सामाजिक वानिकी क्या है इसके प्रकार, उद्देश्य एवं इसका महत्व व कार्य क्षेत्र

सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) रोजगार बढ़ाने एवं निर्धनता दूर करने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है ।

वास्तव में, वन ऐसे प्राकृतिक साधन है, जिनका मानवीय सहयोग से कुछ सीमा तक नवीनीकरण किया जाना संभव है । 

भारत में सामाजिक वानिकी (social forestry in india) से ग्राम वासियों के साथ-साथ नगर वासियों को भी समुचित लाभ होता है तथा उनकी वन्य आवश्यकता है, जैसे - फर्नीचर एवं माचिस उद्योग के लिए लकड़ी की नियंत्रित पूर्ति होती है ।

अतः इससे स्पष्ट है, कि वनों से बाहर समाजिक आर्थिक उद्देश्यों ‌ को प्राप्त करने के लिए किया गया वनीकरण, वानिकी के कार्य, सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) कहलाता है ।


सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) किसे कहते है?

सामाजिक वानिकी (Social forestry in hindi) क्या है इसके प्रकार, उद्देश्य एवं इसका महत्व व कार्य क्षेत्र, सामाजिक वानिकी से आप क्या समझते है, वानिकी,
सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi)

सामाजिक वानिकी क्या है? social forestry in hindi


सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) के अंतर्गत वृक्षारोपण अधिकांशतः वन ‌सीमा के बाहर बंजर भूमि एवं कृषि भूमि के रिक्त स्थानों जैसे - खेतों की मेड़ आदि पर किया जाता है ।

इस प्रकार, सामाजिक वानिकी (social forestry in hindiवनों से दूर स्थित ग्रामवासियों की अनेक आवश्यकताओं, जैसे - इंधन, चारा, घरेलू एवं कृषि हेतु लकड़ी की व्यवस्था, कृषि फसलों की रक्षा के लिए बाढ़ एवं फसलों के लिए अनुकूल सूक्ष्म जलवायु का निर्माण और मनोरंजन के लिए फूलों तथा हरियाली से भरे क्षेत्रों के निर्माण आदि की मूर्ति पर्यावरण अनुकूलता के साथ करती है ।


 ये भी पढ़ें


सामाजिक वानिकी की परिभाषा Defination of Social forestry in hindi


सामाजिक वानिकी को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है -


( 1 ) वेस्टौबी ( Vestrobi ) के कथनानुसार,

“सामाजिक वानिकी वह वानिकी है जिसका प्रारम्भ समुदाय के संरक्षणात्मक एवं मनोरंजनात्मक लाभ के उद्देश्य से किया गया है ।"

( "Social forestry is forestry which aims at producing flow of protection and recreation benefits for the community." Commonwelth Cogress on Forestry, New Delhi, 1968 )


( 2 ) सीताराम राव के कथनानुसार,

“वानिकी वह सिद्धान्त तथा व्यवहार है जिसके द्वारा वनों की देखभाल की जाती है तथा वन से प्राप्त होने वाली वस्तुओं का उपयोग किया जाता है ।"


( 3 ) डॉ० राना के कथनानुसार,

“समाज के द्वारा समाज के लिए समाज की ही भूमि पर समाज के जीवन - स्तर को सुधारने के सामाजिक उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किए जाने वाले वृक्षारोपण को सामाजिक वानिकी कहते हैं ।"


भारत में सामाजिक वानिकी : संकल्पना (social forestry in hindi in india : Concept)


सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) वृहद स्तर पर वृक्षा रोपण की एक नवीन संकल्पना है ।

यह सामुदायिक आवश्यकताओं की पूर्ति एवं लाभ के लिए पेड़ लगाने, उनका विकास करने तथा वनों के संरक्षण पर बल देती है ।

इसका सर्वप्रथम प्रयोग 1976 में 'राष्ट्रीय कृषि आयोग' द्वारा किया गया ।

इसके अंतर्गत ऐसे स्थानों पर जहाँ पहले वन नहीं रहा हो अथवा बहुत समय पूर्व वनों का कटान कर दिया गया हो, वहाँ कृत्रिम रीति से मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वृक्षारोपण कर वनों को उगाया जाता है ।

सामाजिक वानिकी का मूल उद्देश्य जनता द्वारा जनता के लिए वन संसाधनों का सृजन करना है ।


ये भी पढ़ें


सामाजिक वानिकी से आप क्या समझते हैं?


