पौधों की वृद्धि एवं विकास में अन्तर अथवा इन्हें प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

सामान्यतः पौधों का आकार, ऊंचाई, शुष्क भार एवं आयतन इत्यादि पौधों की वृद्धि (plant growth in hindi) के प्राचल माने जाते है, कोशिका विभाजन तथा कोशिका कोशिका दीर्घीकरण वृद्धि की प्रक्रिया को प्रदर्शित करते हैं ।

जबकि अर्न्तकोशिकीय पदार्थों का संश्लेषण एवं उपकोशिकीय कोशिकांगो की व्यवस्था पौधे के विकास (plant development in hindi) को प्रदर्शित करती है, इसमें कोशिका विभेदन की क्रिया सम्मिलित है । पौधे का विकास कोशिका विभाजन, कोशिका दीर्घीकरण तथा कोशिका विभाजन की क्रियाओं में परिलक्षित होता है ।

पौधों की वृद्धि एवं विकास में क्या अन्तर है? | difference between growth and development of plants in hindi.

पादप वृद्धि एवं विकास (plant growth and development in hindi) -  पादप वृद्धि का अर्थ पौधे के आकार, भार एवं आयतन से होता है जबकि पौधे का विकास एक ऐसी अवस्था है जिसमें अंकुरण से परिपक्वता तक पौधा विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरता है ।

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पौधों की वृद्धि एवं विकास में अन्तर अथवा इन्हें प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

पौधों की वृद्धि एवं विकास में अन्तर -


पौधों की वृद्धि (plant growth in hindi) -

  • पौधे के आकार में वृद्धि सामान्यतः उसकी ऊँचाई, शुष्क भार तथा प्रोटोप्लाज्म में वृद्धि का सूचक है ।
  • पौधों की वृद्धि मात्रात्मक (quantitative) होती है ।
  • पौधे की वृद्धि को मापा जा सकता है ।

पौधों का विकास (plant development in hindi) -

  • यह पौधे में आकार, आकृति तथा रूप आदि में परिवर्तन का सूचक है ।
  • पौधे का विकास गुणात्मक (qualitative) रूप में होता है ।
  • पौधे के विकास का गुणात्मक आधार पर आंकलन किया जा सकता है ।


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पौधों की वृद्धि या पादप वृद्धि किसे कहते है इसकी परिभाषा लिखिए? | defination of plant growth in hindi

पौधे की वृद्धि में नई कोशिकाओं का निर्माण, कोशिकाओं के आकार, आयतन, संख्या और उत्पादन में वृद्धि सम्मिलित है ।

अतः पादप वृद्धि दर को प्रति इकाई समय में उसकी ऊँचाई, भार अथवा आयतन में वृद्धि द्वारा प्रदर्शित किया जाता है । पौधों में वृद्धि की प्रक्रिया विभाज्योतक (meristem) कोशिकाओं में होती है । ये कोशिकायें जड़ों व तनों पर पाई जाती है और इनसे पौधे की प्राथमिक वृद्धि होती है ।

वृद्धि की प्रक्रिया में कोशिका विभाजन (cell division), कोशिका दीर्घीकरण (cell elongation), तथा कोशिका विभेदन (cell differentiation) आदि क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं ।

पादप वृद्धि की परिभाषा (defination of plant growth in hindi) - 

"सामान्यतः पादप वृद्धि का अर्थ पौधे के आकार, भार और आयतन में वृद्धि से है ।"

"The growth of any plant means the quantitative increase in it's size, weight and volume."


