मौसम पूर्वानुमान क्या है (weather forecast in hindi) - कृषि में मौसम पूर्वानुमान क्यों आवश्यक है

मौसम पूर्वानुमान क्या है (weather forecast in hindi) - कृषि में मौसम पूर्वानुमान क्यों आवश्यक है
मौसम पूर्वानुमान क्या है (weather forecast in hindi) - कृषि में मौसम पूर्वानुमान क्यों आवश्यक है 


मौसम पूर्वानुमान क्या है (weather forecast in hindi)

मौसमीय घटनाओं जैसे वर्षा, बर्फ, ओला, पाला इत्यादि का पहले ही कुछ विधियों द्वारा अनुमान लगाना ही मौसम पूर्वानुमान (weather forecast in hindi) कहलाता है ।

फसलोत्पादन के लिए प्रयोग किए जाने वाले उपादानों से अधिकतम लाभ प्राप्त करने में कृषि क्रियाओं का पूर्व निर्धारण अत्यावश्यक है। अतएव उत्पादन की पूर्व योजना के लिए आगामी मौसम का ज्ञान अपरिहार्य होता है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि मौसम के सम्बन्ध में पूर्व ज्ञान कम से कम 3-4 माह की अवधि (फसल के जीवनकाल) के लिए उपलब्ध हो, जिससे फसल को बचाने के लिए समुचित प्रयास सम्भव हो सके। इसे लम्बी अवधि का पूर्वानुमान (Long range forcast) कहा जाता है ।

अनुभवों से तो बहुत कुछ कृषि कार्य नियन्त्रित होते हैं ही, परन्तु ऋतु परिवर्तन से भी कृषक लोग अपनी फसलों को अच्छा बना सकते हैं तथा हानि से बचा सकते हैं। पूर्वानुमान अध्ययन के पश्चात् रेडियो तथा समाचार-पत्रों इत्यादि से प्रसारित किये जाते हैं। वर्षा का होना, बादलों का बनना, अधिक गति से हवा का बहना, तूफान अथवा आधी का आना, ओस और पाला पड़ना, इत्यादि समाचार हमको पूर्वानुमान से प्राप्त होते हैं। इनसे हमको विभिन्न परिस्थितियों के लिए तत्पर व सजग रहने में बड़ी सहायता मिलती है, जिससे कृषक अपने कार्यों को उसी के अनुसार स्थिगित अथवा प्रारम्भ कर सकता है अथवा सुरक्षा की व्यवस्था कर सकता है ।

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मौसम पूर्वानुमान कितने प्रकार के होते है? | types of weather forecast in hindi

मौसम पूर्वानुमान मुख्य्त: तीन प्रकार के होते है -

  • अल्प अवधि के पूर्वानुमान
  • मध्यम अवधि के पूर्वानुमान
  • दीर्घकालिक पूर्वानुमान


  • अल्प अवधि के पूर्वानुमान (Short range forcasts) - इनकी वैद्यता केवल 3 दिनों के लिए होती है।
  • मध्यम अवधि के पूर्वानुमान (Medium range forecasts) - इन सूचनाओं की वैधता 3 से लेकर 10 दिनों तक के लिए होती है। इस प्रकार की सूचनाए साप्ताहिक मौसम समाचार (Weekly agrometeorological bulletin) द्वारा प्रकाशित की जाती हैं। मौसमी कृषि मौसम समाचार क्षेत्रीय आधार पर प्रकाशित किया जाना चाहिए एवम् तद्नुरूप परामर्श दिए जाने चाहिए। इसमें निम्नलिखित बातों का समावेश किया जाना आवश्यक है- जितने दिनों का समाचार प्रसारित किया जा रहा है उसके प्रारम्भिक काल से लेकर अन्तिम समय के मौसम का सन्देश। खड़ी फसलों की दशा एवम् वृद्धि की अवस्थाओं में आने वाली सम्भावित विकृतियाँ। फसलों की वृद्धि एवम् कृषि क्रियाओं पर मौसमी पूर्वानुमान से आशंकित स्थितियों की प्रभाविता ।
  • दीर्घकालिक पूर्वानुमान (Satellite weather forecasting) - इस प्रकार के पूर्वानुमान के अन्तर्गत किसी क्षेत्र/प्रदेश की सामान्य मौसमी गतिविधियों को उसके पूर्व की मौसमी स्थिति से तुलना करके अगले 5-6 महीनों के मौसम की भविष्यवाणी की जाती है। किन्हीं - किन्हीं अवस्थाओं में किसी निश्चित क्षेत्र की जलवायु के घटकों की विश्व के अन्य भागों की विगत जलवायु से तुलना करके निष्कर्ष निकाला जाता है। इस प्रकार मौसमी तत्वों में सह- समय सम्बन्ध स्थापित करके आगामी मानसून की भविष्यवाणी की जाती है।


