पौधों में जल महत्व - फसलोत्पादन क्रिया के अन्तर्गत पौधों में जल की आवश्यकता अनिवार्य है ।

पौधे की विभिन्न वृद्धि अवस्थाओं में जल का महत्व विशेष होता है ।

जल की कमी से पौधों की वृद्धि एवं पैदावार काफी प्रभावित होती है ।


पौधों के जीवन में जल का क्या महत्व है?

पौधों के जीवन में जल का क्या महत्व है एवं पौधों में जल का परिवहन कैसे होता है, पौधों को जल क्यों आवश्यक है समझाइए, पौधों में जल के कार्य, पौधों में जल की उपलब्धता
पौधों के जीवन में जल का महत्व है

पौधे के विभिन्न अंगों में पानी की मात्रा निम्न प्रकार पाई जाती है -

( i ) पौधे के अंग पानी की प्रतिशत मात्रा पौधे का अग्र भाग 90 से 93 प्रतिशत

( ii ) तना एवं पत्तियों में 70 से 90 प्रतिशत

( iii ) काष्ठीय भाग में 50 से 60 प्रतिशत

( iv ) कटाई के समय दाने में 15 से 20 प्रतिशत


पौधों को जल क्यों आवश्यक है समझाइए?


कोशिकाओं एवं ऊतकों के विकास के लिए पौधों में जल आवश्यक होता है ।

जल की कमी से पौधे मुरझा जाते हैं ।

अत्यधिक जल की कमी से पौधे सूखकर मर जाते है ।

अतः पौधों के लिए जल नितान्त आवश्यक है ।

अधिकांश शाकीय पौधों के शरीर में 80 से 90 प्रतिशत भाग जल का होता है, पौधे के जीवन की समस्त क्रियायें जल द्वारा संचालित होती है ।


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पौधों में जल का परिवहन कैसे होता है :- पौधों में जल के कार्य


पौधे में जल का परिवहन निम्न प्रकार से होता है, जो पौधों के जीवन में निम्न रूप में कार्य करता है -


1. जीव द्रव्य ( प्रोटोप्लाज्म ) के भाग के रूप में

जल पौधों की कोशिकाओं में पाये जाने वाले जीव द्रव्य ( प्रोटोप्लाज्म ) का एक आवश्यक अंग है । पादप कोशिका के जीव द्रव्य में जल की पर्याप्त मात्रा होने पर कोशिका और संरचना ठीक प्रकार से विकसित होती है तथा सम्बन्धित उपायचयी क्रियायें समान हो पाती है ।


2. अभिकारक के रुप में

जल के माध्यम से अधिकांश उपापचयी क्रियायें सम्पन्न होती है, जैसे -


( अ ) पौधे के लिए आवश्यक प्रकाश -

संश्लेषण की क्रिया में कार्बन डाईआक्साइड की । तरह जल भी एक अभिकर्मक ( Reagent ) की तरह प्रयुक्त होता है ।

( ब ) पौधों द्वारा श्वसन ( Respriration ) -

पौधों द्वारा श्वसन में कार्बन डाई आक्साइड के साथ - साथ जल का उत्पादन होता है ।


3. बहुलीकरण और जल अपघटन

बहुलकों के एकलकों के रुप में भंजन को क्रिया जल की क्रिया पर निर्भर करती है जल की यह क्रिया बहुलकों में बंधों ( bonds ) पर जल अपघटनीय एंजाइमों द्वारा उत्प्रेरित होती है ।


4. आयनन ( Ionization )

आयनन हेतु एक माध्यम के रुप में जल एक अनिवार्य तत्त्व होता है 


5. विलायक ( Solvent )

के रूप में एक विलायक के रुप में जल के कार्य से बहुत से लवण पदार्थ तथा गैसें पौधों के भीतर एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक या एक पादप भाग से दूसरे पादप भाग तक पोषक तत्त्वों तथा अन्य घुलनशील पदार्थों को संचालित करने के लिए जल की आवश्यकता होती है ।


6. पादप स्फीति ( Turgidity )

को बनाये रखने में जल का कार्य पौधों का विकास तभी सम्भव है, जब उनकी स्फीति उचित हो । जल द्वारा कोशिकाओं में स्फीति होती है । तभी पर्णरंघ खुलते हैं फूलों का खिलना एवं बन्द होना पौधों की स्फीति पर निर्भर करता है ।


