भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का क्या योगदान है इसका महत्व एवं समस्याएं लिखिए

कृषि की विकासशील अर्थव्यवस्थाएं मूलत: प्राथमिक अवस्था रही है ।

भारतीय अर्थव्यवस्था‌ में कृषि के योगदान (role of agriculture in Indian economy in hindi) की गणना ‌अभी विकासशील अर्थव्यवस्था के रूप में ही की जाती है ।


सम्भवतः इस स्थिति का मूल कारण यही है कि आयोजन की 54 वर्षों के उपरांत भी भारतीय अर्थव्यवस्था आज भी कृषि प्रधान है ।

अत: कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है ।


महात्मा गांधी के अनुसार, "कृषि भारत की आत्मा है ।"

योजना आयोग भी आयोजन की सफलता के लिए कृषि के महत्व एवं विकास को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता है । 


भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की भूमिका | role of agriculture in Indian economy in hindi


भारत में करोड़ों लोगों को भोजन और आजीविका कृषि (agriculture in hindi) से ही प्राप्त होती है ।

कृषि पर ही देश के उद्योग धंधे, व्यापार, व्यवसाय, यातायात एवं संचार के साधन निर्भर होते हैं ।


लाॅर्ड मेयो के शब्दों में, ‌भारत की उन्नति और सभ्यता के दृष्टिकोण से खेती (kheti) पर आधारित है ।

संसार में शायद ही कोई ऐसा देश हो, जिसकी सरकार खेती से इतना प्रत्यक्ष और तात्कालिक लगाव रखती हो ।

भारत की सरकार मात्र एक सरकार ही नहीं अपितु मुख्य भूमि स्वामी भी है‌ ।


भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का क्या योगदान है 2021 | role of agriculture in Indian economy in hindi 2021


भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का प्रमुख महत्व निम्नलिखित है -

  • राष्ट्रीय आय के प्रमुख स्रोत
  • आजीविका का प्रमुख स्रोत
  • सर्वाधिक भूमि का उपयोग
  • खाद्यान्न की पूर्ति का साधन
  • औद्योगिक कच्चे माल की पूर्ति का साधन
  • पशुपालन में सहायक
  • हमारे निर्यात व्यापार का मुख्य आधार
  • केन्द्र तथा राज्य सरकारों की आय का साधन
  • आन्तरिक व्यापार का आधार
  • यातायात के साधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण
  • कृषि जीवन - यापन का एक महत्वपूर्ण ढंगअन्तर्राष्ट्रीय ख्याति
  • पूँजी निर्माण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र
  • पंचवर्षीय योजनाओं की मुख्य आधारशिला


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भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का क्या योगदान है एवं इसका महत्व लिखिए?

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का क्या योगदान है, role of agriculture in Indian economy in hindi, भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि महत्व, कृषि की समस्याएं

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व का अनुमान निम्नलिखित तथ्यों से लगाया जा सकता है  -


( 1 ) राष्ट्रीय आय के प्रमुख स्रोत -

भारत की राष्ट्रीय आय का सर्वाधिक अंश कृषि एवं सम्बद्ध व्यवसायों से ही प्राप्त होता है । 2005-06 में लगभग 19.7% राष्ट्रीय आय कृषि से प्राप्त हुई थी, जबकि 1968-69 में 44.4% राष्ट्रीय आय की प्राप्ति कृषि से हुई थी । 1955-56 में तो यह 54% था । स्पष्ट है कि राष्ट्रीय आय का एक बड़ा भाग कृषि से प्राप्त होता है, यद्यपि विकास के साथ - साथ राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान निरन्तर कम होता जा रहा है ।


( 2 ) आजीविका का प्रमुख स्रोत -

भारत में कृषि आजीविका का प्रमुख स्रोत है । श्री० के० आर० वी० राव के अनुसार, 1991 ई० में सम्पूर्ण जनसंख्या का लगभग 66.3% भाग कृषि एवं सम्बद्ध व्यवसायों से अपनी आजीविका प्राप्त करता था, जबकि ब्रिटेन, अमेरिका, कनाड़ा आदि देशों में कृषि एवं सम्बद्ध व्यवसायों पर निर्भर रहने वाली जनसंख्या का अंश 20% से भी कम है । देश की कुल जनसंख्या का 77.3% भाग गाँवों में रहता है और गाँवों में मुख्य व्यवसाय कृषि है ।


( 3 ) सर्वाधिक भूमि का उपयोग -

कृषि में देश के भू - क्षेत्र का सर्वाधिक भाग प्रयोग किया जाता है । उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार कुल भू - क्षेत्र 49.8% भाग में खेती की जाती है ।


