जल निकास क्या है - परिभाषा, उद्देश्य, आवश्यकता एवं लाभ, हानि व प्रणालियां

वर्षा एवं सिंचाई के माध्यम से फसलों में एकत्रित अतिरिक्त पानी को कृत्रिम रूप से बाहर निकालने की प्रक्रिया जल निकास (drainage in hindi) कहलाती है ।

जल निकास (jal nikas) का प्रयोग सर्वप्रथम 500 ईसा पूर्व नीलघाटी में, हिरोडोटस (herodotus) द्वारा किया गया था ।


जल निकास क्या है? | what is drainage in hindi


जल निकास (drainage in hindi) की सहायता से पौधों की जड़ों का विकास होने लगता है तथा भूमि में वायु संचार बढ़ जाता है इससे पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ने लगती है और पौधों का विकास तेजी से होता है तथा उत्पादन वृद्धि होने में सहायता मिलती है ।

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जल निकास क्या है - परिभाषा, उद्देश्य, आवश्यकता एवं लाभ, हानि व प्रणालियां

जल निकास क्या है? | jal nikas kya hai?


फसलों से अधिक उपज की प्राप्ति के लिए भूमि से अतिरिक्त जल की निकासी करना अत्यंत आवश्यक होता है इस संपूर्ण प्रक्रिया को भी जल निकास (drainage in hindi) कहा जाता है ।


जल निकास की परिभाषा लिखिए? | defination of drainage in hindi

सामान्यता: खेत में एकत्रित अतिरिक्त पानी को कृत्रिम ढंग से बाहर निकालना है, जल निकास (jal nikas) कहलाता है ।


जल निकास की परिभाषा (defination of drainage in hindi) -

"पौधों के जड़ क्षेत्र में वायु संचार एवं भूमि का अनुकूल वातावरण बनाएं रखने के लिए भूमि की ऊपरी परत से अतिरिक्त जल को कृत्रिम रूप से क्षेत्र से बाहर निकालने की क्रिया को जल निकास कहते हैं ।"
इस क्रिया में केशिका जल को छोड़कर स्वतंत्र एवं गुरूत्वीय जल को बाहर निकाला जाता है ।

definition of drainage - "To drain out the excess water from the upper surface of the soil, to improve the aeration in the root zone of the plants and to make a favourable soil environment is called Drainage."


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जल निकास के उद्देश्य लिखिए? | purpose of drainage in hindi


जल निकास के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है -

  • जल निकास से सिंचाई द्वारा दिये गये अतिरिक्त पानी को भूमि से निकालकर बाहर किया जा सकता है । इस प्रक्रिया से वर्षा के अतिरिक्त जल को भी भूमि की सतह से हटाया जा सकता है ।
  • जल निकास के फलस्वरूप पौधों की जड़ों का विकास तेजी से होने लगता है । जड़ें भूमि सतह में फैल जाती हैं और गहराई तक चली जाती हैं । इससे पौधों का जड़ क्षेत्र बढ़ जाता हैं । जड़ क्षेत्र बढ़ने पर पौधों द्वारा अधिक मात्रा में पोषक तत्वों को ग्रहण किया जाता है ।
  • जल निकास से भूमि में पर्याप्त वायु संचार होता है । पौधों की जड़ों में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध होने लगती है । अतिरिक्त जल के हटाने से पौधों की जड़ों में उपस्थित कार्बन डाई ऑक्साइड व अन्य हानिकारक गैसें पौधों के जड़ क्षेत्र से बाहर आ जाती हैं ।
  • पौधों में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ जाती है ।
  • जल निकास से भूमि की ऊपरी सतह एवं भूमिगत सतहों में बढ़ते हुए लवणों की मात्रा को कम किया जा सकता है ।
  • अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त जल जमा रहने के कारण विभिन्न प्रकार के हानिकारक खरपतवार उगने लगते हैं । इनको नष्ट करने में सहायता मिलती है ।
  • भूमि में जुताई एवं अन्य कृषण क्रियाएँ आवश्यकता के अनुसार समय पर की जा सकती हैं ।
  • भूमि की जल को सोखने व धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है ।
  • भूमि की संरचना में सुधार होता है तथा भूमि में सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रियाशीलता बढ़ जाती है ।
  • अतिरिक्त जल से किसी भी क्षेत्र में पनपने वाली विभिन्न बीमारियों को जल निकास द्वारा कम करने में सहायता मिलती है ।
  • फसलों की उपज बढ़ती है जो राष्ट्रीय सम्पन्नता एवं स्थाई कृषि विकास की सूचक है ।