मौसम पूर्वानुमान की विधियां | methods of weather forecasting in hindi

मौसम की भविष्यवाणी की विधियों को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभक्त करते हैं-

  • परम्परागत अथवा संक्षिप्त विधि (Conventional or Synoptic Method) — इस विधि के अन्तर्गत एक बड़े क्षेत्र में चल रही मौसमी घटनाओं का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है। इसमें तात्कालिक मौसमी घटनाक्रम का भूतकाल में घटी समरूप घटनाओं से तुलना करके, यह मानकर कि वर्तमान में चल रहे मौसमी घटनाक्रम पूर्व की भांति समरूप आचरण करेंगे, पूर्वानुमान का प्रारूप तैयार करते हैं। आमतौर पर इस प्रकार की भविष्यवाणी करने के लिए भूतकाल के समरूप घटनाक्रम का चुनाव पूर्वानुमानकर्ता की स्मृति एवम् अनुभव पर आधारित होता है। वर्तमान समय में कम्प्यूटर के विकास के कारण समरूप स्थितियों का चुनाव शीघ्र एवम् सही रूप में करने में सहायता मिली है। यह विधि अल्प अवधि की भविष्यवाणी ( Short range forcasting) के लिए उपयोग में लाई जाती है।
  • सांख्यिकीय विधि (Statistical Method) — इस विधि में समाश्रयण समीकरण (Regression equation) अथवा सांख्यिकीय विधियों द्वारा विभिन्न मौसमी तत्वों की तीव्रता एवम् मौसमी परिवर्तन के बीच सहसम्बन्ध (Co-relation) स्थापित करते हैं। आमतौर पर भविष्यवाणी किए जाने वाले मौसम के घटक अथवा मौसम समष्टि (Weather parameters) का चुनाव मौसमी तत्वों के भौतिक सह-सम्बन्धों पर निर्भर करता है। उदाहरणस्वरूप वायुदाब, तापक्रम अथवा वायुमण्डलीय आर्द्रता में परिवर्तन के द्वारा वर्षा, वायु प्रवाह इत्यादि की परिकल्पना की जाती है। इस विधि द्वारा अल्पकालिक (Short range) एवम् दीर्घकालीक (Long range) दोनों ही प्रकार का पूर्वानुमान किया जाता है। वार्षिक वर्षा का पूर्वानुमान करने के लिए विभिन्न 16 समष्टि (Parameters) पर आधारित बहु-आयामी समाश्रयण समीकरण (Multiple regression equation) विकसित किए जाते हैं।
  • मौसम के पूर्वानुमान की आंकिक विधि (Numerical weather prediction method) — इस विधि में विभिन्न मौसमी घटकों जैसे वायु का संचलन वायुदाब, तापक्रम, आर्द्रता आदि के भौतिक नियमों पर आधारित वायुमण्डलीय परिवर्तनों से सम्बन्धित समीकरण तैयार किए जाते हैं। इन समीकरणों के आधार पर भविष्य में होने वाले मौसमी परिवर्तनों की कल्पना की जाती है। यह विधि मध्यकालिक पूर्वानुमान (Midium range forcast) के लिए उपयुक्त पाई गई है।

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कृषि में मौसम पूर्वानुमान क्यों आवश्यक है?

