बागवानी फसलों के लिए उचित जलवायु क्षेत्र

बागवानी फसलों पर जलवायु का बहुत अधिक गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए बागवानी फसलों के लिए उचित जलवायु क्षेत्र (Climate zone for horticulture crops in hindi) की आवश्यकता होती है ।


किसी भी फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए उस फसल के लिए एक निश्चित जलवायु क्षेत्र का होना जरूरी होता है ।


इसी प्रकार बागवानी फसलों के लिए उचित जलवायु (Climate for horticulture crops in hindi) का भी होना उतना ही आवश्यक होता है ।


बागवानी फसलों के लिए उचित जलवायु क्षेत्र (Climate zone for horticulture crops in hindi)


बागवानी फसलों के लिए उचित जलवायु क्षेत्र (Climate zone for horticulture crops in hindi)
बागवानी फसलों के लिए उचित जलवायु क्षेत्र


जलवायुु की परिभाषा (Definition of Climate in hindi)


बागवानी (उद्यान सस्य) पर जलवायु (Climate in hindi) का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है ।


किसी पौधे के साधारण जीवन चक्र पर जलवायु के विभिन्न कारकों जैसे - तापक्रम, प्रकाश, आर्द्रता, वर्षा, पाला व ओले आदि का गहरा प्रभाव पड़ता है ।


इस सब कारकों का सम्मिलित प्रभाव एवं इन सब कारकों को ही जलवायु (Climate in hindi) कहा
जाता है ।


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बागवानी फसलों के लिए उचित जलवायु क्षेत्र (Climate zone for horticulture crops in hindi)


जलवायु के इन प्राकृतिक कारकों के उचित सम्मिश्रण एवं किसी पौधे की सफल कृषि निर्भर करती है ।


मानव द्वारा बहुत थोड़ी मात्रा में ही इन कारकों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है ।


स्थान - स्थान पर जलवायु के विछिन्न कारकों का सम्मिश्रण अलग - अलग होता है ।


अत: जलवायु में विभिन्नता आ जाती है और स्थान - स्थान पर विभिन्न प्रकार की वनस्पति उत्पन्न होती हैं । 


सफल बागवानी फसलों के लिए उचित जलवायु (Climate for horticulture crops in hindi) को देखते हुए फलों की किस्म एवं जातियों का चुनाव करना चाहिये ।


अनुकूल जलवायु में उगाये जाने के कारण ही किसी क्षेत्र का फल प्रसिद्ध होता है ।


बागवानी फसलों को प्रभावित करने वाले जलवायु कारक कोन से है?


बागवानी फसलों को प्रभावित करने वाले मुख्य सात जलवायु कारक है, जो निम्नलखित है -


  • वातावरण का तापक्रम / (तापमान) (Temperature of the environment)
  • वातावरण की नमी (Atmospheric humidity)
  • सूर्य का प्रकाश (Sunlight)
  • वर्षा (वर्षा की मात्रा) (Rainfall) / (amount of rainfall)
  • वायु (Air)
  • पाला (Frost)
  • ओला (Hailstone)


बागवानी के लिए उचित जलवायु क्षेत्र (Proper climatic zones for horticulture in hindi)


उदाहरणार्थ - हाजीपुर ( महाराष्ट्र ) का केला, काश्मीर व कुल्लु का सेब, नागपुर का सन्तरा, बनारस का आँवला, मुजफ्फरपुर ( बिहार ) की लीची, इलाहाबाद का अमरूद व मलिहाबाद ( लखनऊ ) का दशहरी आम आदि ।


यदि फलो की किसी किस्म या जाति को उसकी प्रतिकूल जलवायु में जाता है, तो या तो वह उत्पन्न नहीं हो पाता है या गुणों व मात्रा में उतना अच्छा नहीं हो पाता ।


उदाहरण के लिये बम्बई क्षेत्र में आम की सफलतापूर्वक होने वाली ऑलफैजो, प्यारी तथा आलमपुर बेनिशान जातियां, उत्तरी भारत में और उत्तरी भारत की दशहरी, लंगडा तथा चौंसा बम्बई क्षेत्र में सफलता पूर्वक नहीं उगायी जा सकतीं ।


बागवानी फसलों का वर्गीकरण (Classification of Horticulture crops in hindi)


जो फसलें मुख्य रूप से बागवानी (उद्यान) में उगाई जाती है, उन्हें बागवानी फसलें (Horticulture crops in hindi) कहा जाता है ।


बागवानी फसलें के नाम (Name of horticulture crops in hindi)