वन पृथ्वी का शृंगार और जीवन का आधार हैं ।वन प्रकृति की वह अमूल्य निधि है जो जीव एवं अजीव के मध्य सेतु का निर्माण करते हैं ।

भौतिक पर्यावरण को सुरक्षित, संचालित एवं गतिशील बनाए रखने में वनों का आधारभूत योगदान है ।

वन धरती पर प्राण वायु के प्राकृतिक कारखाने हैं और साथ ही दूषित वायु को शुद्ध करने की जिम्मेदारी भी निभाते हैं ।

गत अनेक शताब्दियों में मानवीय जनसंख्या के प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के परिणामस्वरूप वनों का तेजी से विनाश हुआ है ।

वर्तमान में भूपटल के लगभग 16 प्रतिशत भाग पर ही वन शेष रह गये हैं ।

विश्व के विभिन्न भागों में वनों का तेजी से होता सफाया धरती पर मानव जाति सहित सम्पूर्ण जीवन के लिए एक बड़ा खतरा बन कर मंडराने लगा है ।

वन - विनाश की विभिषिका से हुई हानि की कुछ सीमा तक भरपाई करने के लिए सामाजिक वानिकी (social forestry in hindiको अपनाया गया है ।


सामाजिक वानिकी के प्रकार (types of social forestry)


कृषि के राष्ट्रीय आयोग ने सामाजिक वानिकी के निम्न प्रमुख प्रकार स्पष्ट किये है -


( 1 ) फार्म सामाजिक वानिकी ( Farm Social Forestry ) -

फार्म वानिकी, कृषि फार्मों या खेतों की मेंड़ों या सीमाओं पर वृक्षों की पंक्तियाँ तथा खेतों में बिखरे हुए कुछ वृक्षों को लगाने के रूप में वानिकी के फार्म में किये जा रहे प्रयोग को कहते हैं । इसका मुख्य उद्देश्य छोटे आकार की लकड़ी, ईंधन तथा चारे की आवश्यकता पूरी करना तथा कृषि पर अनुकूल प्रभाव डालना है ।


( 2 ) विस्तार सामाजिक वानिकी ( Extension Social Forestry ) -

विस्तार वानिकी, परम्परागत वन क्षेत्रों से दूर स्थित वृक्ष तथा वनस्पति विहीन स्थानों में वानिकी के प्रयोग को कहते हैं । इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे स्थानों में वृक्षों का क्षेत्र बढ़ाना है ।


ये भी पढ़ें


सामाजिक वानिकी (Social forestry in hindi in hindi) के विस्तार सम्मिलित हैं —


( क ) मिश्रित वृक्षा रोपण -

उपयुक्त बेकार भूमि, पंचायत भूमि तथा ग्राम की सम्मिलित भूमि पर घास तथा चारा पत्तियाँ, फल तथा ईंधन वृक्ष लगाने को, मिश्रित वानिकी कहते हैं ।


( ख ) रक्षा पट्टी -

वायु, धूप, हिम प्रवाह, बाढ़ आदि से रक्षा करने को लगाये वृक्षों या झाड़ियों की पट्टी को रक्षा पट्टी कहते हैं । ये साधारणत: वायुरोधी से अधिक विस्तृत और एकाकी फार्मों से बड़े क्षेत्रों और कभी - कभी नियोजित ढंग से पूरे क्षेत्र में फैली हुई होती है ।


( ग ) रेखीय पट्टी रोपण -

सार्वजनिक सड़कों, नहरों तथा रेल पटरियों के दोनों किनारों पर तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियों के वृक्षों के लगाने को रेखीय पट्टी रोपण कहते हैं ।