पादप वृद्धि के विभिन्न चरण लिखिए? | different phases of plant growth in hindi

पौधे का विकसित रूप उसके विकास के विभिन्न चरणों का प्रतिफल है । इसमें पादप वृद्धि की विभिन्न अवस्थाएँ सम्मिलित हैं । प्रारम्भ में परिपक्व बीज से भ्रूण (embryo) निकलता है । इसके बाद की अवस्थाओं में भ्रूण की सक्रियता (activeness), निर्गमन (emergence), अंकुरण, जड़, तना, पत्तियाँ, फूल, फल, बीज, शुष्क पदार्थ तथा उपज सम्मिलित हैं ।

वृद्धि की ये विभिन्न अवस्थायें बहुत से वातावरण सम्बन्धी कारकों द्वारा भी प्रभावित होती हैं । यह एक जटिल प्रक्रिया है । इसके विभिन्न चरणों को अग्र प्रवाहचित्र (flow chart) द्वारा दर्शाया गया है -

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पादप वृद्धि के विभिन्न चरण
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पादप वृद्धि का प्रकाश संश्लेषण व श्वसन से सम्बन्ध | relation of plant growth with photosynthesis and respiration in hindi


( A ) प्रकाश संश्लेषण से सम्बन्ध ( Relation with photosynthesis ) -

प्रकाश संश्लेषण की क्रिया कार्बनिक तथा अकार्बनिक यौगिकों में सम्बन्ध स्थापित करती है । इस क्रिया में अकार्बनिक यौगिक जैसे जल व कार्बन डाइ आक्साइड पौधे में मिलकर, कार्बनिक यौगिकों जैसे सुक्रोज तथा स्टार्च का निर्माण करते हैं । यह क्रिया सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में होती है और इस क्रिया द्वारा सौर ऊर्जा, रसायनिक ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है । प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पौधे की वृद्धि व विकास के लिये आवश्यक पदार्थों की आपूर्ति करती है । अतः पौधे अपने भोज्य पदार्थों के निर्माण के लिये निरन्तर सौर ऊर्जा का अधिकतम उपभोग कर तीव्र वृद्धि का प्रयास करते रहते हैं ।

प्रकाश संश्लेषण की रसायनिक समीकरण निम्न प्रकार है -
6CO2 + 12H2O sunlight chlorophyll C6H1206 + 6H2O +602 Glucose

प्रकाश संश्लेषण की क्रिया तीन चरणों में पूर्ण होती है -

  • पौधे द्वारा कार्बन डाइ आक्साइड ग्रहण करना ।
  • फोटोलिसिस (photolysis) की प्रक्रिया ।
  • CO2 का अपचयन (reduction)


1. पौधों द्वारा CO, ग्राहण करना ( Absorption of CO2 by Plants ) –

वातावरण में पाई जाने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड मुख्यतः पौधे की पत्तियों द्वारा उसके अन्दर प्रवेश करती है । पत्तियों की बाह्य परत द्वारा उत्पन्न बाधा को पार कर यह CO2 खुले, आंशिक रूप से खुले अथवा पूर्ण रूप से बंद रन्द्रों में पहुँचती है ।

तत्पश्चात् यह CO, रन्ध्रों के कूप से होकर मीजोफिल कोशिकाओं (mesphyll cells) में पहुँचती है । यह प्रकाश संश्लेषण की क्रिया का वास्तविक स्थान होता है । पौधों में CO, के प्रवेश को वायु तथा मौजोफिल कोशिकाओं के बीच CO, की मात्रा प्रभावित करती है । यदि वायुमण्डल में CO2 की मात्रा अधिक है तथा पौधे की मौजोफिल कोशिकाओं में CO, की मात्रा कम है, तो CO2 प्रवेश इन कोशिकाओं में तीव्रता से होता है और प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को तेज करता है ।


2. फोटोलिसिस ( Photolysis ) –

फोटोलिसिस की क्रिया में प्रकाश के अवशोषण द्वारा जल हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन के आयनों में विभाजित हो जाता है । हाइड्रोजन आयन (H +) NADP (Nicotinamide Adenine Dinucleotide Phosphate) के साथ संयुक्त होकर NADPH में परिवर्तित हो जाता है ।

NADP + H + → NADPH + ऊर्जा

इस प्रक्रिया में मुक्त हुई ऊर्जा ADP को ATP में बदलने में काम आती है ।


3. CO2 का अपचयन ( Reduction of CO2 ) -

यह प्रक्रिया प्रकाश की उपस्थिति तथा अनुपस्थिति दोनों अवस्थाओं में होती है । इसमें ATP द्वारा दी गई ऊर्जा , कार्बन डाई ऑक्साइड व हाइड्रोजन संयुक्त होकर कार्बोहाइड्रेट का निर्माण करते हैं । यहाँ CO2 के अपचयन की विधि के आधार पर पौधों को C, C, व CAM आदि वर्गों में विभाजित किया जाता है -