पौधों में जल की उपलब्धता एवं पोषक तत्त्व ग्राह्यता ( Water Availability and Nutrient Uptake )


पौधों के वृद्धि एवं विकास को विभिन्न घटक प्रभावित करते हैं जैसे भूमि, वातावरण आदि ।

विभिन्न घटकों में पोषक तत्त्वों की उपलब्धता भी एक प्रमुख कारक है जो पौधों की वृद्धि को प्रभावित करती है ।

पोषक तत्त्वों की उपलब्धता मुख्य रुप से जल पर आधारित होती है ।


जल की कमी होने पर पौधे की जड़ एवं तने दोनों की वृद्धि प्रभावित होती है ।

तने की वृद्धि जड़ की अपेक्षा कम होती है जिसके कारण जड़ तना अनुपात कम हो जाता है ।

प्रायः जड़ों की सबसे अधिक वृद्धि नम भूमि में होती है, शुष्क भूमि में पौधे की जड़ की वृद्धि नहीं हो पाती जिससे पोषक तत्त्वों ( Nutrients ) का अवशोषण पौधों में ठीक प्रकार नहीं हो पाता ।


मृदा कोलइड पर अधि चूषित न होने वाले पोषक तत्त्व जैसे नाइट्रेट एवं क्लोराइड आदि मृदा के घोल में उपस्थित रहते हैं तथा मृदा जल में संचरित होते रहते हैं ।

जल में घुले रहने के कारण ये पौधों द्वारा शोषित कर लिये जाते हैं ।

इस प्रकार से मृदा नमी पोषक तत्त्वों के शोषण में सहायक होती है ।


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जल एवं पौधों का सम्बन्ध ( Water and plant relationship )


जल की कमी होने पर पौधे की वृद्धि एवं पैदावार पर निम्न प्रभाव होते हैं -


( i ) पौधों की बनावट पर प्रभाव -

पानी की कमी से पादप वृद्धि के दौरान पौधों का आकार कम हो जाता है । पादप वृद्धि पूरी तरह नहीं हो पाती ।


( ii ) कोशिकाओं पर प्रभाव -

पानी की कमी से आर० एन० ए०, डी० एन० ए, और कोशिका भित्ति के पदार्थ का निर्माण कम हो जाता है ।


( iii ) जीवद्रव्य पर प्रभाव -

पौधे के जीव द्रव्य में जल की कमी से पारगम्यता, जल योजन, विस्कासिता और सम्बन्धित एन्जाइमी क्रियाओं में काफी परिवर्तन आ जाता है ।


( iv ) प्रकाश संशलेषण वाष्पोत्सर्जन और श्वसन पर प्रभाव -

बल के अभाव में पौधे की पत्तियों का क्षेत्रफल कम हो जाता है, पर्णरघु बन्द हो जाते हैं, प्रकाश संश्लेषण कम हो जाता है ।


( v ) पोषक तत्वों के अवशोषण पर प्रभाव -

पौधों में जल की कमी से पोषक तत्वों का अवशोषण कम हो जाता है ।


( vi ) प्रोटीन एवं नाइट्रोजन उपापचय पर प्रभाव - 

जल की कमी से पौधृ की वृद्धि रुक जाती है साथ ही प्रोटीन की रचना भी कम हो जाती है ।


( vii ) कावोहाइडेट उपापचय पर प्रभाव -

जल की कमी से पौधे में स्टार्च की कमी हो जाती है और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बढ़ जाती है ।


( viii ) फसलों की पैदावार पर प्रभाव -

जल की कमी से खाद्यान्न फसलों की पैदावार में कमी आती है दाने ठीक प्रकार नहीं बन पाते ।


पौधों में जल की स्थिति

पौधे में जल की स्थिति का निर्धारण करने हेतु दो प्रकार के मापदण्ड निर्धारित किये गये हैं ।


पौधों के विभिन्न में पानी की मात्रा का मापन किया जाता है -

( 1 ) सापेक्ष जेल अंश ( Relative Water Content अथवा  RWC )

( 2 ) वास्तविक जल अंश ( Actual Water Content अथवा AWC )