जल निकास क्यों आवश्यक है? | necessity of drainage in hindi


भूमि से जल निकास की आवश्यकता कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण पड़ती है जो निम्न प्रकार है -

  • कुछ विशेष क्षेत्रों में भूमि की अधोसतह में कठोर तह (hard layer of soil) पाई जाती है । इस कठोर तह के कारण पानी भूमि में नीचे की ओर नहीं जा पाता । अतिरिक्त जमा पानी को निकालने के लिये जल निकास आवश्यक हो जाता है ।
  • मटियार भूमियों में पानी सोखने की प्रक्रिया काफी धीमी होती है । अत: इन भूमियों में जल निकास आवश्यक होता है ।
  • विकार युक्त भूमियों में हानिकारक लवण जो भूमि की ऊपरी सतह पर पाये जाते हैं उन्हें सतह से दूर करने के लिये भी जल निकास की आवश्यकता होती है ।
  • जिन स्थानो पर भूमि का जल स्तर काफी ऊँचा होता है वहाँ पर जल निकास की आवश्यकता होती है ।
  • ऐसे खेतों में जो नहरों, नदियों, नालों के समीप होते हैं वहाँ निस्पंदन (seepage) क्रिया द्वारा जल एकत्रित हो जाता है ऐसे स्थानों पर जल निकास आवश्यक होता है ।
  • कुछ फसलें अधिक समय तक पानी में खड़ी नहीं रह पाती ऐसे स्थानों पर भी जल निकास की आवश्यकता होती है ।
  • ऐसी भूमियाँ जो निचले स्थानों पर होती है में पानी भर जाता है इन भूमियों में जल निकास की आवश्यकता होती है ।


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जल निकास को प्रभावित करने वाले कारक लिखिए? | factors affecting drainage in hindi

अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भूमि की अधिक उत्पादकता होते हुए भी जलमग्नता के कारण फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । इन भूमियों में उगने वाले पौधों की उत्पादकता भी विभिन्न कारणों से घट जाती है ।


अतिरिक्त जल के कारण भूमि तथा पौधों पर होने वाले कुप्रभावों का वर्णन निम्न प्रकार है -

  • जल निकास का भूमि पर प्रभाव
  • जल निकास का पौधों पर प्रभाव


( A ) अतिरिक्त जल का भूमि पर प्रभाव (harmful effects of excess water on soil )

अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विभिन्न कारणों से भूमि की सतह पर जल भरा रहता है,जिसके कारण भूमि में वायु की कमी होने लगती है एवं भूमि का वातावरण खराब होने लगता है और भूमि दलदली (Swamp soil) या कीचड़ जैसी लिजलिजी हो जाती है । ऐसी भूमियों में कृषि उत्पादन एक गम्भीर समस्या बन जाती है ।