ऋतु-पूर्वानुमान के विषय में वराहमिहिर ने अपने कुछ अनुभव व्यक्त किये थे जो निम्नलखित हैं-

  • जब प्रभावमण्डल अर्थात् सूर्य अथवा चन्द्रमा के चारों ओर गोल प्रकाश मण्डल मयूर की ग्रीवा के रंग से समान दिखाई दे तो अत्यधिक वर्षा होगी।
  • जब गहरा शीशे के समान प्रभावमण्डल एक ही रंग का ही हो और उस्तरे की भाँति के बादल उसमें छितरे हों तो उसी दिन वर्षा होगी।
  • जब चन्द्रमा और एक नक्षत्र एक ही प्रभावमण्डल में बैठे हों तो तीन दिन के भीतर ही वर्षा होगी।
  • वर्षा रहित दिन में पूर्व दिशा में यदि इन्द्रधनुष दिखाई देता है तो वर्षा होगी और यदि यह पश्चिम दिशा में दिखाई दे तो वर्षा अवश्य होगी।
  • यदि सूर्य के उत्तर में कृत्रिम सूर्य दिखाई दे तो वर्षा होगी तथा दक्षिण की ओर से प्रचण्ड वायु चलेगी।

परन्तु चूँकि ये सूचनायें किसी एक विशेष स्थान से सम्बन्धित नहीं होतीं अतः स्थान विशेष पर इनकी सहायता से सही जानकारी प्राप्त नहीं हो पाती। अतः इस समस्या को वैज्ञानिक ढंग से हल करने के लिए सरकार ने जगह-जगह मौसम सम्बन्धी वेधशालाओं (Meterological Observatories) की स्थापना की है जिनमें वायुमण्डल के दाब (Atmospheric pressure), ताप (Temperature), आर्द्रता (Humidity), वायु, वर्षा और बादलों के सम्बन्ध में सूचनायें एकत्रित की जाती हैं तथा इनके आधार पर प्रतिदिन गौसम की भविष्यवाणी तथा दूरदर्शन केन्द्रों से प्रसारित की जाती है।

इन ऋतु अनुसंधान वेधशालाओं में निम्नलिखित बातें नोट की जाती हैं तथा तदनुसार एक चार्ट (Chart) बना लिया जाता है -

  • अधिकतम और न्यूनतम ताप
  • वायु का दाब
  • वायु में आद्रता
  • वायु की गति
  • वायु की दिशा
  • वर्षा की मात्रा
  • सूर्योदय तथा सूर्यास्त का समय।