( 3 ) उजड़े हुए वनों का पुर्नवनीकरण ( Re - forestation of Deforested Area ) -

ये ऐसे क्षेत्र हैं जिनके अंतर्गत मानवीय या अन्य कारकों द्वारा वनों का विनाश हो गया है । ऐसे क्षेत्रों में समुचित बाड़ लगाकर एवं पौधों को पानी देने आदि उपाय कर उचित प्रजातियों के वृक्षों का रोपण कर उजड़े हुए वनों का पुर्नवनीकरण किया जाता है । पहाड़ी प्रदेशों में इस प्रकार की सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) की जा रही है ।


( 4 ) मनोरंजन सामाजिक वानिकी ( Recreational Social Forestry ) -

ग्राम तथा नगरवासियों के मनोरंजन के लिए सुन्दर फूल देने वाले वृक्षों तथा झाड़ियों को उगाने को मनोरंजन वानिकी कहते हैं । इसमें मुख्य उद्देश्य इमारती लकड़ी, घास तथा चारा प्राप्त करना नहीं होता बल्कि लोगों की मनोरंजनात्मक आवश्यकताओं को देखते हुए अलंकृत वृक्ष व झाड़ियाँ उगाना है । इसे सौन्दर्यात्मक वानिकी कहते हैं । यह पर्यटकों को भी आकर्षित करती है ।


सामाजिक वानिकी के उद्देश्य ( Objective of Social Forestry )


सामाजिक वानिकी के निम्न प्रमुख उद्देश्य हैं -


( 1 ) अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति -

ग्रामवासियों की ईंधन, चारा, बाँस, कृषि, आवासीय लकड़ी एवं अन्य वन उपज आधारित आवश्यकताओं की पूर्ति करना ।


( 2 ) जैविक खाद की उपलब्धता बढ़ाना -

सामाजिक वानिकी से जलाऊ लकड़ी प्राप्त मात्रा में मिल जाती है इससे ईंधन के रूप में गोबर को जलने से बचाया जा सकता है । साथ ही, पेड़ पौधों की पत्तियों को हरी खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है ।


( 3 ) वायुरोधी एवं रक्षा पट्टियाँ -

मेढ़ो पर सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) द्वारा शुष्क रेतीले क्षेत्रों में वायुरोधी रक्षा पट्टियाँ लगाकर समीपवर्ती क्षेत्र की जलवायु को कुछ सीमा तक अनुकूल किया जा सकता है । साथ ही, तेज हवा के झोंको से फसलों की सुरक्षा की जा सकती है ।


( 4 ) रोजगार एवं निर्धनता के हल में सहायक -

ग्रामीण भारत में बेरोजगारी की विकराल समस्या है । सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) से निजी एवं सामूहिक स्तर पर अतिरिक्त रोजगार का सृजन किया जा सकता है । सामाजिक वानिकी की सहायता से गाँवों में बहुत से कुटीर उद्योग स्थापित किये जा सकते है, जैसे - फर्नीचर, खिलौना, लाख, रेशम कीट पालन आदि । इससे ग्रामीण क्षेत्र में निर्धनता की समस्या पर भी काफी हद तक काबू पाया जा सकता है ।


( 5 ) अतिरिक्त भूमि का उपयोग -

भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 25 प्रतिशत कृषि योग्य न होकर खाली पड़ा हुआ है । ऐसे क्षेत्रों को सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) के माध्यम से एक ओर आर्थिक सामाजिक रूप से उपयोगी भी बनाया जा सकता है तथा दूसरी ओर पर्यावरण को भी स्वस्थ रखा जा सकता है ।


( 6 ) मिट्टी व जल सरंक्षण करना -

वन विहीन ढालू क्षेत्रों में भूस्खलन एवं बाढ़ आदि का प्रकोप अत्यधिक होता है । सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) से इस पर प्रभावी रोक लगती है । साथ ही भूमि की उर्वरता में भी वृद्धि होगी और भूमि की जन ग्रहण क्षमता में भी वृद्धि होती है ।


