जल निकास किसे कहते है, यह क्यों आवश्यक है एवं इसकी विधियां लिखिए?

फसलों से अधिक उपज की प्राप्ति के लिए भूमि से अतिरिक्त जल का निकास करना अत्यन्त आवश्यक है ।

अत: अतिरिक्त जल को कृत्रिम रूप से बाहर निकालने क्रिया को जल निकास (drainge in hindi) कहा जाता है ।


ऐसा करने से पौधों की जड़ों का विकास होने लगता है तथा भूमि में वायु संचार बढ़ जाता है ।

जल निकास (drainage in hindi) पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ने लगती है, और पौधों का विकास तेजी से होता है तथा उत्पादन अधिक होने में सहायता मिलती है ।


जल निकास किसे कहते है? Drainage in hindi


“पौधों के जड़ क्षेत्र में वायु संचार एवं भूमि का अनुकूल वातावरण बनाने के लिए भूमि की ऊपरी परत से अतिरिक्त जल को क्षेत्र से बाहर कृत्रिम रूप से निकालने की क्रिया को जल निकास (Drainage in hindi) कहते हैं।"


" To drain out the excess water from the upper surface of the soil , to improve the aeration in the root zone of the plants and te make a favourable soil environment is called 'Drainage' "


जल निकास से आप क्या समझते है?


इस क्रिया में केशिका जल को छोड़कर स्वतन्त्र एवं गुरुत्वीय जल को बाहर निकाला जाता है ।

जल निकास (drainge in hindi) किसे कहते है, यह क्यों आवश्यक है एवं इसकी विधियां लिखिए?
जल निकास (drainge in hindi)


सामान्यतः वर्षा एवं सिंचाई के साधनों के माध्यम से भूमि पर एकत्रित फालतू पानी को निकालने की प्रक्रिया को जल निकास (Drainage in hindi) कहते हैं ।


खराब जल - निकास के कारण भूमि में हानिकारक लवणों का संग्रह, जल स्तर ऊँचा होना आदि समस्यायें पैदा हो जाती हैं ।


जल निकास की परिभाषा ( Drainage in hindi )


जल निकास (Drainage in hindi) फसलों की अनुकूल वृद्धि एवं विकास के लिये भूमि में उचित लवण एवं सन्तुलन बनाये रखने के लिये अतिरिक्त पानी को निकालने सम्बन्धी प्रक्रिया है ।”


Drainage is the removal of excess water to ensure a fevaourable salt balance in the soil and water table elevation optimum for crop growth and development. "


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जल निकास क्यों आवश्यक है? drainage requirements in hindi


जल निकास की आवश्यकता -

( 1 ) कुछ विशेष क्षेत्रों में भूमि की अधोसतह में कठोर तह ( Hard layer of soil ) पाई जाती है । इस कठोर तह के कारण पानी भूमि में नीचे की ओर नहीं जा पाता । अतिरिक्त जमा पानी को निकालने के लिये जल निकास आवश्यक हो जाता है ।

( 2 ) मटियार भमियों में पानी सोखने की प्रक्रिया काफी धीमी होती है । अतः इन भूमियों में जल निकास आवश्यक होता है । 

( 3 ) विस्त भमिर्यों में हानिकारक लवण जो भूमि की ऊपरी सतह पर पाये जात उन्हें सतह से करने के लिये भी जल निकास की आवश्यकता होती है ।

( 4 ) जिन स्थानो पर भूमि का जल स्तर काफी ऊंचा होता है वहाँ पर जल निकास की आवश्यकता होती है ।

(5) ऐसे खेतों में जो नहरों, नदियों, नालों के समीप होते हैं वहाँ निस्पंदन ( Seepage ) क्रिया द्वारा जल एकत्रित हो जाता है ऐसे स्थानों पर जल निकास आवश्यक होता है ।

( 6 ) कुछ फसलें अधिक समय तक पानी में खड़ी नहीं रह पाती ऐसे स्थानों पर भी जल निकास की आवश्यकता होती है ।

( 7 ) ऐसी भूमियाँ जो निचले स्थानों पर होती है में पानी भर जाता है इन भूमियों में जल निकास की आवश्यकता होती है ।


जल निकास का क्या महत्व है? Importance of Drainage in hindi


भूमि से अतिरिक्त जल को कृत्रिम रूप से बाहर निकालने की क्रिया से पौधों, भूमि तथा समाज को विभिन्न प्रकार से लाभ पहुँचता है ।


जल निकास का महत्व importance of drainage in hindi

1. जल निकास से सिंचाई द्वारा दिये गये अतिरिक्त पानी को भूमि से निकालकर बाहर किया जा सकता है । इस प्रक्रिया से वर्षा के अतिरिक्त जल को भी भूमि की सतह से हटाया जा सकता है ।

