मृदा उर्वरता ( Soil Fertility in hindi )

मृदा उर्वरता (Soil Fertility in hindi) क्या है, मृदा उर्वरता प्रभावित करने वाले कारक


मृदा उर्वरता (Soil Fertility in hindi) क्या है, मृदा उर्वरता प्रभावित करने वाले कारक
मृदा उर्वरता ( Soil Fertility in hindi )


मृदा उर्वरता की परिभाषा ( Soil Fertility in hindi )


पौधों की अधिकतम वृद्धि के लिए मृदा की पोषक तत्त्वों को पर्याप्त तथा सन्तुलित मात्रा में प्रदान करने की क्षमता को मृदा उर्वरता (Soil Fertility in hindi) कहते हैं।

इसे क्विन्टल, किलोग्राम तथा प्रति हैक्टेयर में मृदा की उपज से मापा जाता है ।

वास्तव में एक अच्छी उत्पादक मृदा सदैव उर्वर (उपजाऊ) होती है, किन्तु मृदा उर्वरता (soil fertility in hindi) सदा उत्पादक नहीं होती ।

मृदा की उर्वरता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक कौन से हैं?


मृदा उर्वरता (soil fertility in hindi) को बनाए रखने या बढ़ाने के लिए विभिन्न कारकों को निम्न प्रकार दो भागों में विभाजित किया जा सकता है -

मृदा की उर्वरता को प्रभावित करने वाले कारक ( Factors affecting Soil Fertility in hindi)


1. प्राकृतिक कारक ( Natural Factors )


ये कारक मृदा संरचना को प्रभावित करते हैं और इनका प्रभाव मृदा निर्माण के समय से ही पड़ने लगता है ।

ये निम्नलिखित कारक हैं

1. मूल पदार्थ ( Parent Material )
2. जलवायु ( Climate )
3. मृदा प्रोफाइल की गहराई
4. मृदा आयु ( Soil Age )
5. स्थलाकृति ( Topography )
6. मृदा की भौतिक दशा
7. मृदा अपरदन ( Soil Erosion )
8. निरोधक ( Inhibitory ) कारक

2. कृत्रिम कारक ( Artificial Factors )

ये कारक मृदा प्रबन्ध ( Soil Management ) से सम्बन्धित होते हैं । ये मनुष्यों द्वारा अपनाए जाते हैं और इनमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया जाता है ।

ये कारक निम्नलिखित हैं

1. जलाक्रान्ति ( Water Logging )
2. मृदा की जुताई का ढंग एवं समय
3. फसल उगाने की प्रणाली
4. मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा
5. खरपतवारों का नियन्त्रण (Weeds Control)
6. खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग

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1. प्राकृतिक कारक ( Natural Factors )


1. मूल पदार्थ ( Parent Material ) — चट्टानों के ऋतुक्षरण द्वारा मृदा निर्माण होता है । यदि मूल पदार्थ में पौधों के पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में विद्यमान हों तो उससे बनी मृदा साधारणत : उपजाऊ होती है ।

2. जलवायु ( Climate ) — जलवायु के प्रमुख अवयव नमी , वर्षा , तापक्रम तथा वायु है । नमी अथवा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अधिक पोषक तत्त्व लीचिंग द्वारा ऊपरी सतह से बहकर मृदा की निचली सतह में चले जाते हैं ।

इस प्रकार ऊपरी मृदा की उर्वरता कम हो जाती है । अधिक तापक्रम पर मृदा में कार्बनिक पदार्थ का अपघटन शीघ्र होकर मृदा उर्वरता कम हो जाती है । निरन्तर तेज वायु चलने से मृदा के धरातल से मृदा कण उड़कर अन्य स्थानों में एकत्रित हो जाते हैं जिससे मृदा उर्वरता कम हो जाती है ।

3. मृदा प्रोफाइल की गहराई ( Depth of Soil Profile ) - उथली मृदाओं की अपेक्षा गहरी मृदाओं की उर्वरता अधिक होती है । गहरी मृदाओं में पौधों की जड़ें अधिक गहराई तक जाकर भली - भाँति फैल जाती है और पोषक तत्त्व तथा जल अधिक मात्रा में लेती है ।