  • वायुमण्डल का अधिकतम तथा न्यूनतम ताप (Maximum and Minimum Temperature of the Atmosphere ) - इसको नापने के लिए तापमापी (Thermometers) इस प्रकार लगाये जाते हैं कि वे वायुमण्डल के सम्पर्क में तो पूर्णतया रहते हैं परन्तु सूर्य की किरणें सीधी उन पर नहीं पड़तीं। इन तापमापियों को सूर्य की सीधी किरणों से बचाने के लिये भिन्न-भिन्न देशे में भिन्न-भिन्न तरीके काम में लिये जाते हैं परन्तु इंग्लैण्ड तथा भारतवर्ष में एक खास लकड़ी का बॉक्स जिसको "स्टीवेन्सन स्क्रीन" (Stevenson's Screen) कहते हैं, इस कार्य के लिये प्रयोग में लाया जाता है। यह स्क्रीन भीतर से 18 इंच लम्बा 11 इंच चौड़ा तथा 15 इंच ऊँचा होता है। इसकी बगल की दीवारों में एक खास किस्म के लकड़ी के परदे लगे होते हैं जिनसे स्वतन्त्रतापूर्वक वायु उसमें पहुँच सके। इसकी छत को लकड़ी की दो परतों को मिलाकर बनाया जाता है। आगे की ओर इन परतों के बीच 1 1/2 इंच जगह छोड़ी जाती है जिससे इनकी छत कुछ ढालू हो जाती है। इसकी तली तीन परतों से मिलकर बनी होती है। इस स्क्रीन को पृथ्वी से करीब 5 फीट की ऊचाई पर रखा जाता है तथा इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उसके ऊपर किसी पेड़ अथवा इमारत की छाया न पड़े। इस स्टीवेन्सन स्क्रीन के अन्दर चार तापमापी होते हैं। इसमें क्षैतिज दिशा में उच्चतम तथा न्यूनतम तापमापी लगे होते हैं तथा दो अन्य तापमापी शुष्क तथा गीले तापमापी का कार्य करते हैं।
  • तापलेखी (Thermograph ) – ये स्वचालित तापमापी होते हैं जो लगातार एक ग्राफ पेपर पर ताप अंकित करते रहते हैं। इस ग्राफ पेपर को बेलन के ऊपर चढ़ा दिया जाता है जो एक यन्त्र द्वारा लगातार घूमता रहता है। यह बेलन एक दिन में एक चक्कर लगाता है और इस प्रकार पूरे दिन के ताप के अन्तर का पूर्ण विवरण इस चार्ट में मिल जाता है।
  • वायु का दाब - वायु का दाब नापने के लिये पारे के बैरोमीटर प्रयोग में लाये जाते हैं। जिनमें मुख्यतया फॉर्टिन बैरोमीटर (Fortin's Barometer) प्रयोग में लाया जाता है। इस बैरोमीटर में रीडिंग लेकर उसमें ताप, ऊचाई इत्यादि के लिये शुद्धि करके सही रीडिंग ज्ञात कर ली जाती है। नोट किये गये दाव को 32° फारेनहाइट, समुद्र तल की ऊंचाई तथा 45° डिग्री latitude पर बदल लिया जाता है। भिन्न-भिन्न स्टेशनों पर इस प्रकार प्राप्त शुद्ध दाब को एक नक्शे में अंकित (plot) किया जाता है। समान दाब वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाओं को समदाब रेखायें (Isobars) कहते हैं।
  • वायु दाब लेखी या बैरोग्राफ (Barograph ) - बैरोमीटर की रीडिंग तो एक निश्चित समय पर ही ली जाती है जिससे दिन भर के दाब के घटने-बढ़ने का पूरा अनुमान नहीं लगाया जा सकता। अतः बैरोग्राफ की सहायता से दाब की लगातार रीडिंग ले ली जाती है। इसके लिये निद्रव बैरोमीटर (Aneroid Barometer) प्रयोग में लाया जाता है। इसमें भी तापलेखी की तरह एक चक्कर काटने वाले बेलन के ऊपर कागज लपेटकर लगातार रीडिंग ली जाती है।
  • वायु की आद्रता - वायुमण्डल की हवा में हर समय पानी के कुछ कण उपस्थित रहते हैं जिनकी मात्रा हर समय घटती-बढ़ती रहती है। जब वायु अपने में अधिक से अधिक वाष्प की मात्रा लटकाये रहती है तो वह वाष्प से संतृप्त कहलाती है। यह संतृप्त वाष्प की मात्रा ताप के साथ घटती-बढ़ती रहती है; जैसे किसी विशेष ताप पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जल वाष्प की मात्रा संतृप्त रूप में भी हो सकती है या इससे कम भी ताप घटने पर इस संतृप्त जल वाष्प का मान कम हो जाता है और शेष बची जल वाष्प ओस के रूप में गिर जाती है। इस प्रकार