरातल के निकट होने पर कोशिका क्रिया द्वारा मिट्टी की ऊपरी परत में लवणों की ऐसी परत एकत्र हो जाती है, जिसमें अच्छी फसलें नहीं उगाई जा सकती ।

( iv ) खरपतवार एवं जल निकास की समस्या पैदा हो जाती है ।

( v ) जलाक्रांत क्षेत्रों में पीने के पानी पर बुरा प्रभाव पड़ता है जिसके कारण बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है ।

( vi ) तालाबों द्वारा सिंचाई तालाब भारत में प्राचीन काल से ही सिंचाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं ।


तालाबों के माध्यम से सिंचाई


आज भी हमारे देश की कुल सिंचित भूमि को लगभग तालाबों द्वारा सींचा जाता है ।

अब भारत की कुल सिंचित भूमि में तालाबों द्वारा सिंचित भूमि का प्रतिशत भाग लगातार घट रहा है ।

1951 में देश की कुल 299 लाख हेक्टेयर सिंचित भूमि में ताला द्वारा 36 लाख हेक्टेयर (कुले का 17 %) भूमि सींची गई । 


2001 - 02 में कुल 10661 लाख हेक्टेयर भूमि में 181:2 % लाख हेक्टेयर 7 तालाबों द्वारा सींची गयी ।

जल को प्राकृतिक या कृत्रिम जलाशय में संचित करने से तालाब बन जाता है ।

शुक्र ऋतु  लों को तालाबों से छोटी - छोटी नालियों में जल ले जाकर सींचा जाता है ।

आन्ध्र प्रदेश तमिलनाडु की 22 %, महाराष्ट्र की 16, उडीसा की 14.9 %, पश्चिम बंगाल और कनेटिक को 13, भूमि ताला द्वारा सींची जाती है ।


पश्चिमी बंगाल, की 22 %, तमिलनाडु की 220 और कर्नाटक की 15 की 13:8 % उड़ीसा और बिहार में अधिकांश तालाब खोदकर बनाये गये हैं जिनका सिंचाई के साथ - साथ मछली पालन के लिये भी उपयोग किया जाता है ।

तालाबों के माध्यम से की जाने वाली सिंचाई (Irrigation in hindi) सस्ती पड़ती है ।

छोटी जोत वाले कृषकों के लिए लाभदायक होती है इसलिए इसका प्रचलन बना हुआ है ।


तालाबों द्वारा सिंचाई के दोष -

( 1 ) तालाब के निर्माण में अधिक कृषि क्षेत्र घेरना पड़ता है ।

( 2 ) तालाबों से दूरस्थ खेतों में पानी पहुँचाने में असुविधा होती है । साथ ही समय, धन, श्रम का अपव्यय होता है ।

( 3 ) तालाबों में प्रतिवर्ष मिट्टी जम जाने के कारण तालाब उथले हो जाते हैं, तालावों की सफाई कराने में अधिक खर्चा करना पड़ता है ।

( 4 ) तालाबों का पानी वर्षा पर निर्भर होता है, वर्षा न होने पर सिंचाई असुविधा का सामना करना पड़ता है ।


नदियों एवं झरनों द्वारा सिंचाई


नदियों एवं झरनों द्वारा सिंचाई बड़ी - बड़ी नदियों से सीधे अथवा नहर बनाकर सिंचाई की जाती है ।

नदियों के किनारे पर वैकली, रहट आदि लगाकर भी खेतों की सिंचाई होती है ।

पहाड़ी क्षेत्रों में झरनों से सिंचाई व्यवस्था की जाती है पहाड़ों पर खेत सीढी के आकार के होते हैं ।

अत: झरनें के माध्यम से अच्छी सिंचाई होती हैं ।


( 2 ) भूमिगत जल स्त्रोत ( Under ground Water Sources )


कुएँ द्वारा सिंचाई

भारत में प्राचीनकाल से ही कुएँ सिंचाई का प्रमुख साधन रहे हैं ।

वर्षा के जल का लगभग 40 प्रतिशत भाग भूमि द्वारा सोख लिया जाता है ।

यह धरातल में निम्न स्तर पर पहुँच जाता है ।

देश में लगभग 38 प्रतिशत सिंचाई कुओं के पानी से की जाती है ।


देश में लगभग 85 लाख खुदाई के कुएँ हैं ।

इनके द्वारा सिंचाई भूमि कुल सिचित भूमि का 20.9 % है ।

इनके द्वारा कुल 102 लाख हैक्टेयर सिंचित भूमि का 22 % राजस्थान में, 18 % मध्य प्रदेश में, 13 % गुजरात में, 11:5 % महाराष्ट्र में, 10:4 % आन्ध्र प्रदेश में और 9 - 7, तमिलनाडु में सींचा जाता है ।


कुओं द्वारा सिंचाई से लाभ -

( i ) कओं द्वारा सिंचाई से जल का उपयोग आवश्यकतानुसार मितव्ययता पूर्ण ढंग से । किया जाता है ।

( ii ) यह विधि सरल एवं सस्ती है ।

( iii ) कुओं द्वारा सिंचाई से भूमि में अनावश्यक जल नहीं भरता ।


कुओं द्वारा सिंचाई से हानियाँ -

( i ) कुओं द्वारा सिंचाई से समय, श्रम एवं पूँजी का अपव्यय होता है ।

( ii ) कुओं के माध्यम से एक सीमित क्षेत्र पर ही सिंचाई सम्भव है ।

( iii ) कुओं के निर्माण में खर्चा अधिक होता है ।

( iv ) कुछ कुओं का जल लवणीय होने के कारण भूमि ऊसर बन जाती है ।


नलकूप / पम्प सैटो द्वारा सिंचाई ( Irrigation through Tubewell & Pump set )


वर्तमान में विद्युत और डीजल के निरन्तर बढ़ते हुए उपयोग के कारण देश में नलकूपों एवं पम्पसैटों की संख्या तीव्र गति से बढ़ रही है । 

देश में पम्पसैट्स / नलकूपों की संख्या लगभग 1 करोड़ 73 लाख है ।

राज्यानुसार इनकी संख्या महाराष्ट्र में लगभग 17 - 8 लाख, तमिलनाडु में 14.2 लाख, आन्ध्र प्रदेश में 14 लाख, मध्य प्रदेश में 10 लाख, कर्नाटक में 8.85 लाख, उत्तर प्रदेश में 4 लाख, पंजाब में 6.5 लाख, गुजरात में 5.2 लाख, राजस्थान में 4.45 लाख, हरियाणा में 4 लाख, बिहार में 2 - 6 लाख और केरल में 2.7 लाख थी ।


उत्तर प्रदेश में 62 %, पंजाब में 61 %, हरियाणा में 47 %, बिहार में 41 %, पश्चिमी बंगाल में 36 % और गुजरात में 22 % भूमि नलकूपों / पम्पसैटों द्वारा सींची जाती है ।

देश में नलकूपों द्वारा कुल 142 लाख हेक्टेयर सिंचित भूमि का 88 % भाग उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में था ।

उत्तर प्रदेश राज्य में नलकूपों की संख्या सर्वाधिक है ।


( 3 ) अन्य साधन ( Other Sources )


उपरोक्त जल संसाधन (water resources in hindi) के अतिरिक्त पाताल तोड़ कुआं एवं हस्त चलित नलो से भी सिंचाई की जाती है ।

रिसाव सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन इन हिंदी), लिफ्ट सिंचाई, छिड़काव सिंचाई आदि ।

भारत में अनेक माध्यमों से सिंचाई की जाती है

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