4. मृदा आयु ( Soil Age ) — पुरानी निर्मित मृदाओं में अधिक टूट - फूट, लीचिंग तथा लगातार फसलों के उगाने के कारण प्राप्य पोषक तत्त्व अत्यधिक कम हो जाते हैं ।
अत : नव निर्मित मृदा की उर्वरता पुरानी निर्मित मृदा की अपेक्षा कम होती है ।

5. स्थलाकृति ( Topography ) - ऊँचे क्षेत्रों में कटाव तथा लीचिग द्वारा पोषक तत्त्व पानी के साथ बहुत निचले स्थानों में एकत्रित हो जाते हैं ।

इस प्रकार ऊँचे स्थानों को मृदा उर्वरता कम और निचले क्षेत्रों की मृदा उर्वरता अधिक होती है । यही कारण है कि पहाड़ी या ऊँचे क्षेत्रों की मृदा उर्वरता मैदानी या नीचे क्षेत्रों की उर्वरता से कम होती है ।

अत : मृदा की तलरूपता इसकी उर्वरा शक्ति को प्रभावित करती है ।

6. मृदा की भौतिक दशा - भौतिक दशा अच्छी होने पर मृदा में वायु संचार सुचारू रूप से होता है, मृदा की जलधारण क्षमता बढ़ती है, पौधों की जड़ों का सुविकास होता है और सूक्ष्म जीवों की क्रिया ठीक प्रकार से होती है ।

ऐसी दशा में पौधे मृदा घोल से अपने पोषक तत्त्व सुगमतापूर्वक ग्रहण कर सकते हैं । मृदा की संरचना तथा कणाकार भी मृदा उर्वरता को प्रभावित करते है । बड़े आकार के कणों वाली मृदाओं में कणान्तरिक छिद्र बड़े होने के कारण जल नीचे की ओर शीघ्रता से चला जाता है ।

इस दशा में मृदा की जल शोषण शक्ति कम होकर मृदा उर्वरता कम हो जाती है । छोटे कणों वाली मृदा को उर्वरता अधिक होती है ।

7. मृदा अपरदन ( Soil Erosion ) — वायु द्वारा तथा मृदा की सतह से अतिरिक्त जल के ढाल की ओर बहने से मृदा कटाव होता है । इससे मृदा में उपस्थित पौधों के पोषक तत्त्व भी मृदा कणों के साथ बहकर नष्ट हो जाते हैं और मृदा उर्वरता कम हो जाती है ।

फसलें जितना खाद्य पदार्थ मृदा से अपने उपयोग में लेती है उसका लगभग 30 गुना कटाव द्वारा नष्ट हो जाता है ।

8. निरोधक कारक ( Inhibitory Factors ) - इसके अन्तर्गत मृदा अम्लता, क्षारीयता तथा अतिरिक्त जल आते है । 
अम्लीय मृदा में Fe , Mn तथा A  अधिक घुलनशील होकर फॉस्फोरस को अघुलनशील रूप में परिवर्तित कर देते हैं ।

फलत : फॉस्फोरस पौधों को प्राप्त नहीं हो पाता । अम्लीय मृदा में C तथा Mg की भी कमी हो जाती है । इस प्रकार मृदा उर्वरता कम हो जाती है । क्षारीय मृदा में सोडियम लवणों की अधिकता होती है । मृदा की क्षारीयता की दशा में भी उर्वरता कम हो जाती है ।

9. मृदा में जल निकास ( Drainage in hindi ) - उचित न होने पर पौधों के घुलनशील पोषक तत्त्व पानी के साथ बहकर नष्ट हो जाते हैं जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है ।

मृदा में अतिरिक्त जल रुक जाने से उसमें वायु प्रवेश सुचारू रूप से नहीं होता और CO, का संचय बढ़ जाता है ।

ऐसी अवस्था में पौधों की जड़े नहीं पनपती और मृदा के सूक्ष्म जीवाणुओं की सक्रियता कम हो जाती है । फलत : मृदा उर्वरता कम हो जाती है ।

2. कृत्रिम कारक ( Artificial Factors )