( 7 ) जलागम क्षेत्रों की सुरक्षा -

जलागम क्षेत्र वनस्पति विहीन एवं अनुपयोगी होते हैं । इससे भूमि की ऊवरी क्षमता भी नष्ट होती है । यदि ऐसे स्थानों पर कुछ विशेष प्रकार के पौधों, जैसे - सफेदा, पॉपुलर आदि का रोपण किया जाये तो जलागम क्षेत्रों की सुरक्षा भी होती है और आर्थिक एवं पर्यावरणीय लाभ भी होता है ।


( 8 ) प्राकृतिक सौन्दर्य बढ़ाने के लिये -

वृक्षविहीन भूमि भूपटल की नीरस को बढ़ाती है जबकि वृक्षों की हरियाली सौन्दर्य में वृद्धि करती है । विशेष रूप से आबादी क्षेत्रों के समीप सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) के द्वारा ऐसे पिकनिक स्पॉट एवं पार्कों का निर्माण किया जा सकता है जो अपने प्राकृतिक सौन्दर्य से मानव को भी रोमांचित करें और साथ ही नन्हें जीव - जन्तुओं, जैसे - पक्षियों, खरगोशों आदि को आकर्षित करे उनके प्राकृतिक वास की आवश्यकता की भी पूर्ति करें । सड़कों, रेल पटरियों व नहरों के किनारों पर भी अलंकृत एवं फलदार वृक्षों को लगाने से भी भू - उपयोग में वृद्धि हो जाती है ।


( 9 ) विकास उत्प्रेरक -

सामाजिक वानिकी के माध्यम से विकसित हुए अधिकांश क्षेत्र कृषि, बागवानी, पशुपालन, कुटीर उद्योग, मछली पालन, मौन पालन आदि गतिविधियों के लिए उपयुक्त हो जाते हैं । इस प्रकार, इसके प्रभाव से एकओर मिश्रित व्यवसाय का लाभ मिलता है तो दूसरी ओर अतिवृष्टि, सूखा आदि विषम परिस्थितियों के समय भी पर्याप्त रोजगार मिलता रहता है । वस्तुत: सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) सामान्य एवं प्रतिकूल दोनों प्रकार की दशाओं में एक प्रबल विकास उत्प्रेरक है ।


ये भी पढ़ें


सामाजिक वानिकी कार्यक्रम क्या है?


वन प्राकृतिक संसाधनों में सर्वाधिक दृश्यमान एवं महत्त्वपूर्ण साधन हैं तथा मानव जीवन की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति का आधार हैं ।

आर्थिक रूप से इमारती लकड़ी, ईंधन, प्राकृतिक औषधियों, पशुओं के चारे, फूल - फल, वन्य आधारित उद्योगों के लिए कच्चे माल आदि की पूर्ति वनों से ही होती है ।

साथ ही वनों का अत्यधिक पर्यावरणीय महत्त्व भी है ।

वस्तुतः मनुष्य का जीवन वनों पर ही निर्भर है ।

किसी भी सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में वनों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है ।

हमारे बुजुर्ग वनों के महत्त्व को प्रारम्भ से ही समझते थे ।

इसलिए ग्रामीण अंचलों में घरों के बाहर और आंगन में भी वृक्ष लगाये जाते थे और उनकी पूजा की जाती थी ।

पेड़ की छाया में चौपाल लगती थी जहाँ एक - दूसरे की समस्याओं पर चर्चा कर मिलकर उनका हल निकालते थे ।


भारत में सामाजिक वानिकी (Social forestry in india) का इतिहास ढाई हजार वर्ष पुराना है ।

 भगवान बुद्ध ने अपने संदेश में कहा था, कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन काल में कम - से - कम पाँच पेड़ अवश्य लगाये ।

सम्राट अशोक ने उनका यह संदेश न केवल अपने राज्य की सीमाओं उनसे बाहर भी प्रसारित करवाया और अपने पुत्र एवं पुत्री को भी इसके लिए प्रेरित किया ।