1. फल वाली फसलें - आम, केले, अनार आदि की खेती।


2. सब्जियों वाली फसलें - लौकी, कद्दू, आलू, आदि की खेती। 


3. फूल वाली फसलें - सूरजमुखी, गुलाब आदि की खेती।


4. बागानी फसलों की खेती - कॉफी, चाय, रबर आदि की खेती।


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बागवानी के लिए उचित जलवायु ( Proper Climate for Horticulture in hindi )


बागवानी की सफलता के लिये जलवायु के इन कारकों के प्रभाव का ज्ञान होना अत्यन्त आवश्यक है।


1. बागवानी फसलों के लिए उचित तापक्रम ( Temperature in hindi )


तापक्रम (temperature in hindi) पौधों के मेटाबोलिक प्रक्रम पर नियन्त्रण रखता है ।


मेटाबोलिक प्रक्रम एक निश्चित न्यूनतम तापक्रम पर प्रारम्भ होकर, तापक्रम बढ़ने के साथ - साथ बढ़ते जाते हैं और एक तापक्रम पर अधिकतम हो जाते हैं, जिसे अनुकूलतम तापक्रम (temperature in hindi) कहते हैं ।


इससे अधिक तापक्रम बढ़ने पर फिर मेटाबोलिक प्रक्रम कम होने लगते हैं और एक तापक्रम पर पहुँच कर येबिल्कुल बन्द हो जाते हैं, जिसे अधिकतम तापक्रम कहते हैं ।


विभिन्न किस्मों व जातियों के लिये न्यूनतम व अधिकतम तापक्रम भिन्न - भिन्न होते हैं ।


किसी स्थान पर किसी किस्म व जाति को उगाने से पहले उत्पादक को यह ज्ञात करना आवश्यक है कि उस स्थान पर न्यूनतम तापक्रम कितना रहता है और उगाया जाने वाला फल अपनी वृद्धि की विभिन्न स्थितियों में कितना न्यूनतम तापक्रम सहन कर लेता है ।


यदि न्यूनतम तापक्रम 0° फा० तक चला जाता हैं तो उस स्थान पर शीतोष्ण फल ( सेब, अखरोट व खुबानी आदि । )


यह 26° फा० तक चला जाता है तो समशीतोष्ण फल ( नींबू, प्रजाति, अंगूर, लीची आदि ) उगाने चाहिये और उड्या फल जैसे — पपता, केला, चीकू, कटहल, शरीफा व अनन्नास आदि को उगाने की सोचना भी नहीं चाहिये ।


2. बागवानी फसलों के लिए उचित सुर्य का प्रकाश (Sun Light )


फलोत्पादन में सूर्य का प्रकाश का विशेष महत्व है ।


प्रकाश के प्रभाव की जानकारी के लिये इसकी तीव्रता, विशेषता एवं अवधि का ज्ञान आवश्यक है ।


प्रकाश की तीव्रता दिन, ऋतु व भूमध्य रेखा से दूरी के साथ - साथ परिवर्तित होती जाती है ।


इसका प्रभाव विशेषत: प्रकाश संश्लेषण पर पड़ता है, जो कार्बोहाइड्रेट्स निर्माण के लिये आवश्यक है ।


सम्पूर्ण दृष्टिगोचर स्पैक्ट्रम में पौधों की वृद्धि अच्छी होती है ।


प्रकाश की अवधि का प्रकाश संश्लेषण और वाष्पोत्सर्जन, दोनों पर प्रभाव पड़ता है ।


आवश्यकता से अधिक प्रकाश की तीव्रता हानि पहुंचाती है ।


इससे क्लोरोफिल नष्ट होता है, प्रकाश संश्लेषण कम होता है, वाष्पोत्सर्जन बढ़ जाता है और वृद्धि में रुकावट आ जाती है ।


इसी प्रकार आवश्यकता से कम प्रकाश की तीव्रता में क्लोरोफिल कम बनता है ।


प्रकाश संश्लेषण कम होता है और वृद्धि व फलत पर बुरा प्रभाव पड़ता है ।


3. बागवानी फसलों के लिए उचित वर्षा ( Rain )


किसी स्थान को औसत वार्षिक वर्षा तथा उसका वितरण, फलोत्पादन व्यवसाय के लिये बहुत महत्वपूर्ण है ।


जिन क्षेत्रों में तापमान कम रहता है, वहाँ गर्म इलाकों की अपेक्षा थोड़ी वर्षा भी पर्याप्त प्रभावी रहती है ।


इस प्रकार पौधों की उचित वृद्धि और विकास के लिये इंडे स्थान में गर्म स्थानों की अपेक्षा कम वर्षा की आवश्यकता पड़ती है ।


लगातार अधिक वर्षा से फलोद्यानों में पानी भर जाता है, जिसका फल वृक्षों पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है ।


फूल खिलने के समय वर्षा परागकण बहा देती है, जिससे परागण ठीक प्रकार से नहीं हो पाता और उपज नगण्य हो जाती है ।