( B ) श्वसन क्रिया ( Respiration Process ) -

श्वसन प्रकाश संश्लेषण के विपरीत क्रिया है । श्वसन की प्रक्रिया निम्न समीकरण द्वारा व्यक्त की जाती है ।

6CO2 + 6H2O C6H1206 + 602 (glucose)

पौधों में विभिन्न जैविक व रसायनिक क्रियाओं के संचालन के लिये श्वसन की क्रिया आवश्यक ऊर्जा की पूर्ति करती है । यह जटिल यौगिकों के विकास में भी सहायक होती है । श्वसन की प्रक्रिया के लिये प्रकाश की उपस्थिति आवश्यक नहीं है । यदि श्वसन प्रकाश की उपस्थिति में हो तो इसे प्रकाशीय श्वसन (photo respiration) कहते हैं और यदि प्रकाश की अनुपस्थिति में हो तो उसे अप्रकाशीय श्वसन (dark respiration) कहते हैं । अप्रकाशीय श्वसन C3, व C4, दोनों वर्गों के पौधों में तथा प्रकाशीय अपघटन केवल C3 वर्ग के पौधों में होता है ।

पौधे की वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक लिखिए?

पौधे की वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित है -


वातावरण सम्बंधित कारक ( Environmental factors )

1. जलवायु सम्बन्धी कारक -

  • तापमान
  • प्रकाश
  • वर्षा
  • वायु
  • आपेक्षिक आद्रता
  • क्षेत्र की स्थिति का प्रभाव

2. मृदा सम्बन्धी कारक -

  • मृदा रचना
  • मृदा संरचना
  • मृदा ताप
  • मृदा नमी
  • मृदा उर्वरता
  • मृदा वायु
  • भूमि का pH
  • जीवांश पदार्थ
  • मृदा कटाव

फसल सम्बंधित कारक ( Crop related factors )

  • जाति का चुनाव
  • बुवाई का समय
  • बीज व अंतरण
  • बीज की गुणवत्ता
  • वाष्पी-वाष्पोत्सर्जन
  • पोषक तत्व

पौंधों की बनावट, वृद्धि तथा विकास पर प्रभाव डालने वाले कारकों में भोगोलिक कारक (geographical factors), मृदा सम्बन्धी कारक (edaphic factors) व फसल सम्बन्धी कारक (crop factors) सम्मिलित हैं, जिन्हें कृषक द्वारा फसल की उत्पादकता को बढ़ाने के लिये विभिन्न प्रकार से उपयुक्त बनाया जाता है ।

इन कारकों का विस्तृत वर्गीकरण निम्न चार्ट में दर्शाया गया है -

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पौधे की वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारक


वातावरण सम्बन्धी कारक ( Environmental Factors )

पौधों की वृद्धि तथा विकास पर प्रभाव डालने वाले वातावरण सम्बन्धी कारकों में भौगोलिक तथा जलवायु सम्बन्धी कारक महत्वपूर्ण हैं ।


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( 1 ) भौगोलिक कारक ( Geographical Factors ) -

भौगोलिक कारकों में जलवायु सम्बन्धी कारक तथा क्षेत्र की स्थिति सम्बन्धी कारक पौधे की वृद्धि को प्रभावित करते हैं ।


जलवायु सम्बन्धी कारक ( Climatic Factors ) -

( i ) तापमान ( Temprature ) -

वायुमण्डल का कम या अधिक तापमान पौधों की वृद्धि को बहुत प्रभावित करता है । पौधों में होने वाली विभिन्न प्रकार की क्रियाओं के लिये एक उपयुक्त तापमान आवश्यक होता है । इससे पौधों की क्रियाशीलता बढ़ती है तथा उसमे सभी क्रियाओं की गति तीव्र हो जाती है । प्रत्येक पौधे के लिये निम्न व उच्च तापमान का एक परिसर होता है ।