आज चिंता की बात यह है, कि मानव जनसंख्या तो तेजी से बढ़ रही है किन्तु वनों सहित सभी प्राकृतिक क्षेत्र तेजी से घट रहे हैं ।

नगरीकरण, औद्योगिकीकरण एवं आवागमन की सुविधा में वृद्धि के लिए वनों एवं वन्य क्षेत्र को काटा - सिमटाया जा रहा है ।

इसके कारण प्राकृतिक आपदायें विकराल रूप धारण करने लगी हैं और पर्यावरण संतुलन बिगड़ गया है ।


इससे लोगों का ध्यान पुन: वनीकरण एवं सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) की ओर आकर्षित हुआ है ।

इसी कड़ी में आयोजित भारत में राष्ट्रमंडल वानिकी कांग्रेस के दिल्ली सम्मेलन में वन वैज्ञानिक वेस्टोबाय ने अपने भाषण में 'सामाजिक वानिकी' शब्द का प्रयोग करते हुए इसे वानिकी के उस विशिष्ट प्रकार के रूप में निरूपित किया जिसका उद्देश्य सुरक्षा एवं मनोरंजन के लाभ जनता तक पहुँचाना है ।

वर्तमान संदर्भ में सामाजिक वानिकी (social forestry in hindi) समाज के द्वारा समाज के हित में, समाज की भूमि पर सामाजिक जीवन के विकास एवं उन्नयन हेतु किया जाने वाला वृक्षारोपण है ।


आज सम्पूर्ण विश्व में वनों के विस्तार पर बल दिया जा रहा है, किन्तु कृषि के लिए ही भूमि का अभाव है ऐसे में केवल बंजर एवं कृषि अनुपयुक्त भूमि ही इस कार्य के लिए बचती है ।

इसके अतिरिक्त इस योजना के अंतर्गत सड़कों, नहरो, रेलवे लाइन के दोनों ओर की राजकीय भूमि, तालाब, मंदिर, पंचायत घर, शिक्षण संस्थानों, चिकित्सालयों, प्रशासनिक भवनों, आदि के अहातों में भी वृक्षारोपण कर इस कार्यक्रम को आगे बढाया जा रहा है ।


भारत में सामाजिक वानिकी का महत्त्व ( Importence of Social Forests in hindi )


मानव अपनी मूलभूत आवश्यकताओं हेतु प्रकृति पर निर्भर है ।

वनों का मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्त्वपूर्ण स्थान है ।

भारत में आदिकाल से ही वनों के महत्त्व (Importance of social forestry in hindi) को स्वीकार किया गया है ।

वेद, उपनिषद्, महाकाव्यों आदि प्राचीन ग्रन्थों में वनों के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है तथा इनका जयगान किया गया है ।

उपनिषदों एवं आरण्यकों का सृजन वनों की शीतल छाँव के नीचे ही किया गया है ।

नन्दन वन, दण्डकारण्य, अशोक वन, वृन्दावन आदि ऋषि - मुनियों की तपोभूमि रहे हैं ।


श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार,

“वन हम सब लोगों को जीवन प्रदान करते हैं । इसलिए वृक्षों की सदैव सुरक्षा करनी चाहिए ।"

महात्मा बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे ही कैवल्य प्राप्त हुआ था । इतना ही नहीं, कालिदास की शकुन्तला वन - कन्या थी ।


महात्मा बुद्ध का विचार था कि -

“वन उस असीम दया एवं उदारता के अनुपम सावयव हैं जो अपने अस्तित्व के लिए मनुष्य से कोई माँग नहीं करते अपितु उदारतापूर्वक अपने जीवन की कीमत पर भी मानवता का संरक्षण करते हैं ।"


स्वतंत्रता पश्चात् भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं ० जवाहरलाल नेहरू ने उगते हुए वृक्ष को राष्ट्र की प्रगति का जीवित प्रतीक माना है ।

धार्मिक एवं दार्शनिक दृष्टि से ही नहीं, आर्थिक दृष्टि से भी वनों को राष्ट्र की अमूल्य निधि माना जाता है ।