1. सापेक्ष जल अंश ( Relative Water Content ) -

पौधों में पूर्ण स्फीति अवस्था पर पाई जाने वाली जल की मात्रा एवं विद्यमान जल की मात्रा को सापेक्ष जल अंश द्वारा प्रतिशत के रुप में निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है ।

सापेक्ष प्रतिशत जल का अंश ( RwC ) = TwPw x 100 यहाँ Fw = ताजे पौधे का भार ।


D७ = पौधे के ताजे भार में से शुष्क भार घटाने पर शेष जल अंश Tw = पूर्ण स्फीति अवस्था पर पौधे के भार में से शुष्क भार घटाने पर शेष जल अंश ।

संतृप्ता पर जल अंश प्रतिशत ( Water Content at Saturation ) साप 11 T { NT ! T - Dw | Tw - Fw = x 100 Tw - Dw वास्तविक जल अंश ( Actual Water Content ) = Fw Dwx 100 पौधे में संतृप्त जल अंश ज्ञात करने के लिए पौधे के ऊतकों के शक भार के अन्तर को कम करने के लिए इसे मन्द प्रकाश में रखते हैं ।


ठीक इसी प्रकार से शुष्क भार प्राप्त करने के लिए पौधों को 60 डिग्री सेन्टीग्रेड से 80 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम अथवा 35 डिग्री सेन्टीग्रेड पर खाली रखा जाता है ।

पौधे की पत्ती, छत्रप, वायु तापक्रम, विसारी प्रवाह, प्रतिरोध एवं वेदन दर मापने के लिए कई विधियाँ प्रयुक्त की जाती हैं ।

सामान्यतः पूर्ण नमी में उगे जैसे की अपेक्षा कम नमी में उगे पौधों की पत्तियों का तापक्रम अधिक पाया जाता है ।


मृदा की विभिन्न अवस्थाओं में पौधों की जड़ों का विकास -

मृदा में फसलों की जड़ों द्वारा मृदाजल के अवशोषण के साथ मृदा जल तनाव जाता है ।

जिसके कारण जल का संचालन कम तनाव वाले क्षेत्र से अधिक तनाव वाले और बढता जाता है ।

इस प्रकार से जड़ क्षेत्र में मृदा की नमी में कमी आ जाती है ।


यह कमी कोशिका के चढ़ाव के द्वारा पूरी होती रहती है ।

मृदा नमी के अभव बढ़ता जाता है, जिसके कारण क्षेत्र की और बढ़ता जाता है ।

यह कमी कोशिका चढ़ाव के में जडों का विकास रुक जाता है ।

ऐसी अवस्था में यदि जल की पूर्ति नहीं होती है तो पौधे सूख जाते हैं ।


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पौधों की जल शोषण प्रणाली ( Moisture Pattern of Plants )


प्रायः पौधों की जड़ों की अधिक संख्या ऊपरी भाग में पौधे के आधार के आस पास होती है ।

जो अधिक माग में जल को सोखती हैं मृदा के इस भाग में वायु संचार, तापक्रम अनुकूल होने के कारण जल शोषण तेजी से होता है ।

मृदा के ऊपरी भाग से जल का वाष्पीकरण भी तीव्र गति से होता है ।

जिसके कारण मृदा के ऊपरी भाग में ( कुछ गहराई तक ) जल की कमी हो जाती है ।

कम होने के कारण मृदा - नमी तनाव बढ़ता है जिसके कारण पौधे मृदा के दूसरे नमी वाले भाग से जल ग्रहण करते हैं ।


मृदा - नमी सम्बन्धी अध्ययनों के आधार पर पाया गया है कि पौधे सामान्य भूमियों में मृदा नमी का लगभग 40 प्रतिशत भाग भूमि के ऊपरी चौथाई ( 174 ) भाग से ग्रहण करते हैं ।

30 प्रतिशत दूसरा 1 / 4 भाग से 20 % तीसरे 1 / 4 भाग से एवं 10 % अन्तिम 1 / 4 भाग से ( अर्थात् सबसे नीचे वाले भाग ) से ग्रहण करता है ।


मृदा में प्राप्त जल के ह्रास एवं पौधों की वृद्धि ( Plant Growth ) के सम्बन्ध में वैज्ञानिक एक मत नहीं है ।