1. जलाक्रान्ति ( Water Logging ) - अधिक पानी भरने से मृदा की भौतिक दशा खराब हो जाती है । जलाक्रान्ति से घुलनशील पोषक तत्त्व लीचिंग द्वारा नीचे चले जाते हैं जिसके फलस्वरूप मृदा उर्वरता कम हो जाती है ।

जब मृदा में फसल की आवश्यकता से अधिक नमी होती है और उसके निकास का कोई प्रबन्ध नहीं होता है तो मृदा में वायु की कमी होकर वायुजीवी जीवाणुओं की सक्रियता कम हो जाती है और हानिकारक जीवाणु सक्रिय हो जाते हैं ।
फलतः मृदा की उर्वरता कम हो जाती है ।

2. मृदा की जुताई का ढंग एवं समय ( Time and Method of Soil Cultivation ) – ढलाब वाले खेतों की जुताई ढाल के समानान्तर करने से मृदा कटाव अधिक होता है जिससे पोषक तत्त्व पानी के साथ बहकर कम हो जाते हैं और मृदा उर्वरता कम हो जाती है ।

अत : मृदा के ढलाव के लम्बवत् खेत की जुताई करने से मृदा का कटाव कम होकर उर्वरता बनी रहती है । गहरी जुताई करने से मृदा उर्वरता बढ़ती है । मृदा की जुताई उचित समय पर करने से मृदा की भौतिक दशा ठीक रहकर मृदा उर्वरता में वृद्धि हो जाती है ।

3. फसल उगाने की प्रणाली ( Cropping System ) - विभिन्न प्रकार की फसलें अपनी आवश्यकतानुसार मृदा में विभिन्न आवश्यक पोषक तत्त्व विभिन्न अनुपात में ग्रहण करती हैं ।

यदि किसी मृदा में हर वर्ष एक ही फसल लगातार उगायी जाए तो उस फसल द्वारा शोषित किए गए पोषकों की मात्रा मृदा में कम होकर मृदा की उर्वरता क्षीण हो जाती है ।

अतः मृदा की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए एक ही फसल को निरन्तर नहीं बोना चाहिए बल्कि फसल चक्र ( Crop Rotation in hindi ) के साथ फसलों के मिश्रण भी खेत में बार - बार बदलकर बोने चाहिये । 

इस प्रकार समस्त पोषकों का कम या अधिक शोषण न होने से मृदा उर्वरता बनी रहती है ।

4. मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा - प्राय : जिस मृदा में जितना अधिक कार्बनिक पदार्थ होता है , उसकी उर्वरता उतनी ही अधिक होती है क्योंकि कार्बनिक पदार्थ पौधों के पोषक तत्त्वों का भण्डार - गृह होता है ।

मृदा में कार्बनिक पदार्थ की पर्याप्त मात्रा
होने से इसकी जलधारण क्षमता एवं वायु संचार बढ़ जाता है । कार्बनिक पदार्थ मृदा जीवों एवं सूक्ष्म जीवाणुओं का भी प्रमुख भोज्य पदार्थ होता है ।

5. खरपतवारों का नियन्त्रण ( Control of Weeds ) - खरपतवार भी पौधों की भांति नमी , वायु , प्रकाश तथा खाद्य तत्त्वों का उपयोग करते हैं । यदि खरपतवारों की रोकथाम न की जाए और उन्हें स्वतन्त्र रूप से खेत में उगने तथा बढ़ने दिया जाए तो वे पौधों के पोषक तत्त्वों के एक बहुत बड़े भाग को अपने भोजन के रूप में नष्ट कर देते हैं जिससे मृदा की उर्वरता कम हो जाती है ।

6. खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग ( Use of Manures and Fertilizers ) - मृदा में आवश्यक पोषक तत्त्वों की कमी की पूर्ति के लिए इसमें खाद तथा उपयुक्त उर्वरक मिलाते है । 

अतः खाद एवं उर्वरकों के प्रयोग से मृदा की उर्वरता में वृद्धि हो जाती है ।

मिट्टी की उर्वरता शक्ति को कैसे बढ़ाएं? ( How to increase soil fertility )