( 4 ) खाद्यान्न की पूर्ति का साधन -

कृषि देश की 103 करोड़ जनसंख्या को भोजन तथा 36 करोड़ पशुओं को चारा प्रदान करती है । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीयों के भोजन में कृषि उत्पाद ही प्रमुख होते हैं । यदि जनसंख्या वृद्धि एवं आर्थिक विकास के परिवेश में खाद्य सामग्री की पूर्ति को नहीं बढ़ाया जाता है, तो देश के आर्थिक विकास का ढाँचा चरमरा जाता है ।


( 5 ) औद्योगिक कच्चे माल की पूर्ति का साधन -

देश के महत्वपूर्ण उद्योग कच्चे माल के लिए कृषि पर ही निर्भर हैं । सूती वस्त्र, चीनी, जूट, वनस्पति तेल, चाय व कॉफी इसके प्रमुख उदाहरण हैं । संसार के सभी देशों में उद्योगों का विकास कृषि के विकास के बाद ही सम्भव हुआ है । इस प्रकार, औद्योगिक विकास कृषि के विकास पर ही निर्भर है ।


( 6 ) पशुपालन में सहायक -

हमारे कृषक पशुपालन कार्य एक सहायक धन्धे के रूप में करते हैं । पशुपालन उद्योग से समस्त राष्ट्रीय आय का 7.8% भाग प्राप्त होता है । कृषि तथा पशुपालन उद्योग एक - दूसरे के पूरक तथा सहायक व्यवसाय हैं । कृषि पशुओं को चारा प्रदान करती है और पशु कृषि को बहुमूल्य खाद प्रदान करते हैं, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है ।


( 7 ) हमारे निर्यात व्यापार का मुख्य आधार -

देश के निर्यात का अधिकांश भाग कृषि से ही प्राप्त होता है । अप्रैल 2005-06 में प्रमुख वस्तुओं के निर्यात में बागान उत्पाद, कृषि एवं सहायक उत्पाद में 26% की वृद्धि दर्ज की गई है । कृषि उत्पादनों में चाय, जूट, लाख, शक्कर, ऊन, रुई, मसाले, तिलहन आदि प्रमुख


( 8 ) केन्द्र तथा राज्य सरकारों की आय का साधन -

यद्यपि कृषि क्षेत्र पर कर का भार अधिक नहीं होता है, तथापि कृषि राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत है । लगाने से लगभग 200 करोड़ रुपये वार्षिक आय का अनुमान लगाया गया है । इसके अतिरिक्त कृषि वस्तुओं के निर्यात - कर से भी आय प्राप्त होती है । केन्द्रीय सरकार के उत्पादन शुल्कों का एक बहुत बड़ा भाग चाय, तम्बाकू, तिलहन आदि फसलों से प्राप्त होता है ।


( 9 ) आन्तरिक व्यापार का आधार -

भारत में खाद्य पदार्थों पर राष्ट्रीय आय का अधिकांश भाग व्यय होता है । अनुमान है कि शहरी क्षेत्रों में आय का 58.2% तथा ग्रामीण क्षेत्रों में आय का 67.2% भोजन पर व्यय किया जाता है । स्पष्ट है कि आन्तरिक व्यापार मुख्यत: कृषि पर आधारित होता है और कृषि क्षेत्र में होने वाले प्रत्येक परिवर्तन का प्रभाव आन्तरिक व्यापार पर पड़ता है । थोक तथा खुदरा व्यापार के अतिरिक्त बैंकिंग तथा बीमा व्यवसाय भी कृषि से अत्यधिक प्रभावित होते हैं ।


( 10 ) यातायात के साधनों की दृष्टि से महत्वपूर्ण -

कृषि उत्पादन यातायात के साधनों को पर्याप्त मात्रा में प्रभावित करता है । जिस वर्ष कृषि उत्पादन कम होता है, रेल व सड़क परिवहन आदि सभी साधनों की आय घट जाती है । इसके विपरीत, अच्छी फसल वाले वर्ष में इन साधनों की आय मे पर्याप्त वृद्धि हो जाती है ।