पौधों के लिये कम (minimum), उपयुक्त (optimum) व अधिक (maximum) तापमान की एक निश्चित सीमा होती है । अधिकतर पौधों की वृद्धि 5°C से 40°C तापमान पर होती है । अधिक तापमान पर नियंत्रण हेतु वायु रोधक पट्टियों व भल्द आदि का प्रयोग करना चाहिए तथा कम तापमान होने पर बुवाई के समय समन्वय स्थ करना चाहिये ।


( ii ) प्रकाश ( Light ) -

सूर्य का प्रकाश पौधों की वृद्धि को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक है । प्रकाश की उपस्थिति में पौधों में प्रकाश - संश्लेषण की क्रिया होती है । कम सघनता (low intensity) वाले प्रकाश से प्रकाश - संश्लेषण की दर कम हो जाती है । अधिक उपज के लिये पौधे की जनन अवस्था (reproductive phase) में सौर ऊर्जा का होना नितान्त आवश्यक है ।

अधिक सघनता वाला प्रकाश विभिन्न प्रकार से फसलों को हानि पहुँचाता है । इससे श्वसन की क्रिया तीव्र होने लगती है और प्रकाश संश्लेषण व श्वसन का संतुलन बिगड़ जाता है । किसी पौधे की वृद्धि के लिये प्रकाश की सघनता, मात्रा, गुणवत्ता और अवधि प्रमुख प्रकाशीय घटक हैं । प्रकाश का अधिकतम लाभ लेने के लिये फसल की बुवाई की दिशा में परिवर्तन तथा उचित अन्तरण (spacing) आवश्यक है ।


( iii ) वर्षा ( Rainfall ) -

किसी क्षेत्र की वनस्पति को वहाँ होने वाली वर्षा प्रभावित करती है । विश्व का लगभग तीन चौथाई क्षेत्रफल फसल उत्पादन के लिये वर्षा पर निर्भर करता है । भारत में लगभग 70% कृषिकृत भूमि वर्षा पर आश्रित है । वर्षा की मात्रा, सघनता, अवधि, वर्षा के दिनों की संख्या तथा उसकी बारम्बारता (frequency) आदि वर्षा सम्बन्धी कारक पौधे की वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करते हैं ।

पौधे की क्रान्तिक अवस्था (critical stage) पर उपयुक्त वर्षा का होना विशेषतः शुष्क क्षेत्रों में बहुत अधिक लाभकारी होता है । कम वर्षा होने पर सिंचाई व नमी संरक्षण तथा वर्षा जल का उचित प्रबन्ध करना आवश्यक होता है; जबकि अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निकास का उचित प्रबन्ध होना आवश्यक है ।


( iv ) वायु ( Wind ) –

पौधे की वृद्धि पर वायु का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव होता है । वायु की गति उस्वेदन (transpiration) की क्रिया को प्रभावित करती है, जिससे पौधों द्वारा CO ग्रहण करने की प्रक्रिया पर भी प्रभाव पड़ता है । हल्की मध्यम वायु से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में CO2 का उपभोग बढ़ जाता है । पौधों द्वारा अधिक मात्रा में CO2 ग्रहण करने पर प्रकाश संश्लेषण की क्रिया तीव्र गति से होती है ।

वायु साथ बीजों परागण (pollination) में एवं की प्रकीर्णन (dissemination) भी होता है । तेज व गर्म हवाओं के कारण पौधों में जल कमी हो जाती है और उनकी वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । शुष्क हवाएँ वायु की नमी को कम करती हैं और उस्वेदन दर को बढ़ा देती हैं । अतः शुष्क क्षेत्रों में उचित फसलों का चुनाव करना चाहिये ।


( v ) आपेक्षिक आर्द्रता ( Relative Humidity ) -

बहुत से पौधे उच्च वायुमण्डलीय आर्द्रता पर भली - भाँति उगते हैं क्योंकि इस अवस्था में उस्वेदन की क्रिया रुक जाती है । रात्रि के समय उच्च आर्द्रता पौधों की वृद्धि के लिये बहुत लाभकारी होती है । वायुमण्डल में अधिक आर्द्रता होने से पौधों की जल प्रयोग की क्षमता बढ़ जाती है । टच्च आर्द्रता लम्बी अवधि तक रहने पर पौधों में कीटों व बीमारियों का प्रकोप बढ़ने लगता है ।