मिट्टी की उर्वरता शक्ति को बढ़ाने के 15 तरीके -


मृदा उर्वरता बनाए रखने के लिए निम्नलिखित प्रयास अपेक्षित हैं -


1. उचित भू - परिष्करण क्रियाओं द्वारा उत्तम मृदा संरचना का विकास करना,

2. उचित जल निकास एवं वायु संचार का होना, में वायु,

3. मृदा में उचित जल संधारण एवं जल प्राप्ति होना,

4. मृदा में पर्याप्त कार्बनिक पदार्थ का स्तर बनाए रखना,

5. खरपतवार का नियन्त्रण रखना,

6. मृदा अपरदन का नियन्त्रण रखना,

7. मृदा विकार एवं हानिकारक कीड़ों की रोकथाम करना,

8. सुधारकों के उपयोग द्वारा मृदा पी - एच का नियन्त्रण करना,

9. वैज्ञानिक फसल चक्र का प्रयोग करना,

10. फलीदार फसलों का उगाना,

11. सन्तुलित उर्वरक प्रयोग करना,

12. फार्मयार्ड खाद, हरी खाद एवं फसल अवशेष का प्रयोग करना,

13. समय - समय पर मृदा परीक्षण द्वारा मृदा उर्वरता की जाँच करके उसके अनुरूप मृदा उर्वरता का नियन्त्रण करना ।

14. जैविक खाद का उपयोग करना चाहिए।

15. रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करना चाहिए।

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उपजाऊ मृदा (Fertile Soil in hindi) - मृदा को उपजाऊ बनाने में कौन सा तत्व महत्वपूर्ण है?


उपजाऊ मृदा (Fertile Soil Meaning in hindi)
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उपजाऊ मृदा की परिभाषा ( Fertile Soil in hindi )


पौधों की अधिकतम वृद्धि तथा उपज ( Yield ) के समस्त आवश्यक पोषकों को पर्याप्त तथा सन्तुलित मात्रा में प्रदान करने की योग्यता रखने वाली मृदा को उर्वर या उपजाऊ मृदा ( Fertile Soil in hindi ) कहते हैं ।

मृदा को उपजाऊ बनाने में कौन सा तत्व महत्वपूर्ण है?

मृदा की आवश्यकताएँ -


किसी मृदा का उपजाऊ होना निम्नलिखित दशाओं पर निर्भर करता है -

( i ) इसमें जल - संचित रखने की क्षमता पर्याप्त होनी चाहिए ।

( ii ) इसमें वायु प्रवेश ( Aeration ) अच्छा होना चाहिए ।

( iii ) इसे ऐसे खनिजों की उपस्थिति में अपघटित होता हुआ कार्बनिक पदार्थ प्राप्त होना चाहिए जो पौधों की आवश्यकता पूर्ति करने के लिए पर्याप्त तीव्र गति से घुलते रहते हैं ।

उपरोक्त दशाओं का सही संयोग प्राप्त करना किसान का उद्देश्य होता है । उर्वर मृदा के लिए मृदा दशाओं का उचित रहना आवश्यक है ।

अतः स्पष्ट है कि मृदा उर्वरता के लिए मृदा की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशाओं का उचित संयोग होना चाहिए ।

यदि मृदा में पौधों के लिए सभी आवश्यक तत्त्व पर्याप्त तथा सन्तुलित मात्रा में विद्यमान हों परन्तु जल निकास उचित न होने के कारण जल एवं वायु के संचार में बाधा उत्पन्न हो जाए और लाभदायक जीवाणुओं के लिए अनुकूल परिस्थिति न हो तो मृदा उर्वरता कम हो जाती है ।

अच्छी मृदा उर्वरता बनाए रखने के कौन से तरीके हैं?


अच्छी मृदा उर्वरता स्तर बनाए रखने के तरीके निम्न कारकों को अपनाकर मृदा उर्वरता प्रबन्ध किया जा सकता है अर्थात मृदा उर्वरता को सुरक्षित रखा जा सकता है -

मिट्टी की उर्वरता (मृदा उर्वरता) बनाए रखने के तरीके ( Methods of maintaining soil fertility level )