( 11 ) कृषि : जीवन - यापन का एक महत्वपूर्ण ढंग -

वस्तुत: भारत में कृषि का महत्व केवल आर्थिक जीवन तक ही सीमित नहीं है, इसने हमारे आचार - विचार, परम्पराओं एवं संस्कृति सभी को प्रभावित किया है । प्रो० ए० एन० अग्रवाल के शब्दों में, "कृषि केवल एक व्यवसाय ही नहीं है अपितु जीवन का ढंग है, जिसका यहाँ के लोगों के विचारों और संस्कृति पर सदियों से प्रभाव पड़ रहा है ।" वस्तुत: इसमें कोई सन्देह नहीं कि कृषि ने केवल हमारे आर्थिक जीवन को ही प्रभावित नहीं किया वरन् इसने जीवन को एक पद्धति भी प्रदान की है । युगों - युगों से हमारी सभ्यता संस्कृति . रीति - रिवाजों और धर्म को कृषि की अक्षुण्ण परम्परा ने ही सुरक्षित रखा है । हमारी प्राचीन गौरवमय संस्कृति आज भी ग्राम्य - जीवन की ही धरोहर है ।


( 12 ) अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति -

यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि कृषि - पदार्थों के माध्यम से हमें अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई है । विश्व - कृषि अर्थव्यवस्था में भारतीय कृषि का एक महत्वपूर्ण स्थान है । प्रो० होल्डरसेन के शब्दों में, "भारत विश्व में गन्ने से बनाई जाने वाली चीनी का सबसे बड़ा उत्पादक है । चावल के उत्पादन में भारत को चीन जैसा उच्च स्थान प्राप्त है मूंगफली के उत्पादन में भारत विश्व में प्रथम है । लाख के उत्पादन में भारत को एकाधिकार प्राप्त है संसार में चीन के बाद चाय का यह सबसे बड़ा उत्पादक है ।" इन शब्दों से भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व स्वतः स्पष्ट हो जाता है ।


( 13 ) पूँजी निर्माण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र -

देश की सर्वाधिक पूँजी कृषि - क्षेत्र में नियोजित है । स्थायी पूँजी की दृष्टि से कृषि क्षेत्रों का स्थान सबसे उच्च है । कृषि क्षेत्रों के अतिरिक्त करोड़ों रुपये का निवेश सिंचाई के साधनों, पशुओं, कृषि उपकरणों आदि में हुआ है ।


( 14 ) पंचवर्षीय योजनाओं की मुख्य आधारशिला -

हमारा स्वयं का अनुभव इस तथ्य की पुष्टि करता है कि कृषि को उचित स्थान प्रदान किए बिना आर्थिक विकास की हमारी कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती । यही कारण है कि प्रथम योजना में कृषि को सर्वोच्च स्थान दिया गया था , तभी हमारे लक्ष्य प्राप्त हो सके । द्वितीय एवं तृतीय योजना में कृषि की कुछ उपेक्षा की गई । परिणामत : देश को भीषण खाद्य संकट का सामना करना पड़ा । इसके पश्चात् की सभी योजनाओं में कृषि एवं ग्रामीण विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है ।


अतः कृषि का विकास ही आर्थिक विकास का मूल मन्त्र है ।

इस प्रकार, स्पष्ट है कि भारतीय कृषि देश के समग्र आर्थिक विकास, अन्तर्देशीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, उद्योग एवं जनता के आर्थिक जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रखती है और विश्वास है कि यह स्थिति अभी दीर्घकाल तक बनी रहेगी ।


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कृषि उत्पादकता का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है?


कृषि उत्पादकता का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव - कृषि की निम्न उत्पादकता का हमारे आर्थिक विकास पर बहुत ही दृषित प्रभाव पड़ा है । यह कहना अनुचित न होगा कि हमारे आर्थिक विकास का रथ निम्न उत्पादकता की दलदल में फंस गया है ।

निम्न उत्पादकता के कारण ही 40% से अधिक जनसंख्या आज भी गरीबी रेखा से नीचे निवास कर रही है, उसे भर - पेट भोजन उपलब्ध नहीं हो पाता ।


उद्योगों को पर्याप्त कच्चा माल नहीं मिलता । देश में रूई व जूट जैसे कच्चे माल का भी अभाव है । दूध, फल, सब्जी आदि का उत्पादन हमारी आवश्यकता से कहीं कम है । मूल्य निरन्तर बढ़ रहे हैं ।

विदेशी विनिमय पर भी व्यापक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है । बेरोजगारी तथा अर्द्ध - बेरोजगारी की स्थिति निरन्तर जटिल होती जा रही है ।

वस्तुत: देश के अल्प - आर्थिक विकास के लिए कृषि की निम्न उत्पादकता एक बड़ी सीमा तक उत्तरदायी है ।

यही कारण है कि नियोजित विकास में कृषि को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है ।


भारत में कृषि उत्पादकता में वृद्धि के लिए मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं -

  1. कृषि उत्पादन की आधुनिकतम तकनीकें विकसित की जाएँ ।
  2. भूमि - सुधार के सभी कार्यक्रमों को पूर्ण एवं प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वित किया जाए ।
  3. सिंचाई के साधनों का विकास करके कृषि की प्रकृति पर निर्भरता को कम किया जाए ।
  4. खाद, कीटनाशक औषधियाँ तथा उन्नत किस्म के बीजों को उचित मूल्यों पर तथा पर्याप्त मात्रा में वितरित करने की व्यवस्था की जाए ।
  5. विपणन व्यवस्था में सुधार किया जाए ।
  6. किसानों को ऋणग्रस्तता से मुक्त करके, आवश्यक वित्त की आपूर्ति की जाए ।
  7. लाभदायक स्तर पर कृषि मूल्यों में पर्याप्त स्थायित्व बनाए रखा जाए ।
  8. विभिन्न प्रकार की जोखिमों को न्यूनतम करने के प्रयास किए जाएँ ।
  9. शिक्षा एवं प्रशिक्षण व्यवस्था का विस्तार किया जाए ।
  10. विकास कार्यक्रमों में समन्वय व सामंजस्य स्थापित किया जाए ।


भारत में कृषि उत्पादकता कम होने के क्या कारण है?


भारत एक विशाल एवं सम्पन्न देश है । इसकी अर्थव्यवस्था में कृषि का स्थान सदैव ही सर्वोपरि रहा है ।

देश में 18 करोड़ 70 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि उपलब्ध है । भारत की जलवायु ऐसी है कि प्राय: पूरे वर्ष कृषि - कार्य किया जा सकता है । यहाँ की नदियों के विशाल मैदान अपनी उर्वरा - शक्ति के लिए विश्व - प्रसिद्ध हैं ।

इनकी उर्वरा - शक्ति की तुलना संसार के किसी भी क्षेत्र से सफलतापूर्वक की जा सकती है । लेकिन इतना होने पर भी भारत में फसलों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन विश्व के अनेक देशों की तुलना में अत्यन्त निम्न है ।


यह निम्न उत्पादकता की स्थिति खाद्य तथा खाद्येतर दोनों फसलों में समान रूप से दृष्टिगत होती है ।

उत्पादन के मौद्रिक मूल्य की दृष्टि से भी भारतीय कृषि की उत्पादकता निम्न है । जापान में प्रति हेक्टेयर 904 डॉलर का उत्पादन प्राप्त होता है ।

जर्मनी में 525 डॉलर मूल्य का उत्पादन प्राप्त होता है, तो भारत में केवल 330 डॉलर मूलय का उत्पादन ही प्राप्त होता है ।
यह अल्प उत्पादकता देश के अर्द्ध - विकास की प्रतीक है ।


भारत में कृषि उत्पादकता कम होने के प्रमुख तीन कारण हैं -

  • सामान्य कारण
  • संस्थागत कारण
  • प्राविधिक कारण

निम्न कृषि उत्पादकता के मूल कारण कृषि की निम्न उत्पादकता के लिए अनेक कारण सामूहिक रूप से उत्तरदायी हैं ।


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इन समस्त कारणों को तीनों भागों में बांटा जा सकता है -


1. सामान्य कारण


( i ) भूमि पर जनसंख्या का भार -

भारत में कृषि - भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जा रहा है, परिणामतः प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि की उपलब्धि निरन्तर कम होती जा रही है । सन् 1901 ई० में जहाँ कृषि योग्य भूमि की उपलब्धि प्रति व्यक्ति 2.1 एकड़ थी, आज वह 0.7 एकड़ से भी कम रह गई है ।


( ii ) कुशल मानव -

शक्ति का अभाव - भारत का कृषक सामान्यतः निर्धन, निरक्षर एवं भाग्यवादी होता है । अत: वह स्वभावत: अधिक उत्पादन नहीं कर पाता ।


( iii ) भूमि पर लगातार कृषि -

अनगिनत वर्षों से हमारे यहाँ उसी भूमि पर खेती की जा रही है, फलतः भूमि की उर्वरा - शक्ति निरन्तर कम होती जा रही है । उर्वरा - शक्ति पुनः प्राप्त करने के लिए सामान्यत: न तो हेर - फेर की प्रणाली का ही प्रयोग किया जाता है और न रासायनिक खादों का प्रयोग होता है ।