क्षेत्र की स्थिति का प्रभाव ( Effect of lucation of the area ) –

किसी क्षेत्र की जलवायु अक्षांश (latitude), स्थलाकृति, भूमि का वितरण व समुद्र की लहरों जैसे कारकों द्वारा भी प्रभावित होता है । विश्व के सभी जलवायु क्षेत्रों को अक्षांश के आधार पर विभाजित किया गया है । वाला भूमध्य रेखा पर कम दबाव कारण वहाँ के तापमान दूरी बढ़ने वाला क्षेत्र व उससे वर्षा में पर क्षेत्र होने के अधिक दबाव एवं परिवर्तन होता रहता है । भूमध्य रेखा के पास के आसपास वाले क्षेत्रों में गर्म व नर्म हवाओं के कारण अधिक वर्षा होती है । समुद्र वाले क्षेत्रों में व महाद्वीप पर भी मौसमीय तापमान में भिन्नता होने के कारण वर्षा का वितरण भी असमान होता है ।

भूमि की ऊपरी सतह की प्रकृति भूमि का धरातल सम्बन्धी गुण है । अक्षांश में वृद्धि होने से तापमान में कमी, वायु की तीव्र गति और वर्षा अधिक होती है । पर्वतीय क्षेत्रों तापमान कम व वायुमण्डल के नीचे की परत में वायु की गति कम हो जाती है । समुद्र की धाराएँ हजारों किलोमीटर दूर से वायुमण्डल की नमी को लाकर उस क्षेत्र में नमी व तापमान में वृद्धि कर देती हैं जिसका परिणाम समुद्र की लहरों द्वारा अधिक वर्षा होना है ।


( 2 ) मृदा सम्बन्धी कारक ( Edaphic Factors ) -

भूमि को ऊपरी सतह को मृदा क हैं । इसी सतह में पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिये आवश्यक पोषक तत्व, नमी व ऑक्सीजन विद्यमान रहते हैं ।


मृदा सम्बन्धी कारकों का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार हैं -

( i ) मृदा रचना ( Soil Texture ) -

मृदा रचना का अर्थ उसमें उपस्थित बालू, सिल्ट तथा चिकनी मिट्टी के कणों की सापेक्ष मात्रा से है । मिट्टी के कणों के आकार के आधार पर इसको विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जाता है । मृदा रचना के अध्ययन से उसके बहुत से गुणों की जानकारी मिलती है ।

मृदा रचना का फसलों के प्रबन्ध, वृद्धि एवं उपज पर प्रभाव पड़ता है । मृदा रचना भूमि में जल निकास, जल अवशोषण, जल धारण, पोषक तत्व की मात्रा, वायु संचार, मृदा ताप, पौधों की वृद्धि, भू - परिष्करण क्रियाओं व पौधों में होने वाली जैविक व रसायनिक क्रियाओं पर प्रभाव डालती है ।


( ii ) मृदा संरचना ( Soil Structure ) -

पौधों की वृद्धि के लिये भूमि में नमी और O, का समन्वय स्थापित करना मृदा संरचना पर निर्भर करता है । यह एक ऐसा गुण है जिससे भू - परिष्करण, जल निकास, उर्वरक उपयोग, जैविक पदार्थों का प्रयोग, चूने का प्रयोग, फसल चक्र आदि क्रियाओं का इस पर प्रभाव होता रहता है ।


( iii ) मृदा ताप ( Soil Temperature ) -

पौधों की वृद्धि और विकास भूमि में होने वाली रसायनिक एवं जैविक क्रियाओं के द्वारा प्रभावित होती रहती है । बीजों के अंकुरण से लेकर फसल की कटाई तक विभिन्न प्रकार के तापमान परिसर की आवश्यकता होती है । खरीफ की फसलों में अंकुरण के लिये तापमान परिसर 30-35°C व रबी की फसलों में 20-30°C होता है ।