1. उचित जल निकास एवं वायु संचार -


मृदा में उपस्थित पादप पोषकों को लीचिंग द्वारा नष्ट होने से बचाने के लिए जल निकास उचित होना चाहिए । जड़ों के सुविकास हेतु मृदा में वायु संचार उचित होना चाहिए । पानी के आधिक्य में वायु संचार नहीं होता जिससे मृदा में Co, की मात्रा में वृद्धि होकर पौधों की जड़ों के विकास में बाधा पड़ती है ।

2. मृदा अपरदन नियन्त्रण -


मृदा कटाव के कारण नाइट्रोजन, पोटेशियम, कैलशियम तथा मैग्नीशियम आदि पादप पोषक तत्त्व बहकर नष्ट हो जाते हैं ।

अत : मृदा उर्वरता बनाए रखने के लिए मृदा में नमी को सुरक्षित रखा जाता है । ऐसा उचित समय पर जुताई करके , मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि करके , खरपतवारों को नष्ट करके या वर्षा के पानी को रोककर किया जा सकता है ।

3. मृदा में उचित जल संधारण -


मृदा में नमी की कमी या आधिक्य दोनों ही मृदा गुणों तथा पादप वृद्धि के लिए अहितकर है । अतः मृदा उर्वरता बनाए रखने के लिए मृदा में नमी को सुरक्षित रखा जाता है । ऐसा उचित समय पर जुताई करके , मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में वृद्धि करके , खरपतवारों को नष्ट करके या वर्षा के पानी को रोक कर किया जा सकता है ।

4. मृदा पी एच -


अधिकतर फसलों की वृद्धि के लिए उदासीन मृदाएँ उपयुक्त होती हैं । अत : अम्लीय मृदाओं में चूना मिलाकर और क्षारीय मृदाओं में रासायनिक सुधारक या कार्बनिक पदार्थ प्रयोग करके मृदा की पी एच को नियन्त्रित किया जा सकता है ।

5. खरपतवार का नियन्त्रण -


खरपतवार मृदा से खाद्य पदार्थ ग्रहण करते हैं जिससे फसल को पोषक तत्त्व कम प्राप्त होते हैं । अत : मृदा उर्वरता बनाए रखने के लिए खरपतवार को हाथों से उखाड़कर, नराई कर , पकने से पहले काटकर, जलाकर, मल्च द्वारा या रासायनिक पदार्थों के प्रयोग द्वारा नियन्त्रित किया जाता है ।

6. हानिकारक कीड़ों की रोकथाम -


मृदा में विद्यमान दीमक या अन्य सूक्ष्म हानिकारक जीव पौधों में नाना प्रकार के रोग विकसित करते हैं । ऐसी दशा में रासायनिक पदार्थों का प्रयोग कर मृदा उर्वरता को सुरक्षित रखा जाता है ।

7. वैज्ञानिक फसल -


फसल चक्र का प्रयोग - फसलों को हेर - फेर कर बोने से मृदा में किसी पोषक विशेष की कमी नहीं होती और मृदा उर्वरता बनी रहती है । अत : फसल - चक्र का सही प्रयोग करना चाहिए और मूसला जड़ वाली फसल के बाद झकड़ा जड़ वाली फसल उगाई जानी चाहिए ।

8. फलीदार फसलों का उगाना —


मटर, चना, लोबिया, ग्वार, मूंग, उर्द, सनई तथा लैंचा आदि फलीदार फसलों में सहजीवी बैक्टीरिया वायुमण्डल से मृदा में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर देते हैं जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है । अत : दलहनी फसलें उगाना लाभकारी होता है ।

9. फार्मयाड खाद तथा हरी खाद का प्रयोग -


कार्बनिक खादों में पौधे के लिए लगभग सभी पोषक उपयुक्त अनुपात में विद्यमान होते हैं । अत : मृदा में खाद मिलाकर या हरी खाद देकर मृदा की उर्वरता सुरक्षित रखी जा सकती है ।

10. उर्वरकों का प्रयोग -


मृदा में विभिन्न उर्वरक मिलाने से इसकी उर्वरता में वृद्धि होती है और अच्छी फसल प्राप्त होती है । अतः मृदा उर्वरता बनाए रखने हेतु इसमें आवश्यक उर्वरक मिलाने चाहिये ।

11. उचित भू - परिष्करण क्रियाओं द्वारा मृदा संरचना में सुधार -


मृदा में कम या अधिक नमी की अवस्था में जुताई करने , ढेले या कीचड़ बनकर मृदा संरचना खराब हो जाती है ।

अत : उचित समय पर भू - परिष्करण क्रियाएँ करके मृदा संरचना को सुधारते हैं । इससे मृदा में जलशोषण एवं जल धारण की क्षमता बढ़ जाती है और मृदा संचार भी उचित होता है ।

आज के समय में भारत में मृदा उर्वरता की क्या स्थिति है ?