2. संस्थागत कारण


( i ) खेतों का लघु आकार -

उपविभाजन एवं अपखण्डन के परिणामस्वरूप देश में खेतों का आकार अत्यन्त छोटा हो गया है, परिणामत: आधुनिक उपकरणों का प्रयोग नहीं हो पाता । साथ ही श्रम तथा पूँजी के साथ ही समय का भी अपव्यय होता है ।


( ii ) अल्प - मात्रा में भूमि सुधार -

देश में भूमि सुधार की दिशा में अभी महत्वपूर्ण एवं आवश्यक प्रगति नहीं हुई है, जिसके फलस्वरूप कृषकों को न्याय प्राप्त नहीं होता है । इसका उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।


( iii ) कृषि - सेवाओं का अभाव -

भारत में कृषि - सेवाएँ प्रदान करने वाली संस्थाओं का अभाव पाया जाता है, जिससे उत्पादकता में वृद्धि नहीं हो पाती ।


3. प्राविधिक कारण


( i ) परम्परागत विधियाँ -

भारतीय किसान अपने परम्परावादी दृष्टिकोण एवं दरिद्रता के कारण पुरानी और अकुशल विधियों का ही प्रयोग करते हैं, जिससे उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पाती ।


( ii ) उर्वरकों की कमी -

उत्पादन में वृद्धि के लिए उर्वरकों का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है, परन्तु भारत में गोबर एवं आधुनिक रासायनिक खादों (उर्वरकों) दोनों का ही अभाव पाया जाता है । गत् वर्षों में इस दिशा में कुछ प्रगति अवश्य हुई है ।


( iii ) आधुनिक कृषि -

उपकरणों का अभाव - भारत के अधिकांश कृषक पुराने उपकरणों का प्रयोग किया करते हैं, जिससे उत्पादन में उचित वृद्धि नहीं हो पाती । ऐसा प्रतीत होता है कि परम्परागत भारतीय कृषि - उपकरणों में अवश्य कोई मौलिक दोष है । अत: कृषकों को आधुनिक उपकरणों को अपनाना चाहिए ।


( iv ) बीजों की उत्तम किस्मों का अभाव -

कृषि के न्यून उत्पादन का एक कारण यह भी रहा है कि हमारे किसान बीजों की उत्तम किस्मों के प्रति उदासीन रहे है । इस स्थिति के मूलत: तीन कारण है - प्रथम, किसानों को उत्तम बीजों की उपयोगिता का पता न होनाः द्वितीय, बीजों की समुचित आपूर्ति न होना; तथा तृतीय, अच्छी किस्म के बीजों का महँगा होना और कृषकों की निर्धनता ।


( v ) साख - सुविधाओं का अभाव -

अभी तक कृषि विकास के लिए पर्याप्त साख - सुविधाओं कृषकों को उपलब्ध नहीं थी । इसके मूलतः दो कारण थे - प्रथम, कृषि वित्त संस्थाओं का अभाव व उनका सीमित कार्य - क्षेत्र; द्वितीय, उचित कृषि मूल्य नीति का अभाव ।


( vi ) पशुओं की हीन दशा -

भारत में पशुओं का अभाव तो नहीं है, हाँ, उनकी अच्छी नस्ल अवश्य अधिक नहीं पाई जाती । अन्य शब्दों में, पशु - धन की गुणात्मक स्थिति सन्तोषजनक नहीं है । अतः पशु आर्थिक सहयोग प्रदान करने के स्थान पर कृषकों पर भार बन गए हैं ।


( viii ) सिंचाई के साधनों का अभाव -

भारतीय कृषि की आधारशिला मानसून है, क्योंकि आयोजन के 56 वर्षों के उपरान्त भी कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 35% भाग को ही कृत्रिम सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध हैं, शेष कृषि - योग्य क्षेत्र अनिश्चित मानसून की कृपा पर निर्भर रहता है । पर्याप्त सिंचाई सुविधाओं के अभाव में उर्वरकों आदि का भी समुचित प्रयोग नहीं हो पाता, जिससे उत्पादकता में विशेष वृद्धि नहीं होती है ।

उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त कृषि की निम्न उत्पादकता के लिए कुछ अन्य कारण भी उत्तरदायी है; जैसे - सामाजिक रूढ़ियाँ, कृषि अनुसन्धान का अभाव, प्राकृतिक प्रकोप, शिथिल प्रशासन आदि ।


भारत में कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के क्या उपाय हैं?


कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के प्रमुख उपाय -

  • उत्पादन की आधुनिक तकनीकों का प्रयोग
  • भू - सुधार कार्यक्रमों का सफल क्रियान्वयन
  • कृषि आदाओं की उचित व्यवस्था
  • सिंचाई - सुविधाओं का विकास
  • पौध व फसल संरक्षण
  • विपणन - व्यवस्था में सुधार
  • ऋणाग्रस्तता की समाप्ति
  • पर्याप्त साख की पूर्ति मूल्य स्थायित्व
  • विभिन्न प्रकार की जोखिमों को कम करने की आवश्यकता
  • ग्रामीण निर्माण कार्यों का विकास
  • प्रेरणादायक मूल्यों की गारण्टी व समर्थित मूल्यों पर सरकारी खरीद की व्यवस्था
  • शिक्षा के प्रसार से कृषकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन
  • अन्य सुझाव


भारत में कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं -


1. उत्पादन की आधुनिक तकनीकों का प्रयोग -

देश में कृषि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए कृषि उत्पादन की नवीनतम तकनीकें विकसित की जानी चाहिए ।


इसके लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए -

  • कृषि उत्पादन की नवीन तकनीकों को विकसित करते समय देश के वातावरण - जलवायु, भूमि और मिट्टी, श्रमिकों की संख्या, पूँजी की उपलब्धि और जोत के आकार को ध्यान में रखा जाना चाहिए ।
  • नवीन तकनीकों का खेतों पर प्रदर्शन किया जाना चाहिए ।
  • नवीन तकनीकों के प्रयोग के बारे में कृषकों को व्यापक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ।


2. भू - सुधार कार्यक्रमों का सफल क्रियान्वयन -

कृषि विकास के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि भू - धारण व्यवस्था में सुधार किए जाएँ, कृषकों को भू - स्वामी बनाया जाए, अनार्थिक जोतों को समाप्त किया जाए । इस सम्बन्ध में प्रारम्भ किए गए भूमि - सुधार के सभी कार्यक्रमों को पूर्ण और प्रभावशाली ढंग से क्रियान्वित किया जाना चाहिए ।


3. सिंचाई - सुविधाओं का विकास -

कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए सिंचाई के साधनों के विकास पर उचित ध्यान दिया जाना चाहिए और कृषि की प्रकृति पर निर्भरता को कम किया जाना चाहिए ।


4. कृषि आदाओं की उचित व्यवस्था -

खाद, कीटनाशक औषधियाँ तथा उन्नत किस्म के बीजों को उचित मूल्यों पर तथा पर्याप्त मात्रा में वितरित करने की व्यवस्था की जानी चाहिए । रासायनिक उर्वरकों का कम्पोस्ट खाद के साथ प्रयोग को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए । कृषि अनुसन्धान संस्थाओं द्वारा उन्नत और उत्कृष्ट बीजों के प्रयोग के लिए अनुसंधान किए जाने चाहिए ।


5. पौध व फसल संरक्षण -

फसलों को उनके रोगों तथा कीटाणुओं से बचाने के लिए सरकार की ओर से फसलों पर कीटनाशक दवाइयाँ छिड़कने की व्यवस्था होनी चाहिए । कृषकों में फसलों के रोगों पर नियन्त्रण करने के ज्ञान का प्रसार होना चाहिए । जंगली पशुओं से खेतों की रक्षा करने के लिए खेतों के संरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए ।


6. विपणन - व्यवस्था में सुधार -

कृषि विकास के लिए विपणन - व्यवस्था में सुधार किया जाना चाहिए । इसके दोषों को दूर करने के लिए नियन्त्रित मण्डियों की स्थापना होनी चाहिए ।


7. ऋणाग्रस्तता की समाप्ति -

कृषकों को उनके कृषि कार्य उत्साहपूर्वक करने तथा प्रोत्साहन देने के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उन्हें ऋणग्रस्तता से मुक्त किया जाए तथा उनके लिए आवश्यक वित्त की पूर्ति करने की समुचित व्यवस्था की जाए ।


8. पर्याप्त साख की पूर्ति -

कृषि क्षेत्र में नवीन तकनीकों को प्रोत्साहन देने, विपणन व्यवस्था में सुधार करने तथा उन्नत बीजों और उर्वरकों का प्रयोग करने आदि के लिए कृषकों को उचित शर्तों पर पर्याप्त साख की पूर्ति की जानी चाहिए ।


9. मूल्य स्थायित्व -

कृषकों को कृषि कार्य में पर्याप्त विनियोग करने को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक है कि लाभदायक स्तर पर कृषि मूल्यों में पर्याप्त स्थायित्व बनाए रखा जाए । इसके लिए कृषि पदार्थों के न्यूनतम मूल्य की घोषणा करके अनिश्चितता एवं अस्थिरता को समाप्त किया जाना चाहिए ।