जल निकास भूमि को निम्न प्रकार से हानि करता है -

  1. अतिरिक्त जल से भूमि में वायु संचार में कमी आती है, जिससे पौधों के जड़ क्षेत्र में ऑक्सीजन का अभाव हो जाता है और CO, की मात्रा बढ़ने लगती है । CO, की अधिकता पौधों के जड़ क्षेत्र के लिए हानिकारक होती है तथा वायु की कमी में श्वसन की क्रिया रुक जाती है ।
  2. भूमि में पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व लीचिंग की क्रिया द्वारा जल में घुलकर भूमि की निचली सतह में चले जाते हैं । अतः पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता घट जाती है ।
  3. भूमि का तापमान कम हो जाता है । अतिरिक्त जल भरा रहने के कारण भूमि ठण्डी रहती है ।
  4. भूमि सतह पर अतिरिक्त जल भरा रहने के कारण हानिकारक व घुलनशील लवण पौधों के जड़ क्षेत्र में एकत्रित होने लगते हैं जिससे पौधों को हानि होती है ।
  5. अतिरिक्त जल से भूमि की संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा यह नष्ट होने लगती है ।
  6. वर्षा के अधिक होने या अतिरिक्त सिंचाई जल के कारण भूमि में लगातार पानी भरा रहने से भूमी दलदली (swamp) होने लगती है ।
  7. भूमि में निरन्तर जल भरा रहने से फसल उत्पादन के लिए कोई भी भू - परिष्करण क्रिया समय पर नहीं की जा सकती, जिससे फसलों की बुवाई तथा अन्य कार्यक्रमों में विलम्ब होता है ।
  8. भूमि की सतह पर अतिरिक्त जल के कारण विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पति पनपने लगती है जिससे रोग फैलने की आशंका भी रहती है ।


( B ) अतिरिक्त जल का पौधों पर कुप्रभाव ( Harmful Effects of Excess water on plants )

अतिरिक्त जल के कारण भूमि की सतह पर उगने वाले पौधों में विभिन्न प्रकार के लक्षण दिखाई देने लगते हैं ।


इनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है -

  1. अधिक जल के कारण बहुत से पौधों की पत्तियाँ मुरझाकर गिर जाती है या नीचे की ओर मुड़ने लगती है ।
  2. अतिरिक्त जल के कारण पौधों की जड़ें भली - भाँति विकसित नहीं हो पाती । इसका कारण जड़ क्षेत्र में ऑक्सीजन की कमी तथा CO, जैसी गैसों की अधिकता है । पौधे की जड़ें उथली रह जाती हैं जिससे तेज वायु के चलने के समय भूमि की सतह पर पौधे की वानस्पतिक वृद्धि अधिक होने के कारण पौधे गिरकर नष्ट हो जाते हैं ।
  3. पौधों में ऑक्सीजन की कमी में बीमारियाँ पनपने लगती हैं जैसे गन्ने का लाल रोग ।
  4. भूमि में वायु संचार की कमी के कारण ऑक्सीजन का अभाव हो जाता है और पौधों को अपनी वृद्धि के लिए पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती ।
  5. भूमि में पोषक तत्वों की उपलब्धता में कमी आने के कारण पौधों की वृद्धि एवं विकास कम हो पाता है और वे आकार में छोटे रह जाते हैं ।
  6. वायु संचार के अभाव में भूमि में उत्पन्न विषैले पदार्थ पौधों द्वारा ग्रहण कर लिए जाते हैं और वे मर जाते हैं ।
  7. पौधों की अधिक उपज देने वाली जातियों का प्रयोग करने पर भी अतिरिक्त जल से उनकी उत्पादकता घट जाती है ।


जल निकास की कोन-कोन सी विधियां है? | methods of drainage in hindi

सिंचित भूमियों में विभिन्न कारणों से अतिरिक्त जल भरने के कारण उनकी संरचना खराब हो जाती है । अतः अतिरिक्त जल को खुली नालियों या अन्य विधियों द्वारा बाहर निकालने का कार्य किया जाता है ।


सामान्यतः जल निकास की विधियों को दो भागों में विभाजित किया जाता है -

  • सतही जल निकास ( Surface Drainage )
  • भूमिगत जल निकास ( Underground Drainage )


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जल निकास की प्रमुख विधियों का वर्णन कीजिए?