भारत में मृदा उर्वरता की स्थिति - भारतवर्ष की मृदाओं में प्रमुख पोषक तत्त्वों के अतिरिक्त द्वितीयक ( Secondary ) पोषक गन्धक तथा सूक्ष्म पोषक तत्त्व जिंक आदि की उपलब्धि भी अत्यन्त कम है ।

फसलोउत्पादन परिणामस्वरूप मृदाओं की उर्वरता पर्याप्त सीमा तक कम हो जाती है ।

ऐसी अवस्था में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग बिना उन्नतशील किस्म ( High yield varieties ) का उत्पादन सम्भव नहीं है । वास्तव में एक किलोग्राम उर्वरक के प्रयोग से लगभग दस किलोग्राम खाद्यान्न का उत्पादन होता है ।

भारत में मृदा उर्वरता की स्थति


भारतवर्ष में समस्त उत्पादन का लगभग 70 % उर्वरकों के उपयोग द्वारा ही सम्भव हो सका है ।

मृदा उर्वरता के अन्तर्गत पोषक तत्त्वों की मात्रा के साथ - साथ उसका कुशल प्रबन्ध, मृदा - जल प्रबन्ध तथा सस्य प्रबन्ध भी आते हैं । प्रधान पोषक तत्त्वों में असन्तुलन, कार्बनिक पदार्थ की कमी, मृदा संरक्षण व संरचना और मृदा प्रदूषण आदि कारक मृदा उर्वरता में कमी करते हैं ।

उर्वरता एवं उर्वरक के सही प्रयोग के लिए मृदा परीक्षण आवश्यक हैं । देश के विभिन्न भागों में अनेकों अनुसन्धान केन्द्रों पर इस विषय में किए गए प्रयोगों के आधार पर फसलोत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई है ।

पूरे देश की मृदाओं को सस्य जलवायु के आधार पर वर्गीकृत करके विभिन्न सस्य चक्रों के लिए मृदा उर्वरता की दृष्टि से उन्नत एवं विशिष्ट पोषक तत्त्व उपयोग कर मानकों का विकास किया जा रहा है ।

भारत में मृदा उर्वरता की समस्याएं ( Soil Fertility Problems In India )


भारत में मृदा उर्वरता की समस्याएँ भारत में कृषि कार्य ईसा से हजारों वर्ष पूर्व से होता आया है । खेतों में खाद का प्रयोग करने की प्रथा प्राचीन काल से है ।

कृषि प्राचीन काल से ही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यवसाय समझा जाता है । जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि के फलस्वरूप भोज्य पदार्थों के अधिक उत्पादन हेतु मृदा उर्वरता का महत्त्व अधिक हो गया है ।

कृषि सम्बन्धी अनुसन्धान केन्द्रों पर उर्वरक सम्बन्धी परीक्षण करके ज्ञात हुआ कि किसानों के खेतों में नत्रजन की ही नहीं अपितु फॉस्फोरस तथा पोटेशियम पोषक तत्त्वों की भी कमी होती है ।

मृदा परीक्षण कार्यक्रमों से मृदा उर्वरता की अन्य समस्याओं का भी ज्ञान प्राप्त होता है ।

इस प्रकार स्पष्ट होता है कि -


( i ) किसी मृदा में किन प्रमुख पोषक तत्त्वों ( N, P,K ) की कमी है ।

( ii ) कोई मृदा अनिश्चित या अनन्त काल तक कृषि योग्य नहीं रहती ।

अत : मृदा में फसलों के अनुसार उपयुक्त मात्रा में पोषक तत्त्व खाद एवं उर्वरक डालकर उपलब्ध कराए जाने चाहिये ।