10. विभिन्न प्रकार की जोखिमों को कम करने की आवश्यकता -

भारतीय कृषक को अनेक प्रकार की जोखिमों का सामना करना पड़ता है; जैसे - मौसम से उत्पन्न जोखिम, कीटाणुओं की जोखिम, घटती हुई कीमतों की जोखिम व अनेक नई तकनीकों को अपनाने से सम्बन्धित जोखिम । विभिन्न उपायों को अपनाकर इन जोखिमों को कम किया जा सकता है । सुधरी हुई विधियों व नए साधनों के द्वारा होने वाले घाटे की पूर्ति की भी व्यवस्था होनी चाहिए ।


11. ग्रामीण निर्माण कार्यों का विकास -

ग्रामों की श्रम - शक्ति का उपयोग पूँजी निर्माण कार्यों में किया जाना चाहिए । इससे कृषिगत उत्पादकता में वृद्धि होगी । वृक्ष लगाने, मिट्टी की रक्षा करने, बाँध बाँधने, बहाव व सिंचाई की नालियाँ बनाने आदि पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए ।


12. प्रेरणादायक मूल्यों की गारण्टी व समर्थित मूल्यों पर सरकारी खरीद की व्यवस्था -

कृषक को अधिक उत्पादन के लिए प्रेरित करने हेतु उचित मूल्य नीति अपनाई जानी चाहिए । चुनी हुई फसलों के लिए न्यूनतम कीमतों की गारण्टी दी जानी चाहिए । खाद, कीटनाशक दवाओं, औजारों आदि की खरीद के लिए कृषकों को आर्थिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए ।


13. शिक्षा के प्रसार से कृषकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन -

शिक्षा के प्रचार, विशेषतया सामाजिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा के विस्तार एवं प्रचार द्वारा कृषकों के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया जाना चाहिए और उन्हें खेती के उन्नत तरीकों को अपनाने तथा आर्थिक विकास के कार्य के लिए तैयार करना चाहिए ।


14. अन्य सुझाव -

  • गहन कृषि एवं बहुफसली कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाए ।
  • कृषि उपज के निर्यातों को बढ़ाने के प्रयास किए जाएँ ।
  • सहकारी कृषि सुविधाओं का विस्तार किया जाए ।
  • पशुओं की हीन दशा को सुधारने के प्रयत्न किए जाएँ ।
  • विकास कार्यक्रमों में समन्वय व सहयोग स्थापित किया जाए ।


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भारतीय कृषि की क्या क्या समस्यायें है? | problems of indian agriculture in hindi


भारत कृषि प्रधान देश है, परन्तु यहाँ कृषि की दशा सन्तोषजनक नहीं है ।

कृषि उत्पादन में वृद्धि पूर्व में जनवृद्धि दर से भी कम रहा । इसी कारण 1975 ई ० तक देश में खाद्य समस्या भी जटिल बनी रही ।


भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याएं -

  • भूमि पर जनसंख्या का बढ़ता दबाव
  • भूमि का असन्तुलित वितरण
  • कृषि का न्यून उत्पादन
  • उत्पादन की परम्परागत तकनीक
  • खाद्यान्न फसलों की प्रमुखता
  • मानसून पर निर्भरता
  • श्रम प्रधान व्यवसाय
  • विपणन की कमी

निम्न स्तर पर सीमित विकास के बावजूद आज भी भारतीय कृषि परम्परावादी है ।

वस्तुतः भारतीय किसान खेती व्यवसाय के रूप में न करके जीविकोपार्जन एवं परिवार पालन के लिए करता है ।


भारतीय कृषि की प्रमुख समस्यायें निम्न प्रकार हैं -


1. भूमि पर जनसंख्या का बढ़ता दबाव

भारत में जनसंख्या तीव्रता से बढ़ रही है । ऐसे में भारत भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जा रहा है । जनसंख्या वृद्धि के कारण प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता तथा जोत का औसत आकार घटता जा रहा है । वर्तमान में भारत का औसत जोत का आकार 1.41 हेक्टेयर तथा प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता मात्र 0.3 हेक्टेयर है । इन अनार्थिक जोतों में परम्परागत फसलों की खेती करना लाभकारी नहीं है । साथ हो आधुनिक तकनीकों को अपनाया जाना भी सुलभ नहीं है ।