वायु की आर्द्रता की माप ले लेना भी आवश्यक होता है। इसके लिये शुष्काद्र बल्ब आर्द्रतामापी (Wet and Dry Bulb Hygrometer) प्रयोग में लाया जाता है। इनको भी स्टीवेन्सन स्क्रीन में रखा जाता है। इसका वर्णन भी पिछले अध्याय में किया जा चुका है। वायुमण्डल को ये वाप्प के कण-नदियों, झीलों, तालाबों, गीली जमीन तथा पौधों इत्यादि में उपस्थित पानी के वाष्पन से मिलते हैं। इनमें प्रत्येक सतह पर भिन्न-भिन्न गति से वाप्पन होता है। खुली हुई पानी सतह की अपेक्षा, पौधों से ढकी जमीन अधिक पानी की मात्रा वाष्प के रूप में परिवर्तित करती है।
  • वायु की गति - वायु क्या है? किन्हीं दो स्थानों पर दाब के अन्तर के कारण क्षैतिज दिशा में एक स्थान से दूसरे स्थान पर वायु के चलने को 'वायु' कहते हैं। दिन तथा रात में ताप का अन्तर हो जाने के कारण नीचे दिशा में जो वायु की धारायें चलने लगती हैं उनको वायु नहीं कहा जाता। वायु की माप लेने के लिये उसकी गति व दिशा ज्ञात करते हैं। वायु की गति को वायु वेग से प्रदर्शित करते हैं। वायु का वेग निकालने के लिए फ्रांसिस बोफर्ट (Sir Francis Beaufort) ने एक पैमाना बनाया जिसको डॉक्टर सिम्पसन् ने सन् 1905 में फिर दुहराया। वायु के वेग को ज्ञात करने के लिए जो यन्त्र प्रयोग में लाये जाते हैं उन्हें वायु वेगमापी (Anemometer) कहते हैं। इसमें चार हल्की ऐल्युमीनियम या ताँबे की कटोरियाँ होती हैं जिनको एक स्तम्भ पर लगे लोहे के क्रॉस (Steel-Cross) की भुजाओं में कस दिया जाता है। इसमें नीचे एक डायल (Dial) लगा होता है जिससे किसी भी समय वायु की गति ज्ञात की जा सकती है। इन कटोरियों का व्यास 101.6 मिलीमीटर (4 इंच) होता है तथा स्तम्भ की लम्बाई 170 मिलीमीटर होती है। ये कटोरियाँ वायु की गति की लगभग एक तिहाई गति से घूमती है और वायु के 1.61 किलोमीटर (एक मील) प्रति घण्टे की गति से चलने पर ये कटोरियाँ एक घण्टे में 500 चक्कर लगाती हैं।
  • वायु की दिशा - वायु की दिशा ज्ञात करने के लिए जो यन्त्र काम में लिया जाता है उसे बात दर्शक मोर (Weather Cock) कहते हैं। इसमें एक चौड़े तीर को एक सीधी धुरी पर इस प्रकार लगाते हैं कि वह क्षैतिज दिशा में स्वतन्त्रतापूर्वक घूमकर वायु की दिशा को बता सके। चार क्रॉस भुजायें (Cross arms) इस तीर के कुछ नीचे कस कर लगा दी जाती हैं जो पूर्व, दक्षिण, पश्चिम व उत्तर की दिशा में रहती हैं। इस वातदर्शक को एक खड़े खम्भे में किसी ऊँची इमारत या पेड़ इत्यादि पर इस प्रकार लगा दिया जाता है कि वहाँ पर वायु के आवागमन के लिये कोई रुकावट न हो।
  • वर्षा की मात्रा – वर्षा की मात्रा नापने के लिए जो यन्त्र काम में लाया जाता है उसे वर्षामापी (Rain Gauge) कहते हैं। इसमें एक बेलनाकार बर्तन के अन्दर एक फनल (Funnel) लगी होती है जिसके ऊपरी गोल किनारे पर व्यास 127 मिमी होता है। यह बर्तन खुली जगह में चौरस चबूतरे पर रखा जाता है। इस कीप के नीचे एक बोतल होती है जिसमें कीप में होकर जाने वाली वर्षा की बूँदें जमा होती रहती हैं जो पानी इस बोतल में जमा होता है उसको बराबर में रखे एक नपने सिलिण्डर (Cylinder) में डाल दिया जाता है। इस सिलिण्डर पर मिलीमीटर के निशान अंकित होते हैं जिससे एकत्रित पानी की नाप ले ली जाती है। एक मिलीटर वर्षा का अर्थ यह होता है कि इतना पानी जमा हुआ कि जिसे एक 127 मिमी व्यास वाले सिलिण्डर (Cylinder) में भरने से पानी का तल 1 मिमी ऊपर उठ जायेगा।
  • सूर्योदय तथा सूर्यास्त का समय- इन वेधशालाओं में सूर्योदय तथा सूर्यास्त का समय भी नोट किया जाता है, अर्थात् प्रत्येक दिन किस समय सूर्य निकला तथा किस समय अस्त हुआ।