( iii ) अधिक उपज देने वाली नई किस्मों को पुरानी किस्म की फसल की अपेक्षा उर्वरकों की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है ।

( iv ) विभिन्न फसल किस्मों में किस विशेष सूक्ष्म पोषक तत्त्व की कमी होती है ।

भारत के विभिन्न प्रदेशों में मृदा उर्वरता सम्बन्धी अनुसन्धानों के आधार पर पता चलता है कि -


1. पंजाब की मृदा में जिंक ( जस्ता ) तथा आयरन ( लोहे ) सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी है ।

2. महाराष्ट्र तथा गुजरात की मृदा में मैंगनीज तथा मोलिब्डिनम नामक सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की न्यूनता है ।

3. बिहार में बोरॉन के अभावग्रस्त क्षेत्र स्थित हैं ।

4. उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में धान की फसल की पैदावार देने वाली मृदाओं में जिंक की कमी होती है ।

5. पंजाब, हरियाणा, दिल्ली तथा मध्य प्रदेश में मूंगफली, बरसीम तथा अल्फाल्फा आदि फलीदार फसलों में गन्धक की न्यूनता पायी जाती है ।

6. मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक तथा बिहार के छोटा नागपुर आदि में अम्लीय मृदाओं वाले क्षेत्रों में कैल्सियम तथा मैगनीशियम नामक गौण पोषक तत्त्वों का अभाव होता है ।

इस प्रकार स्पष्ट है कि मृदाओं की पर्याप्त देख - रेख करना अत्यावश्यक है और मृदा उर्वरता बनाए रखने के लिए मृदाओं को फसलों के अनुसार विभिन्न पोषक तत्त्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने चाहिये ।

मृदा उर्वरता प्रबन्ध तथा मृदा सुधार ( Soil fertility management and soil improvement )


मृदा की उर्वरता शक्ति बनाए रखने के लिए उचित मृदा प्रबन्ध करना अत्यावश्यक होता है ।

पंजाब के मृदा वैज्ञानिकों ने अनुसन्धान एवं मृदा अध्ययन करके ज्ञात किया कि लवणीय तथा क्षारीय मृदाओं में पादप पोषकों की अत्यधिक न्यूनता होती है ।

अत : इसमें खाद एवं उर्वरकों की पर्याप्त मात्रा डालकर इनमें जैविक सक्रियता को तीव्र करना अनिवार्य है ।

इन मृदाओं में हरी खाद देना भी लाभकारी होता है । इनमें कुछ फसल - चक्र अपनाने भी आवश्यक होते है ।

अत : लैंचा, धान, जौ, गेहूँ, बरसीम तथा चुकन्दर आदि फसलों को क्रमानुसार उगाना उपयुक्त होता है ।

मिट्टी पोषक तत्व प्रबंधन ( Soil nutrient management )


मृदा उर्वरता प्रबन्ध के लिए मृदा संरचना उचित होना आवश्यक है । केन्द्रीय लवणीय मृदा अनुसन्धान केन्द्र करनाल ( हरियाणा ) में किए गए अध्ययन के अनुसार विनिमयशील सोडियम वाली लवणीय मृदाओं को सुधारने हेतु इनमें जिप्सम की पर्याप्त मात्रा डालना आवश्यक होता है ।

काली तथा जलोढ़ मृदाओं को सुधारने के लिए खेत में गहरी जुताई करनी चाहिए । इनमें गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिलाकर कार्बनिक पदार्थ बढ़ाना आवश्यक होता है ।

इसके लिए लगभग 20 टन गोबर की खाद प्रति हैक्टर जिप्सम मिलाकर डालनी चाहिए । उचित जल प्रबन्ध करने से अधिक उपज देने वाली फसलों के लिए जल उपयोग की दक्षता बढ़ाई जाती है ।

इसके लिए नहरी सिंचाई जल या मृदा जल उपलब्ध होना चाहिए । इसके अतिरिक्त मृदा प्रबन्ध हेतु उर्वरकों का सन्तुलित उपयोग, खेती करने की उपयुक्त तथा आधुनिक विधियाँ, पादप सुरक्षा के नवीनतम उपाय और बहु - फसली खेती आदि कारक अपनाना अत्यन्त लाभकारी होता है ।

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