2. जल निकास के फलस्वरूप पौधों की जड़ों का विकास तेजी से होने लगता है । जडे, भूमि सतह में फैल जाती हैं और गहराई तक चली जाती हैं । इससे पौधों का जड़ क्षेत्र बढ़ जाता हैं । जड़ क्षेत्र बढ़ने पर पौधों द्वारा अधिक मात्रा में पोषक तत्वों को ग्रहण किया जाता है ।

3. जल निकास से भूमि में पर्याप्त वायु संचार होता है । पौधों की जड़ों में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध होने लगती है । अतिरिक्त जल के हटाने से पौधों की जड़ों में उपस्थित कार्बन डाई ऑक्साइड व अन्य हानिकारक गैसें पौधों के जड़ क्षेत्र से बाहर आ जाती हैं ।

4. पौधों में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है ।

5. जल निकास से भूमि की ऊपरी सतह एवं भूमिगत सतहों में बढ़ते हुए लवणों की मात्रा को कम किया जा सकता है ।

6. अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त जल जमा रहने के कारण विभिन्न प्रकार के हानिकारक खरपतवार उगने लगते हैं । इनको नष्ट करने में सहायता मिलती है ।

7. भूमि में जुताई एवं अन्य कृषण क्रियाएँ आवश्यकता के अनुसार समय पर की जा सकती हैं ।

8. भूमि की जल को सोखने व धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है ।

9. भूमि की संरचना में सुधार होता है तथा भूमि में सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रियाशीलता बढ़ जाती है ।

10. अतिरिक्त जल से किसी भी क्षेत्र में पनपने वाली विभिन्न बीमारियों को जल निकास द्वारा कम करने में सहायता मिलती है ।

11. फसलों की उपज बढ़ती है जो राष्ट्रीय सम्पन्नता एवं स्थाई कृषि विकास की सूचक है ।


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जल निकास की कोन-कोन सी विधियाँ है, वर्णन कीजिए?


खेत में पानी की मात्रा खेत की स्थिति तथा अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुये जल निकास के लिये निम्नलिखित विधियाँ प्रयोग में लाई जाती है ।


जल निकास (drainge in hindi) किसे कहते है यह क्यों आवश्यक है इसकी विधियां लिखिए?
जल निकास की विधियां (Methods of drainge in hindi)


जल निकास की विधियां methods of Drainage in hindi


1. प्राकृतिक विधि ( Natural method ) 

इस विधि में अतिरिक्त पानी स्वतः ढाल की दिशा में बर्हता जाता है, अन्त में यह स्थायी स्रोत है ।


जैसे — नहर, नाले, तालाब इत्यादि में पहुंच जाता है ।

( अ ) कृतिक प्रणाली
( ब ) रंग सन प्रणबी
( स ) रौडिन प्रणाली चित्र जल निकास में नालियों की प्रणालियों


2. हैरिग बोन विधि ( Harring bone method ) 

इस विधि में खेत के बीच में एक मुख्य नाली होती है । इस मुख्य नाली में अन्य सहायक नालियाँ आकर मिलती है । खेत से बाहर अतिरिकत जल मुख्य नाली से ही निकलता है ।


3. गिरोड्रोिन विधि ( Giriuliron method ) 

इस विधि के अन्तर्गत खेत के एक किनारे पर मुख्य नाली होती है । इस मुख्य नाली में पूरे खेत में आकर सहायक नालियां मिल भी है और इस प्रकार फालतू पानी बाहर निकल जाता है ।


जल निकास के लिए प्रयोग की जाने वाली प्रमुख विधियां -

( अ ) पृष्ठीय जल निकास ( Surface drainage Surface drainage )
( ब ) भूमिगत या अधोपृष्ठीय जल निकास ( Sub Surface drainage )


( अ ) पृष्ठीय जल निकास ( Surface drainage in hindi ) -


इस विधि में क्षेत्रीय नालियों (Drains) का प्रयोग किया जाता है ।

ये नालियां खुली न होकर अतिरिक्त एकत्रित जल सुरक्षित तरीके से निकल जाता है ।

व्यक्तिगत पर इन नालियों का आकार छोटा रखा जाता है जबकि बड़े फाम पर नालियों अषक एवं आकार भी बड़ा होता है ।


नालियाँ (Drains meaning in hindi) बनाते समय मृदा की किस्म मृदा एवं वर्षा की मात्रा का ध्यान रखना चाहिये, हल्की भूमियों में सस्ती विधि है ।

इस विधि या छोटे फार्मों पर इन नालि की संख्या अधिक एवं आकार में धरातल का पावं ढाल एवं व कम गहरी नालियां बनाई जाती हैं ताकि कटाव न हो सके जबकि अधिक वे थानों पर अपेक्षाकृत बड़ी नालियों की आवश्यकता होती है ।