1. सतही जल निकास ( Surface Drainage ) -

जल निकास की ऐसी विधि जिसमें अधिक वर्षा या अत्याधिक सिंचाई जल जो भूमि की सतह पर एकत्र होने लगता है को खेत से बाहर निकालने की क्रिया सतही जल निकास (surface drainage) कही जाती है । जल निकास की समस्या इसके प्रकार एवं सीमा पर निर्भर करती है ।


सतही जल निकास निम्न विधियों द्वारा किया जाता है -

( i ) समतलीकरण ( Levelling ) -

यह क्रिया समतल भूमि पर की जाती है । भूमि ऊँची नीची होने पर उसको समतल कर लिया जाता है । सिंचाई या वर्षा का अतिरिक्त जल कृषण क्रियाओं में बाधा उत्पन्न करता है और फसलों को हानि करता है ।


( ii ) छोटी क्यारियों का निर्माण ( Bedding ) –

भारी भूमियों में जहाँ भूमिगत जल निकास सम्भव नहीं है और जल निकास नालियों की दूरी कम है वहाँ पर छोटी - छोटी क्यारियाँबनाकर जल निकास का कार्य किया जाता है । इन क्यारियों से अपधावन जल (run - off water), अतिरिक्त सिंचाई जल निकालकर बाहर किया जाता है ।


( iii ) खुली नालियाँ ( Open drains ) -

भूमि की ऊपरी सतह से अतिरिक्त जल को खुली नालियों द्वारा बहाया जाता है । सिंचित क्षेत्रों में खुली नालियाँ बनाकर जल निकास कार्य को करना उचित नहीं माना जाता क्योंकि इनमें अनावश्यक खरपतवार और अन्य कीट संरक्षण पाने लगते हैं ।


2. भूमिगत जल निकास ( Underground Drainage ) -

पौधों के जड़ क्षेत्र के मृदा संस्तर (soil profile) से कृत्रिम विधि द्वारा आवश्यकता से अधिक गुरुत्वीय जल को बाहर निकालने की क्रिया को भूमिगत जल निकास कहते हैं ।


भूमिगत जल निकास निम्न विधियों द्वारा किया जाता है -

( i ) पाइपों द्वारा जल निकास ( Drainage by pipes ) -

इस विधि में भूमि सतह में विभिन्न दूरियों एवं गहराइयों पर भूमि में पाइप स्थापित कर दिये जाते हैं । पाइपों की लम्बाई 6 मीटर रखी जाती है व पाइपों का व्यास आवश्यकता के अनुसार चुन लिया जाता है । ये पाइप सीमेंट या प्लास्टिक के बने होते हैं । इन पाइपों में जल प्रवेश करने के पश्चात् खेत से बाहर निकलता है ।


( ii ) मोल जल निकास ( Mole Drainage ) -

भूमि में, इच्छित गहराई पर बनाई गई बेलनाकार नालियाँ मोल नालियाँ होती हैं । इन नालियों को बनाने में किसी पदार्थ की आवश्यकता नहीं होती । नालियों के आसपास की मिट्टी ही नालियों को मजबूती प्रदान कर स्थाई बनाती है । इन नालियों में जल प्रवेश करने के पश्चात् खेत से बाहर हो जाता है ।


जल निकास के लाभ एवं हानियां लिखिए? | advantages and disadvantages of drainage in hindi

भूमि से अतिरिक्त जल को कृत्रिम रूप से निकालने की क्रिया से पौधों, भूमि तथा समाज को विभिन्न प्रकार से लाभ पहुंचता है ।


जल निकास से होने वाले लाभ लिखिए? | jal nikas ke labh


जल निकास के प्रमुख लाभ निम्नलिखित है -

  • वायु संचार बढ़ने के कारण ऑक्सीजन वृद्धि से पौधों को अपनी दैनिक क्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने में मदद मिलती है । जड़ों की वृद्धि होती हैं और ये पोषक तत्व ग्रहण करती हैं ।
  • हानिकारक लवण भूमि से बह जाते हैं । इस प्रकार से ऊसर भूमियों को सुधारा जा सकता है तथा अन्य भूमियों को विकार युक्त होने से बचाया जा सकता है ।
  • जलमग्न भूमियों में कार्बन - डाइ - ऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हो जाती है जल निकास से यह नहीं बन पाती ।
  • भूमि शीघ्र कृषि कार्य करने योग्य हो जाती है उसमें यथा समय फसल बुआई की जा सकती है ।
  • मृदा की भौतिक अवस्था में सुधार होता है जिससे उत्पादन बढ़ता है ।
  • उचित जल निकास से पर्यावरण शुद्ध बनता है एवं आर्द्रता (नमी) में कमी आती है जिससे फसलों, मनुष्यों एवं पशुओं में रोग की सम्भावनायें कम हो जाती हैं ।
  • फसलों की वृद्धि से किसान सम्पन्न होता है ।