अधिक व असमय वर्षा से रोग लाग्ने को सम्भावना भी बढ़ जाती है ।


इसके विपरीत अगर कम वर्षा होती है तो सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है ।


जिन क्षेत्रों में आमतौर से कम वर्षा होती है और सिंचाई के साधन भी अपर्याप्त है, वहीं बेर, अमरूद, फालसा, आंवला पारीफा व अनार आदि उगाने चाहिये ।


साधारणत: यदि वर्ष में 100 से० मी० बर्षा अच्छी प्रकार से वितरित हो तो वह अधिकांश फल - वृक्षों के लिये उपयोगी रहती है ।


4. वातावरण की नमी ( Atmospheric humidity )


वातावरण की नमी पौधों के जीवन पर पर्याप्त सार्थक प्रभाव रखती है ।


कम नमी में वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है ।


यदि वायुमण्डल सूखा, हुवा तेज व गर्म हो तो उत्स्वेदन ( ट्रान्सपिरेशन ) द्वारा पानी का अधिक ह्रास होगा ।


वायुमण्डल में नमी अधिक होने पर पानी का ह्रास कम होगा ।


कुछ फल ऐसे हैं, जिनकी कृषि में वातावरण की नमी का विशेष महत्व है ।


केले व अनन्नास की कृषि के लिये अधिक नमी व तापक्रम अच्छे रहते हैं ।


आडू के फल विकास के लिये नमी अच्छी रहती है । लीची के पकते समय यदि हवा में नमी कम रहती है तो लीची फटने लगती है ।


अंगूर व अंजीर के पकते समय यदि वातावरण में नमी अधिक रहती है तो फल फटने लगते हैं और मिठास कम रहती हैं ।


सेब, नाशपाती व अमरूद के पकते समय आर्द्रता कम होने पर फल चमकदार व चिकने होते हैं ।


खजूर की खेती कम नमी वाले क्षेत्रों में ही अच्छी होती है ।


वातावरण में अधिक नमी फफूदी रोगो को बढ़ावा देती है ।


सेब की स्वेब, आड़ की ब्राउन रौट, अँगूर को ब्लैक ऍट व डाउन मिलड्यु ऐसे क्षेत्रों में अधिक होती है ।


5. वायु ( Air )


तेज व गर्म हवा और आंधियां फल वृक्षो, फूलों तथा फलों को पर्याप्त क्षति पहुँचाती है ।


पपीते व केले के फलोद्यानों को तेज हवाओं से अपेक्षाकृत अधिक हानि होती है ।


उत्तर प्रदेश में गर्मी के मौसम में आंधियों से आम के फलोद्यानों को बहुत हानि होती है ।


फूल व फल झड़ जाते हैं और वृक्षों की डालियां टूट जाती हैं ।


लु व बहुत ठंडी हवाये भी फल वृक्षों ( विशेषकर छोटे पौधों ) के फूलों व फलों को हानि पहुँचाती हैं ।


हल्की हवा का प्रवाह, हवा से सेचित होने वाले फल - वृक्षों के लिये आवश्यक है ।


हवा का तेज प्रवाह परागसेचन करने वाले कीटों की सक्रियता में बाधा डालता है ।


प्राय: देखा गया है, कि फूल आने व फल बनने के समय यदि पश्चिमी हवायें चलती हैं तो फलत अच्छी होती है ।


यदि ऐसे समय पर पूर्वी हवायें चलती हैं तो फलत कम होती है और कीट व रोग अधिक लगते हैं ।


6. पाला ( Frost )


पौधों की छोटी अवस्था में पाले से अधिक हानि व मरने की सम्भावना रहती है ।


पाला पौधों के कोमल अंगो, जैसे - नयी पत्तियों, प्ररोहों, फूलों तथा उनके समीप के तन्तुओं पर अधिक क्षति पहुंचाता है ।


सर्दी के मौसम के प्रारम्भ या समाप्त होने के समय यदि पाला पड़ता है, तो वह अधिक हानिकारक होता है ।


आम, पपीता व केला आदि उष्ण कटिबंधीय फलों को ऐसे क्षेत्रों में नहीं उगाया जा सकता जहाँ पाला अधिक पड़ता है ।


7. ओला ( Hail )


ओला किसी भी समय क्यों न पड़े, सदैव हानिकारक होता है ।


वह वृक्षों, फूलों, सभी भागों को क्षति पहुंचाता है ।


ओले पड़ने से फूल व छोटे - छोटे फल झड़ जाते हैं, जिससे उपज कम व निम्न श्रेणी की प्राप्त होती हैं ।


उत्तरी भारत में प्रायः ओला वृष्टि हो जाती है ।

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