खुली नालियों में हर व सफाई करनी पड़ती है तथा इनमें प्रयुक्त क्षेत्र फसलोत्पादन के काम में नहीं लाया जा सकता है।

इनमें उसे खरपतवारों के बीज दूसरी जगह पहुँचकर हानि पहुँचाते हैं प्रायः इस विधि में तीन प्रकार की नालियों बनाते हैं।


जल निकास की नालियाँ ( Drains in hindi )


1. स्थाई नालियों ( Permanent drains )
2. अस्थायी नालियाँ ( Temporary drains )
3. कट आउट नालियाँ ( Cut - out drains )


( ब ) पृष्ठीय जल निकास की पद्धतियाँ ( Systems of Surface Drainage in hindi )

पछीय जल निकास हेतु किसी पद्धति का चयन भू - आकृति एवं फसल के स्वभाव पर निर्भर करता है, पृष्ठीय जल निकास की निम्नलिखित पद्धतियाँ प्रचलित हैं ।


यादृद्धिक क्षेत्र खाई ( Random field ditches )

( i ) भूमि को सपाट बनाना ( Land Smoolling )
( ii ) क्यारी निर्माण ( Bedding ) 
( iv ) ढाल के विपरीत खाई खोदना ( Cross Slope System ) 
( v ) समानान्तर क्षेत्र खाई ( Parallel field ditches )


यादृद्धिक क्षेत्र खाई ( Random field ditches ) -

इस प्रकार की नालियां उथली बनाते । हैं तथा इन्हें खेत के नीचे के स्थान या गड्ढे से प्रारम्भ करके इनको प्राकृतिक जल प्रवाह मार्ग से जोड़ दिया जाता है अथवा पानी को प्रक्षेत्र में कहीं दूसरे स्थान पर फैला दिया जाता है।

यह विधि ऊँची - नीची भूमियों से पानी निकालने के लिये उपयुक्त है, भूमि को सपाट बनाना


Land Smoothing - 

इस विधि में ऊँचे स्थान से मिट्टी काटकर नीचे के स्थानों में भर दी जाती है इस प्रकार के खेत का ढाल समान बनाया जाता है ।


ऐसे खेतों के नीचे वाले सिरे पर पानी को एकत्रित करके बहाने के लिये खेत में खाइयाँ ( ditches ) खोद दी जाती है इनका सम्बन्ध प्राकृतिक जल निकास मार्ग से कर दिया जाता है । यह ऊँची - नीची भूमियों के लिये उपयुक्त है ।


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जल निकास की क्यारी बनाना ( Bedding meaning in hindi )


इस विधि का प्रयोग कम ढलुवाँ एवं चपटी भूमियों से जल निकासी के लिये किया जाता है ।

इस विधि में खेत में ऊँचाई से शुरू करके नीचे की तरफ ढाल के समानान्तर पर्याप्त चौड़ाई की कॅड निकाल देते हैं ।

दो कैंडों के बीच काफी जगह छोड़ देते हैं इसे इस प्रकार बनाते हैं ताकि अतिरिक्त पानी आसानी से कूड़ों में जमा हो जाये ।


खेत के नीचे वाले सिरे पर केंड के पानी को इकट्ठा करने के उद्देश्य से खोदी गई खाई से सम्बद्ध करके इसे प्राकृतिक जल निकास मार्ग से मिला देते हैं ।


समानान्तर क्षेत्र खाई ( Parallel field ditches )

यह विधि भी व्यारा विधि की तरह । है इस विधि में कूड के स्थान पर केंड की अपेक्षा अधिक गहरी और अधिक संग्रह क्षमतायुक्त होती है ।


जल निकास की इस विधि में खाइयाँ खोदी जाती हैं दो खाइयों की आपसी दूरी समान रखी जाती है । 

यह भूमि ऊँची - नीची एवं चपटी भूमियों के लिये लाभदायक है ।


विरूद्ध खाई खोदना ( Cross Slope System ) -

यह विधि अधिक असमान ऊँची - नीची भूमिर्यो के लिये प्रयोग की जाती है इस विधि में ढाल के विपरीत सपाट ढाल पर खाइयाँ खोदी जाती हैं।


दो खाईयों के बीच में जो खाली स्थान होता है उस पर उथली मॅड बना दी जाती हैं इन दोनों खाईयों के पानी को एक गहरी खाई से जोड़कर प्राकृतिक जल प्रवाह मार्ग में मिला देते हैं ।


( ब ) भूमिगत या अधोपृष्ठीय जल निकास ( Sub Surface Drainage in hindi )

भूमिगत जल निकास प्रणाली का मुख्य उद्देश्य जल स्तर के पौधों को जड़े क्षेत्र से नीचे ले जाना होता है ।