जल निकास के अभाव में होने वाली हानियां | disadvantages of drainage in hindi


जल निकास की प्रमुख हानियां निम्नलिखित है -

  • मृदा वायु संचार रूक जाने के कारण जड़ों की श्वसन क्रिया समुचित प्रकार से नहीं हो पाती है । अतः पौधे मर जाते हैं ।
  • पानी की अधिकता होने के कारण मृदा तापक्रम गिर जाता है ।
  • मृदा संरचना बिगड़ जाती है ।
  • भूमि की सतह पर हानिकारक लवणों के इकट्ठा होने का भय रहता है जिसके कारण भूमि के विकारयुक्त होने का खतरा बना रहता है ।
  • भूमि के दलदली हो जाने के कारण लाभदायक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं ।
  • पानी गिरने से पोषक तत्वों के निक्षालन (leaching) क्रिया से नष्ट होने का खतरा रहता है ।
  • पानी भर जाने पर भूमि की तैयारी समय पर नहीं हो पाती ।


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जल निकास प्रणालियों का चित्रों सहित वर्णन कीजिए? | drainage systems with diagrams in hindi

भूमि की ऊपरी सतह व पौधों के जड़ क्षेत्र से अतिरिक्त जल को निकालने के लिए विभिन्न विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं ।


जल निकास की प्रमुख प्रणालियाँ -

  • प्राकृतिक प्रणाली ( Natural System )
  • हैरिंग बोन प्रणाली ( Harring Bone System )
  • गिरीडीरोन प्रणाली ( Giridiron System )

इन विधियों का प्रयोग करने के लिए भिन्न - भिन्न प्रकार की जल निकास प्रणालियाँ इस कार्य में सहायक होती हैं ।

नालियों व पाइपों को स्थापित करने के डिजाईन के आधार पर इन प्रणालियों को निम्न में किसी एक प्रकार का बनाया जाता है, जिन्हें चित्र द्वारा दर्शाया गया है -

जल निकास क्या है - परिभाषा, उद्देश्य, आवश्यकता एवं लाभ, हानि व प्रणालियां
जल निकास की प्रणालियां | systems of drainage in hindi

जल निकास की प्रणालियाँ | systems of drainage in hindi


1. प्राकृतिक प्रणाली ( Natural System ) -

यह जल निकास की एक ऐसी प्रणाली है जिसमें ढाल की दिशा के साथ - साथ नालियाँ बनाई जाती हैं । किसी खेत में यदि विभिन्न जगहों पर जल निकास की समस्या हो तो विभिन्न क्षेत्रों को अलग - अलग रूप में नालियाँ बनाकर जल निकास (drainage in hindi) किया जाता है । यह एक कम खर्चीली विधि है क्योंकि इसमें प्राकृतिक ढाल के अनुरूप जल निकास की नालियों को बनाया जाता है ।


2. हैरिंग बोन प्रणाली ( Harring Bone System ) -

इस प्रणाली में मुख्य नाली बीच में होती है और उसके दोनों ओर सहायक नालियाँ बनाई जाती हैं । मुख्य नाली सबसे अधिक गहराई में होती है तथा अन्य नालियों का ढाल बीच की नाली में होता है जिससे इन नालियों से अतिरिक्त जल होता हुआ बीच की नाली में गिरता है और बाहर निकल जाता है ।


3. गिरीडीरोन प्रणाली ( Giridiron System ) -

इस प्रणाली में मुख्य निकास नाली खेत के एक ओर होती है तथा उससे खेत की ओर अन्य छोटी - छोटी नालियाँ होती हैं जिनसे जल बहता हुआ मुख्य नाली में आ जाता है और मुख्य नाली से होता हुआ बाहर निकल जाता है । मुख्य नाली तथा अन्य छोटी नालियों को सुविधा के अनुसार बनाया जा सकता है ।


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