प्रतिकूल तापमान होने पर बीजों का अंकुरण कम होता है व पौधों में होने वाली रसायनिक एवं जैविक क्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिससे मृदा में रहने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं की क्रियाशीलता बंद हो जाती है और पौधों की वृद्धि शिथिल हो जाती है ।


( iv ) मृदा नमी ( Soil Moisture ) -

पौधों की वृद्धि एवं विकास हेतु जल की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति हेतु पौधे भूमि में उपलब्ध जल को गृहण करते रहते हैं । भूमि में नमी की कमी होने पर पौधों की शारीरिक क्रियाएँ जैसे प्रकाश संश्लेषण, श्वसन, वाष्पोत्सर्जन (transpiration), पोषक तत्वों की उपलब्धता एवं अवशोषण व कोशिका वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिससे पौधों की वृद्धि व बढ़वार रुक जाती है ।


( v ) मृदा उर्वरता ( Soil Fertility ) -

भूमि में पोषक तत्वों की उपलब्धता एवं पर्याप्त मात्रा में नमी होने पर भूमि को उर्वर कहा जाता है । ऐसी भूमि में उगे हुए पौधों की वृद्धि भली - भाँति होती है । इसके विपरीत पोषक तत्व व नमी के अभाव में पौधों की वृद्धि शिथिल हो जाती है ।


( vi ) मृदा वायु ( Soil Air ) -

फसलों की अच्छी पैदावर के लिये भूमि में उचित नमी व वायु का संतुलन होना आवश्यक है । ऐसी स्थिति में पौधों की जड़ें, सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता व अन्य रसायनिक प्रक्रियाएँ सुगमतापूर्वक होती रहती हैं तथा पौधों की अच्छी वृद्धि होती है । भूमि में नमी व वायु का संतुलन बिगड़ने पर सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता रुक जाती है तथा कार्बनिक पदार्थों का ऑक्सीकरण व अन्य क्रियाएँ बन्द हो जाती हैं ।


( vii ) भूमि की pH ( pH of Soil ) -

भूमि के pH मान का पौधों की वृद्धि से गहरा सम्बन्ध है । उदासीन भूमि का pH मान 7 होता है । यह मान 7 से कम होने पर भूमि अम्लीय कही जाती है व 7 से अधिक होने पर भूमि लवणीय व क्षारीय होती है ।

सामान्यतः उदासीन pH मान पर फसलों की वृद्धि पर्याप्त मात्रा में होती है । pH मान में परिवर्तन होने पर पौधों की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिसका कारण पोषक तत्वों की उपलब्धता में कमी व भूमि में सूक्ष्म जीवाणुओं की निष्क्रियता का होना है ।


( viii ) जीवांश पदार्थ ( Organic Matter ) -

भूमि में जीवांश पदार्थ की पर्याप्त मात्रा होने पर पौधों की उचित वृद्धि होती है । भूमि में जीवांश पदार्थ का अपघटन लगातार होते रहने के कारण विभिन्न पोषक तत्व धीरे - धीरे पौधों को उपलब्ध होते रहते हैं ।


( ix ) मृदा कटाव ( Soil Erosion ) -

कटाव से प्रभावित भूमि पर उगाई गई फसल के पौधों की कम वृद्धि होती है जबकि समतल व कटाव रहित भूमि पर पौधे भरपूर मात्रा में वृद्धि करते हैं ।


( B ) फसल सम्बन्धी कारक ( Crop Related Factors )

( 1 ) जाति का चुनाव ( Selection of varieties ) –

फसलों की ऐसी जाति का चुनाव करना चाहिये जो उस क्षेत्र के लिये उपयुक्त हो । ऐसी अवस्था में उस जाति के पौधों की अधिक वृद्धि होती है ।


( 2 ) बुवाई का समय ( Sowing time ) -

प्रत्येक फसल की बुवाई का एक उपयुक्त समय होता है । उस समय से पूर्व व देरी से बुवाई करने पर बीज अंकुरण व वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।