कृषि - भूमि की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए एवं पर्यावरण को स्वच्छ बनाये रखने के लिए वन नितान्त आवश्यक हैं ।

वनों से सरकार को प्रतिवर्ष 400 करोड़ रुपये से अधिक के राजस्व की प्राप्ति होती है तथा देश की अधिकांश जनसंख्या को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त होता है ।


देश के कल्याण में अपार सहयोग प्रदान करने वाली इस वन सम्पदा से हमें दो प्रकार के लाभ प्राप्त होते है - प्रत्यक्ष लाभ एवं परोक्ष लाभ ।

वनों से जलाने के लिए लकड़ी, फर्नीचर तथा खेल का सामान बनाने के लिए कच्चा माल, फल - फूल, औषधियाँ, जंगली पशुओं के लिए आवास एवं लाखों लोगों को रोजगार के अवसर तो उपलब्ध होते ही हैं, साथ ही इनका भू - क्षरण को नियन्त्रित करने में महत्त्वपूर्ण स्थान है ।

भारत में जैसे - जैसे जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है , वनों पर मानव आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु दबाव बढ़ता जा रहा है । 

वनों का कटान पर्यावरणीय प्रदूषण को विकसित कर रहा है ।


वनों के महत्त्व को देखते हुए भारत में 1950 ई. में वन महोत्सव कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए तथा 1952 ई ० में सरकार द्वारा 'राष्ट्रीय वन नीति' की घोषणा की गई ।

इस नीति का प्रमुख उद्देश्य वनों का संरक्षण एवं विकास करना है ।

सरकार द्वारा वन संरक्षण नीति के अंतर्गत वन एवं जनता के बीच पारस्परिक निर्भरता एवं उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने हेतु भारत में 1979 ई ० में सामाजिक वानिकी कार्यक्रम प्रारम्भ किए गए हैं ।


जैसे - जैसे प्राकृतिक वन समाप्त होते जा रहे हैं वैसे - वैसे सामाजिक वानिकी का महत्त्व (Importance of social forestry in hindi) भी बढ़ता जा रहा है ।

वनों ने पृथ्वी के लगभग 9.4 प्रतिशत भाग को आच्छादित कर रखा है और कुल भूमि का लगभग 30 प्रतिशत भाग वनों से ढका हुआ है ।

यह बहुत अधिक इसलिए नहीं है क्योंकि कभी वनों ने भूमि के 50 प्रतिशत भाग को घेर रखा था ।

इससे स्पष्ट है, कि वन निरन्तर सिमटते जा रहे हैं । भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र लगभग 32,80,500 वर्ग कि ० मी ० है, जिसमें लगभग 7,50,300 वर्ग कि ० मी ० अर्थात् लगभग 22.7 प्रतिशत भाग पर ही वनों का विस्तार है ।

यह मान सम्पूर्ण पृथ्वी पर विद्यमान वनों के मान से कम है अर्थात् भारत वनों की दृष्टि से वैश्विक पटल पर पिछड़ा हुआ है ।


हमारे देश में प्रति व्यक्ति वन - क्षेत्र की उपलब्धि केवल 0.2 हेक्टेयर है ।

भारत में वन - क्षेत्र की मात्रा ही अल्प नहीं है अपितु उसका वितरण भी अत्यन्त असमान है ।

देश के कुल वन - क्षेत्र का 80 प्रतिशत भाग हिमालय के क्षेत्र में स्थित है और 20 प्रतिशत भाग इधर - उधर बिखरा हुआ है ।

विभिन्न राज्यों में वनों का अनुपात अत्यधिक विषम है ।

एक ओर कर्नाटक, त्रिपुरा, अण्डमान व मध्य प्रदेश जैसे क्षेत्र हैं जहाँ यथेष्ट वन हैं तो दूसरी ओर पंजाब में केवल 23 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 13 प्रतिशत तथा राजस्थान में 9.7 प्रतिशत वन - क्षेत्र हैं ।