2. भूमि का असन्तुलित वितरण

भूमि पर जनसंख्या के भारी दबाव, ऊँचे जनघनत्व तथा उत्तराधिकार के दोषपूर्ण नियमों से भूमि का उपविभाजन एवं अपखण्डन होने से प्रति व्यक्ति खेती योग्य भूमि कम होती जा रही है और कृषि भूमि का वितरण अत्यन्त असन्तुलित होता जा रहा है । देश में आज भी 7 प्रतिशत किसानों के पास समस्त कृषि भूमि का 40 प्रतिशत है जबकि 62 प्रतिशत किसानों के पास कुल कृषि भूमि का मात्र 17 प्रतिशत ही है ।


3. कृषि का न्यून उत्पादन

भारत में अन्य देशों की तुलना में प्रति श्रमिक तथा प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम है । उदाहरणस्वरूप भारत में 2010-11 में प्रति हेक्टेयर गेहूँ का उत्पादन 2,938 किग्रा०, चावल का उत्पादन 2,240 कि॰ग्रा ० तथा मूंगफली का उत्पादन 1,268 कि० ग्रा० था जबकि ब्रिटेन में इसी दौरान गेहूँ का उत्पादन 7,780 कि० ग्रा०, चावल का उत्पादन अमेरिका में 7,450 कि० ग्रा० तथा मूंगफली का उत्पादन अमेरिका में 3,540 कि० ग्रा० प्रति हेक्टेयर रहा । श्रम उत्पादन के सम्बन्धों की दृष्टि से भी भारत पिछड़ रहा है । भारत में प्रति श्रमिक उत्पादकता 403 डॉलर है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में 27,058 डॉलर एवं जापान में 26,557 डॉलर है ।


4. उत्पादन की परम्परागत तकनीक

भारतीय कृषि की एक अन्य बड़ी समस्या यहाँ अभी भी अधिकांशत: खेती की पुरानी तकनीकों का प्रयोग किया जाना है । यहाँ अभी भी लकड़ी के हल एवं खुरपी, फावड़े का वृहद प्रयोग किया जा रहा है जबकि उन्नत देशों में कृषि शक्ति चलित यंत्रों एवं उन्नत तकनीकों के प्रयोय से हो रही है ।


5. खाद्यान्न फसलों की प्रमुखता

भारतीय कृषि में खाद्यान्न फसलों की प्रमुखता है । यहाँ कृषि हेतु प्रयोग में लाई जाने वाली कुल भूमि में से लगभग 61 प्रतिशत भाग खाद्यान्न फसलों के उत्पादन में काम आता है तथा शेष 39 प्रतिशत भाग अन्य व्यावसायिक फसलों के काम में लाया जाता है । देश के कृषि उत्पादन में खाद्यान्नों का योगदान लगभग 62 प्रतिशत है ।


6. मानसून पर निर्भरता

भारतीय कृषि को मानसून का जुआ कहा जाता है । यदि वर्षा अच्छी हो जाती है तो कृषि में उत्पादन बढ़ जाता है । इसके विपरीत यदि वर्षा कम होती है तो कृषि उत्पादन काफी कम होता है । नियोजन के 60 वर्षों के उपरान्त अभी भी कुल कृषि भूमि का लगभग 56 प्रतिशत क्षेत्र मानसून पर निर्भर है । इस भाँति, यहाँ अभी भी कुल कृषि योग्य भूमि का 46 प्रतिशत भाग ही सिंचित है ।


7. श्रम प्रधान व्यवसाय

भारतीय कृषि एक श्रम प्रधान व्यवसाय है । इसमें पूंजी की अपेक्षा श्रम का अधिक प्रयोग होता है । इसका एक कारण कृषि जोतों का बहुत छोटा होना है, जिसमें यन्त्रों का प्रयोग नहीं हो पाता तथा दूसरा कारण कृषकों का निर्धन होना है, जिनके पास कृषि यन्त्रों एवं उपकरणों के लिए पर्याप्त पूँजी का अभाव रहता है । जनसंख्या अधिकता से उत्पन्न हुई बेरोजगारी एवं संयुक्त परिवार प्रणाली के कारण भी कृषि में आवश्यकता से अधिक श्रमिक लगे है ।


8. विपणन की कमी

भारत में कृषि में उत्पादन तथा उत्पादकता दोनों कम हैं । पूँजी एवं अन्य सुविधाओं के अभाव में यहाँ किसान उतना ही उत्पादन कर पाता है जितना कि उसे अपनी पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक होता है । उसके पास विपणन अधिक्य या तो रहता ही नहीं और यदि रहता भी है तो बहुत कम । इस प्रकार स्पष्ट है कि भारतीय कृषि व्यवसाय नहीं वरन जीविकोपार्जन का साधन है ।


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