( 3 ) बीजदर व अन्तरण ( Seed rate & spacing ) -

बीज दर में वृद्धि से प्रति इकाई क्षेत्रफल में पौधों की संख्या अधिक होती है । पौधों में परस्पर प्रतिस्पर्धा के कारण उनकी वृद्धि कम होती है । अधिक अन्तरण पर बुवाई करने से प्रति इकाई क्षेत्रफल में पौधों की संख्या में कमी आती है जबकि पौधों की वृद्धि भरपूर मात्रा में होती है ।


( 4 ) बीज की गुणवत्ता ( Seed quality ) –

उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज की बुवाई करने पर पौधों की वृद्धि एवं उपज बढ़ जाती है ।


( 5 ) वाष्पी - वाष्पोत्सर्जन ( Evapo - transpiration ) -

सिंचाई उचित समय पर करने से पौधों का ET मान बढ़ता है और उपज में वृद्धि होती है । सिंचाई की गहराई व बारम्बारता (frequency) भी पौधों की वृद्धि को प्रभावित करते हैं ।


( 6 ) पोषक तत्व ( Plant nutrients ) -

भूमि में प्रयोग किये जाने वाले पोषक तत्वों का संतुलित मात्रा में उचित समय पर उपयुक्त विधि द्वारा प्रयोग करने से पौधों की तीव्र वृद्धि होती है और उपज बढ़ती है । स्थाई रूप से उत्पादन बढ़ाने के लिये कार्बनिक व अकार्बनिक खादों का समन्वित प्रयोग करना चाहिये ।


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पौधों की वृद्धि के प्रारूप को स्पष्ट कीजिये? growth pattern of plants in hindi


पौधों की वृद्धि का प्रारूप: S वक्र ( Growth pattern of plants: S Curve ) -

किसी पौधे के सम्पूर्ण जीवनचक्र में वृद्धि की माप उसके आकार (size), ऊँचाई (height) अथवा शुष्क भार (dry weight) द्वारा की जाती है । पौधे के सम्पूर्ण जीवनकाल उसकी वृद्धि और उसकी आयु के बीच वक्र खींचने पर S के आकार के समान वक्र प्राप्त होता है जिसे पादप वृद्धि का S वक्र (S curve of plant growth) कहते हैं ।

यह वक्र पौधे की वृद्धि का प्रारूप होता है । इसे अवग्रहरूपी पादप वृद्धि वक्र (sigmoid plant growth curve) भी कहते हैं ।

यह निम्न चित्र में दर्शाया गया है -

पौधों की वृद्धि, पादप वृद्धि क्या है, पौधों का विकास, पौधों की वृद्धि एवं विकास में क्या अन्तर है, पादप वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करने वाले कारक
पौधों की वृद्धि के प्रारूप

पौंधे के विभिन्न अंगों तथा अन्य जीवों पर भी यह वक्र समान रूप से लागू होता है ! यहाँ पौधे की वृद्धि के कुल समय को पौधे के जीवन का सम्पूर्ण वृद्धि काल (gross period of growth) कहते हैं ।

इसे निम्न तीन अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है -

  • अवस्था I : मन्द वृद्धि काल ( Slow growth period )
  • अवस्था II : तीव्र वृद्धि काल ( Rapid growth period )
  • अवस्था III : न्यूनतम वृद्धि काल ( Least growth period )

सामान्यतः अंकुरण के प्रारम्भ होने से पहले थोड़ा सा शुष्क भार घटता है क्योंकि अंकुरण के समय बीज में संग्रहित भोज्य पदार्थों का उपभोग होता है ।

यह अवस्था I के मन्द वृद्धि काल को प्रदर्शित करता है । इसके बाद पौधे में नई पत्तियों में प्रकाश - संश्लेषण की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है और पौधा तेजी से वृद्धि करता है ।

यह अवस्था II के तीव्र वृद्धि काल को प्रदर्शित करता है । वृद्धि की यह दर पौधे की परिपक्वता की अवस्था तक बनी रहती है । इसके बाद यह वृद्धि कम होकर अन्ततः शून्य हो जाती है ।

यह अवस्था III के न्यूनतम वृद्धि काल को प्रदर्शित करता है ।

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