देश के कुल वन क्षेत्रफल का केवल 55-3 प्रतिशत भाग ही व्यापारिक महत्त्व का है ।

ऐसे में सामाजिक वानिकी का महत्त्व दिन - प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है ।

वास्तव में सामाजिक वानिकी के बलबूते ही बढ़ते हुए प्रदूषण को रोका जा सकता है एवं दुनिया को वन विहिन होने से बचाया जा सकता है ।


समाजिक वानिकी की प्रबन्ध प्रणालियाँ एवं वृक्षारोपण के विभिन्न भू - दृश्य


एक नवीन संकल्पना होने के कारण सामाजिक वानिकी के कार्य - क्षेत्र को ठीक - ठीक सुनिश्चित कर पाना अभी एक कठिन कार्य है ।

छटी योजना के दौरान सामाजिक वानिकी को उपलब्धियों का मूल्यांकन करने की दृष्टि से तीन कार्य क्षेत्र में बाँटा गया, ये हैं -


( 1 ) वनीकरण ( वनारोपण ) अर्थात् वनों के विकास के लिए लगाई गई कुल पौध सुनिश्चित करना ।

( 2 ) सामाजिक वनविज्ञान ( सामाजिक वन ) अर्थात् वनों के विकास के लिए प्रयोग किया गया कुल क्षेत्र ( भूमि ) तथा

( 3 ) खेत वन विज्ञान ( कृषकों द्वारा खेतों में वन्य पौधारोपण ) अर्थात् वनों के विकास के लिए कितनी पौध वितरिक की गई ।


सामाजिक वानिकी के क्षेत्र को मनोरंजनात्मक वानिकी अर्थात् भू - दृश्य के सौन्दर्यकरण के रूप में किया गया निपटने के लिए किये गये वृक्षारोपण एवं पर्यावरण वानिकी अर्थात् पर्यावरणीय प्रदूषण वृक्षारोपण के रूप में बाँट कर देखा जाता है ।


 ये भी पढ़ें


भारत में सामाजिक वानिकी के कार्य क्षेत्र ( Scope of Social Forestry in Hindi )

सामाजिक वानिकी के कार्य क्षेत्र का सम्बन्ध विभिन्न प्रकार की भूमि पर वृक्षारोपण करने से हैं ।


इसे दो भागों में बाँट कर भी देखा जा सकता है -


1. कृषि सामाजिक वानिकी ( Agricultural Social Forestry )

इसका उद्देश कृषकों के उत्पादन में वृद्धि करना एवं वृक्षारोपण द्वारा आंधी - तूफान से फसलों की सुरक्षा करना है ।


2. प्रसार सामाजिक वानिकी ( Extention Social Forestry )

इसका उद्देश्य वनों का विस्तार एवं पुर्नविस्तार करना है ।

सामाजिक वानिकी के कार्य क्षेत्र को सामाजिक वानिकी की प्रबन्ध प्रणालियों एवं वृक्षारोपण के विभिन्न भूदृश्यों में बाँट कर भी देखा जा सकता है ।


सामाजिक वानिकी की प्रबन्ध प्रणालियाँ ( Management Systems of Social Forestry )


समाजिक वानिकी की विभिन्न प्रबन्ध प्रणालियाँ निम्न प्रकार हैं -


( 1 ) बहु उत्पाद वानिकी -

इस प्रणाली का उद्देश्य ऐसा वन उगाना है, जिनमें बहुत से उत्पादों का लाभ मिल सके । यह प्रणाली विशेषतया वनों के समीपवर्ती स्थानीय लोगों के लिये उचित है, जो वनों से विभिन्न उत्पाद ले सकते हैं । 
प्रजातियों का चुनाव लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिये । इमारती लकड़ी, फल - वृक्ष, ईंधन की लकड़ी और अन्य का रोपण मिश्रित किया जा सकता है ।