इसके लिये विभिन्न पद्धतियाँ खुली नालियाँ , टाइल निर्मित नालियाँ , मोल जल निकास नालियाँ , छिद्रित पाइप ड्रेन आदि प्रचलित है ।

इस विधि में कृषि योग्य भूमि नष्ट नहीं हो पाती तथा नालियों से कृषि कार्य में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचती है ।


इसके निम्नलिखित लाभ होते हैं -

1. पौधों के जड़ क्षेत्र में वायु संचार में सन्तोषजनक सुधार होता है ।

2. मृदा जल दशाओं में सुधार होता है ।

3. भूमि की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है ।

4. पौर्षो के जड़ क्षेत्र में वृद्धि के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ विकसित होती हैं 

5. खेत की तैयारी के लिये पर्याप्त समय मिल जाता है ।

6. घुलनशील लवणों की अतिरिक्त मात्रा को नीचे की तहों में निक्षालन द्वारा बहाया जाता है ।


अवपृष्ठ जल निकास की निम्नलिखित विधियाँ प्रचलित है -

( a ) खपरैल जल निकास ( Tile drainage in hindi )
( b ) “मोल” जल निकास ( Mole drainage in hindi )
( c ) छिद्र युक्त पाइप जल निकास ( Perforted pipe drainage in hindi )
( d ) पत्थर युक्त जल निकास ( Stone drainage meaning in hindi )


( a ) खपरैल जल निकास Tile drainage meaning in hindi

इस विधि में पकी हुई मिट्टी या कंक्रीट की बेलनार खोखली प्रयोग की जाती है । इन खपरैलों की अवमृदा में खोदी गई नालियों में मिट्टी से दबा दिया जाता है ।


( b ) मोल विधि Mol Plough meaning in hindi

इस विधि में मिट्टी के अन्दर एक विशेष प्रकार के बने मोल हल lough ) द्वारा मोल नाली पृष्ठ मृदा को बिना अनावृत किये हो बना दी जाती है ।


विधि प्रायः भारी भमियों में प्रयोग की जात है । युक्त पाइप विधि इस विधि में छिद्र युक्त धातु ( लोह अथवा प्लास्टिक ) के की भूमि के अन्दर खोदी गई नालियों में बिछा दिया जाता है ।


जल निकास से होने वाले लाभ Drainage advantage in hindi


जल निकास के लाभ निम्नलिखित है-

( 1 ) वायु संचार बढ़ने के कारण ऑक्सीजन वृद्धि से पौधों को अपनी दैनिक क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने में मदद मिलती है । जड़ों की वृद्धि होती है और ये पोषक तत्व ग्रहण करती हैं ।

( 2 ) हानिकारक लवण भूमि से बह जाते हैं । इस प्रकार से ऊसर भूमियों को सुधारा जा सकता है तथा अन्य भूमियों को विकार युक्त होने से बचाया जा सकता है ।

( 3 ) जलमग्न भूमियों में कार्बन - डाइ - ऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हो जाती है, जल निकास से यह नहीं बन पाती ।

( 4 ) भूमि शीघ्र कृषि कार्य करने योग्य हो जाती है उसमें यथा समय फसल बुआई की जा सकती है ।

( 5 ) मृदा की भौतिक अवस्था में सुधार होता है जिससे उत्पादन बढ़ता है ।

( 6 ) उचित जल निकास से पर्यावरण शुद्ध बनता है एवं आर्द्रता ( नमी ) में कमी आती है जिससे फसलों, मनुष्यों एवं पशुओं में रोग की सम्भावनायें कम हो जाती हैं ।

( 7 ) फसलों की वृद्धि से किसान सम्पन्न होता है ।


जल निकास से होने वाली हानियाँ drainage losses in hindi


जल निकास की हानियाँ निम्नलखित है -

( 1 ) मृदा वायु संचार रूक जाने के कारण जड़ों की श्वसन क्रिया समुचित प्रकार से नहीं हो पाती है । अत: पौधे मर जाते हैं ।

( 2 ) पानी की अधिकता होने के कारण मृदा तापक्रम गिर जाता है ।

( 3 ) मृदा संरचना बिगड़ जाती है ।

( 4 ) भूमि की सतह पर हानिकारक लवणों के इकट्ठा होने का भय रहता है जिसके कारण भूमि के विकारयुक्त होने का खतरा बना रहता है ।

( 5 ) भूमि के दलदली हो जाने के कारण लाभदायक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं ।

( 6 ) पानी गिरने से पोषक तत्वों के निक्षालन ( Leaching ) क्रिया से नष्ट होने का खतरा रहता है ।

( 7 ) पानी भर जाने पर भूमि की तैयारी समय पर नहीं हो पाती ।

( 8 ) भूमि में कार्बन - डाइ - ऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है जो पौधों के लिये हानिकारक होती है ।

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