वेहिमियर एवं हिन्डिक्सन का मानना है कि भूमि में उपलब्ध जल की कमी आने के अनुसार पौधों की वृद्धि प्रभावित नहीं होती ।


जल पौधों को क्षेत्र - धारिता ( Field Capacity ) एवं म्लान बिन्दु ( Wilting point ) के बीच में समान रूप से उपलब्ध होता है ।

इस प्रकार से म्लान बिन्दु से कम पानी उपलब्ध होने पर पौधों की वृद्धि रुक जाती है ।

रिचर्ड एवं वाडले का मत है कि क्षेत्र - धारिता ( Field Capacity ) में ज्यों - ज्यों जल की कमी होती है त्यों - त्यों पौधों की वृद्धि भी प्रभावित होती है ।

इनके अनुसार म्लान बिन्दु पर पहुँचने के पूर्व ही प्राप्य जल कम हो जाने के कारण पौधों का विकास रुक जाता है ।


नमी की संवेदनशील अवस्था ( Moisture Sensitive Stage )


विभिन्न फसलों की नमी संवेदनशील अवस्थायें -

पौधों की वृद्धि के दौरान विभिन्न वृद्धि अवस्थाओं के साथ - साथ जमी के आवश्यकता में अन्तर आता है ।

कुछ अवस्थायें पौधे की वृद्धि एवं विकास के लिए संवेदन होती हैं इन्हीं अवस्थाओं को नमी की संवेदनशील अवस्था कहते हैं ।

इस स्थाओं में पौधों को कम पानी मिलने के कारण पौधों की वृद्धि एवं विकास ठीक प्रकार में हो पाता कारणवश उपज में कमी आ जाती है ।

इस प्रकार आई उत्पादन गिरावट की क्षतिपूर्ति करना कठिन हो जाता है ।


उदाहरणार्थ यदि पौधे में किल्ले फुटते समय पौधे को पानी न मिले तो पानी की कमी से किल्ले कम निकलेंगे कारणवश बालियों की संख्या भी कम होगी ।

ठीक इसी प्रकार अगर बालियों के निकलते समय पानी का अभाव होगा तो बालियों के निकलते समय पानी का अभाव में दाने पतले एवं सिकुड़े होगे इनका भार भी कम होगा इस सब का प्रभाव उत्पादन पर पड़ेगा ।

बाद में किसी क्रिया द्वारा इसका समाधान नहीं हो सकेगा ।


अतः कृषक को विभिन्न फसलों के लिए नमी की संवेदनशील अवस्थाओं की जानकारी नितान्त आवश्यक है ।

नमी की संवेदनशील अवस्थाओं में विभिन्नता पाई जाती है ।

विभिन्न फसल में ये अवस्थायें अलग - अलग समय पर देखने में आती हैं ।

अतः इनका ज्ञान अति आवश्यक है ।


फसलों की नमी संवेदनशील अवस्थायें


विभिन्न फसलों की नमी संवेदनशील अथवा क्रांतिक अवस्थायें -

फसल नमी संवेदनशील अवस्थाएँ तने की पूर्ण वृद्धि एवम् बाली निकलने की अवस्था ज्वार बाली निकलने, पुष्पावस्था, दुधिया, एवम् दाना पुष्ट होने की अवस्था बाली बनना प्रारम्भ होने, बाली निकलने एवम् पुष्पावस्था शीर्ष जड़ निकलने, तना बढ़ने एवम् बाली निकलने की अवस्था मक्का नर पुष्प निकलने, मादा पुष्प निकलने तथा दाना बनने की अवस्था बाजरा बालियाँ निकलने एवम् पुष्पावस्था सोयाबीन पुष्पावस्था से दानों की परिपक्वता तक पुष्पावस्था से दानों की परिपक्वता तक पुष्पावस्था, अधिकीलन एवम् फली विकास की प्रारम्भिक अवस्था पुष्पकलिका बनना, शीर्षक बनाना, पुष्पावस्था एवम् दानों की दुधिया अवस्था ।


पुष्पकलिका निर्माण से पुष्पावस्था तक पुष्पावस्था से गूलर विकास तक कपास वृद्धि की सभी अवस्थाएँ विशेषकर किल्ले निकलने की अवस्था गन्ना कन्द बनना प्रारम्भ होने से कन्द परिपक्वता तक आलू समस्त वृद्धि काल  है ।

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