( 2 ) छोटे पैमाने पर वानिकी -

स्वयं की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु छोटे पैमाने पर वानिकी के लिये प्रजातियों का चुनाव तथा प्रबन्धन, स्थानीय माँग तथा उचित भूमि की उपलब्धता पर निर्भर करता है । यह प्रणाली कृषकों द्वारा अपनी भूमि, खेतों के बीच की मेंडो, गाँव के रास्तों के किनारे, चकरोड़ों, आवासों, कुओं, पंचायती भूमियों आदि में अपनाई जा सकती है । इसके उद्देश्य की पूर्ति के लिये कृषकों तथा पंचायतों द्वारा अपने लिये पर्याप्त ईंधन, इमारती लकड़ी, अन्य वानिकी उत्पाद आदि प्राप्त कर लेना है ।


( 3 ) वृक्षों का उत्पादन –

अलग - अलग या झुन्डों में वृक्षों की सघन कृषि को 'आरबोरीकल्चर' ( Arboriculture ) कहते हैं । भागों में कृषक उद्योगों की आवश्यकताओं को देखते हुये सेमल, पोपलर, यूकिलिपटस, आदि समूहों में उगाकर, कच्चे माल के रूप में उद्योगों की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं ।


( 4 ) कृषि - वन वर्धन -

इस प्रणाली में कृषि सस्यें तथा वनीकरण एक साथ या एक के बाद दूसरी क्रम से की जाती है । इस प्रणाली में वनीकरण के प्रारम्भिक वर्षों में कृषि सस्ये 'इन्टर क्रोपिंग' के रूप में भी ली जाती हैं । जब बड़े होकर वृक्ष आपस में मिलने लगते हैं तो कृषि सस्ये लेनी बन्द कर दी जाती है ।

उदाहरणार्थ - पोपलर वृक्षों के नीचे ऐसी फसलें ली जाती हैं जो अपेक्षाकृत कम प्रकाश में सफलतापूर्वक हो जाती हैं । यह प्रणाली 'टॉन्गया प्रणाली' के नाम से प्रचलित है ।


( 5 ) कृषि - वानिकी (Agro Forestry in Hindi) -

इस प्रणाली में भूमि प्रबन्धन को सहारा मिलता है, जिससे भूमि की बहुमुखी उपज बढ़ती है । इसमें फसलोत्पादन तथा वनीकरण या पशुपालन साथ - साथ या क्रम से उसी भूमि पर किये जाते हैं । इस प्रणाली में कृषि सस्य, वानिकी सस्यों के साथ घासें उगाते हुये अधिकतम सम्भावित आय ली जाती है । इसमें इस प्रकार फसलें ली जानी चाहिये, जिससे स्थानीय जनता की खाद्य, चारा, ईंधन, इमारती लकड़ी आदि की माँग पूरी हो सके । इस प्रणाली में खाद्य सस्यें तथा वृक्ष बहुत तरीकों से उगाये जा सकते हैं, जैसे -

( अ ) खेतों की मेड़ों पर वृक्ष, 

( ब ) एकान्तर पंक्तियों में वृक्ष तथा फसलें, 

( स ) एकान्तर पट्टियों में वृक्ष तथा फसलें, 

( द ) वृक्ष तथा फसलें मिश्रित । 


वृक्षारोपण के विभिन्न भू - दृश्य ( Different Land - Scenario of Plantation )


सामाजिक वानिकी के अंतर्गत वृक्षारोपण के विभिन्न भू - दृश्य निम्न प्रकार हैं -


( 1 ) बेकार खाली पड़ी भूमि में वृक्षारोपण -

भारत में कृषि भूमि, वन भूमि एवं आवासीय भूमि के अतिरिक्त बहुत सी भूमि अभी भी खाली एवं बंजर पड़ी है । यद्यपि यह पता लगाना बहुत कठिन है कि यह कितनी है, क्योंकि इस प्रकार की भूमि का न तो कोई सही अभिलेख है दूसरे इसमें से बहुत - सी भूमि को लोगों ने गैरकानूनी ढंग से कब्जा रखा है, तथापि सरकारी एवं गैर - सरकारी प्रयास से इसमें से अधिकांश भूमि पर साम


Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.