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मौसम पूर्वानुमान के समय किन-किन सावधानियों की आवश्यकता है?

मौसम पूर्वानुमान में निम्न सावधानियों की आवश्यकता होती है—

  • मौसमी घटकों की माप से प्राप्त निरीक्षणों को शुद्ध लिखा जाये ।
  • वर्तमान मौसमी गतिविधियों का मिलान पूर्व के घटनाक्रम से किया जाये। इसके पूर्व से घटी घटनाओं के अभिलेख की खोजबीन आवश्यक होती है।
  • मौसमी अवस्था का प्रदर्शन करने के लिए यथाशीघ्र (24 घण्टे के भीतर) चार्ट तैयार किया जाये।
  • भावी घटनाक्रम के सम्बन्ध में शीघ्र, सुविचारित, सही एवम् निश्चित निष्कर्ष निकाला जाये।


मौसम के पूर्वानुमान हेतु आवश्यक सूचनाएँ (Essentials for weather forecasting)

मौसम के पूर्वानुमान के लिए मौसमी तत्वों के सिद्धान्तों एवम् नियमों का ज्ञान आवश्यक होता है। इसके लिए निम्न तथ्यों की जानकारी आवश्यक होती है -

  • स्थानीय एवम् आसपास के क्षेत्रों के प्रभावकारी मौसमी तत्वों का ज्ञान ।
  • वायुदाब एवम् उनके संचलन का ज्ञान।
  • वायुदाब को प्रभावित करने वाले प्राकृतिक घटकों में परिवर्तन का ज्ञान।
  • स्थानीय स्थलाकृति का ज्ञान।
  • मौसमी तत्वों में सामान्य परिवर्तन का ज्ञान।


मौसम सम्बन्धी पूर्वानुमान वेधशालाओं में किस प्रकार तैयार किये जाते हैं?

मौसम की पूर्व सूचना देने के लिए लगभग 300 से अधिक वेधशालायें भिन्न-भिन्न स्थानों पर स्थापित कर दी गई है।

इन वेधशालाओं को चार श्रेणियों में विभाजित कर दिया गया है - प्रथम श्रेणी की वेधशालायें वे है जहाँ पर हर समय के दाब, ताप, वायु आर्द्रता तथा वर्षा आदि के पाठ्यांक (Readings) नोट किये जाते हैं, जैसे—पुणे, आगरा, नई दिल्ली, कोलकाता, बंगलुरु इत्यादि की वेधशालायें। द्वितीय श्रेणी की वे वेधशालायें हैं जहाँ केवल प्रातः 8 बजे तथा सायंकाल 5 बजे (भारतीय समय के अनुसार) पाठ्यांक नोट किये जाते हैं। तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी की वेधशालाओं में केवल वर्षा तथा ताप के पाठ्यांक लिये जाते हैं।

भिन्न-भिन्न वेधशालाओं के पाठ्यांक लेकर उनको पुणे वेधशाला में भेज दिया जाता है जहाँ वे एक घण्टे के अन्दर ही पहुँच जाते हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों के पाठ्यांकों को भारत के एक नक्शे पर चिन्हों द्वारा अंकित कर दिया जाता है। इनको मौसम चार्ट (Weather Chart) कहते हैं। अगले 48 घण्टों में मौसम की पूर्व सूचना इन्हीं पाठ्यांकों के आधार पर दी जाती है। यह सूचना 12 बजे तक तैयार की जाती है जिसको खास-खास स्थानों, शहरों तथा हवाई अड्डों पर भेज दिया जाता है।

उपग्रह द्वारा मौसम का पूर्वानुमान किस प्रकार से करते हैं?

उपग्रह द्वारा दृश्य एवम् अवरक्त वर्णक्रम में पृथ्वी एवम् वायुमण्डल के चित्र लेकर उसका पारेषण (transmission) घरातल के मौसमी उपग्रह सूचना संकलन केन्द्रों को किया जाता है। अवरक्त प्रतिबिम्ब द्वारा धरातल के तापक्रम, बादलों की ऊचाई एवम् तापक्रम का निर्धारण किया जाता है। दृश्य वर्णक्रम की गति की गणना की जाती है। इस प्रकार कम अन्तराल पर प्राप्त होने वाले बादलों के चित्रों की सहायता से बादलों के बनने, उनके संचलन, बादलों के प्रकार एवम् ऊचाई, तापक्रम एवम् वायु की गति के सम्बन्ध में यथार्थ सूचना प्राप्त होती है। विभिन्न मौसमी घटनाक्रम के घटित होने के सम्बन्ध में संक्षिप्त चार्ट एवम् बादलों के चित्रों को लगाकर अधिक शुद्ध एवम् यर्था पूर्वानुमान किया जा सकता है।

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